मुद्रा और साख Money and Credit
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परिचय
मुद्रा के आधुनिक रूप और बैंक प्रणाली
यह अध्याय मुद्रा (Money) और साख (Credit) के तत्व को उभारने और समझने पर केंद्रित है। मुद्रा के आधुनिक रूप बैंक प्रणाली से जुड़े हुए हैं।
वर्तमान भारतीय संदर्भ में, बैंकिंग प्रणाली के कंप्यूटरीकरण के कारण मुद्रा के नए रूपों का धीरे-धीरे विस्तार हो रहा है।
विमुद्रीकरण (Demonetization) – नवंबर 2016
- 500 और 1000 रुपये के करेंसी नोटों को अमान्य घोषित किया गया
- नए नोट (500 तथा 2000 रुपये) प्राप्त करने के लिए बैंकों में जमा
- नकदी के स्थान पर बैंक जमाओं को प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहन
नकदीरहित/गैर-नकद लेनदेन विधियाँ
महत्वपूर्ण: प्लास्टिक कार्ड (क्रेडिट/डेबिट) मौद्रिक लेनदेन के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन वे स्वयं मुद्रा नहीं हैं।
मुद्रा: विनिमय का एक माध्यम
Money as a Medium of Exchange
मुद्रा वह वस्तु है जो लेन-देन में विनिमय का माध्यम बन सकती है। लोग भुगतान के रूप में मुद्रा लेना पसंद करते हैं क्योंकि इसका विनिमय किसी भी वस्तु या सेवा को खरीदने के लिए आसानी से किया जा सकता है।
वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System)
- मुद्रा का उपयोग किए बिना वस्तुओं का विनिमय
- आवश्यकताओं का दोहरा संयोग अनिवार्य
- दोनों पक्षों को सहमत होना ज़रूरी
समस्या: Double Coincidence of Wants – दोनों को एक दूसरे की वस्तुएँ चाहिए
मुद्रा की मध्यस्थता
- मुद्रा मध्यवर्ती भूमिका प्रदान करती है
- दोहरे संयोग की ज़रूरत समाप्त
- आसान और सुविधाजनक लेनदेन
लाभ: कोई भी किसी से भी वस्तु/सेवा खरीद सकता है
मुद्रा के ऐतिहासिक रूप
प्रारंभिक काल
अनाज और पशु
बाद में
सोना, चाँदी, ताँबे के सिक्के
आधुनिक
कागज़ के नोट और सिक्के
करेंसी
Currency – Modern Form of Money
मुद्रा के आधुनिक रूपों में करेंसी (कागज़ के नोट और सिक्के) शामिल हैं। आधुनिक मुद्राएँ बहुमूल्य धातुओं की नहीं बनी होती हैं और इनका अपना कोई आंतरिक इस्तेमाल नहीं होता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)
केंद्रीय बैंक
- केंद्रीय सरकार की तरफ से करेंसी नोट जारी करता है
- भारतीय कानून रुपये को विनिमय के माध्यम के रूप में वैधता प्रदान करता है
- रुपये को सौदों में अदायगी के लिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता
मुख्य बिंदु: करेंसी को विनिमय का माध्यम इसलिए स्वीकार किया जाता है क्योंकि देश की सरकार इसे प्राधिकृत करती है।
बैंकों में निक्षेप
Bank Deposits
लोग अतिरिक्त मुद्रा को बैंकों में अपने नाम से खाता खोलकर निक्षेप (Deposits) के रूप में रखते हैं।
बैंकों की भूमिका:
- जमाओं को स्वीकार करना
- सूद (ब्याज) देना
- धन को सुरक्षित रखना
माँग जमा (Demand Deposits)
बैंक खातों में जमा धन को माँग के ज़रिए निकाला जा सकता है, इसलिए इसे माँग जमा कहा जाता है।
माँग जमा को भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा समझा जाता है।
चेक द्वारा भुगतान
चेक (Cheque) एक कागज़ है जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चेक पर लिखे नाम के दूसरे व्यक्ति को एक खास रकम का भुगतान करने का आदेश देता है।
बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ
Loan Activities of Banks
नकद आरक्षित अनुपात
कुल जमा का हिस्सा
बैंक जनता से प्राप्त कुल जमा का एक छोटा हिस्सा अपने पास नकद के रूप में रखते हैं ताकि किसी विशेष दिन में जमाकर्ताओं द्वारा धन निकालने की मांग को पूरा किया जा सके।
ऋण देना
कुल जमा का हिस्सा
बैंक जमा राशि के एक बड़े हिस्से का उपयोग ऋण (Loan) देने के लिए करते हैं।
बैंक: मध्यस्थता की भूमिका
जमाकर्ता
अतिरिक्त राशि वाले
बैंक
कर्ज़दार
जिन्हें राशि चाहिए
बैंकों की आय का स्रोत
जमाकर्ताओं को दिया जाने वाला ब्याज
4%
(उदाहरण)
कर्ज़दारों से लिया जाने वाला ब्याज
10%
(उदाहरण)
यह अंतर (6%) = बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत
साख की दो भिन्न स्थितियाँ
Two Different Situations of Credit
ऋण (Credit) की परिभाषा:
यह एक सहमति है जहाँ साहूकार कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ प्रदान करता है और बदले में भविष्य में भुगतान का वादा लेता है।
सलीम – सकारात्मक भूमिका
जूता निर्माता, त्योहार का मौसम
- ऋण का उपयोग कार्यशील पूँजी की ज़रूरतों के लिए
- अग्रिम भुगतान लेना या बाद में भुगतान का वादा
- समय पर उत्पादन पूरा करना
- लाभ कमाना और कमाई बढ़ाना
परिणाम: स्थिति में सुधार
स्वप्ना – नकारात्मक भूमिका
छोटी किसान, कर्ज़-जाल
- खेती के खर्चों के लिए साहूकार से ऋण
- फसल बर्बाद हो जाना
- कर्ज़ एक बड़ी रकम बन जाना
- ज़मीन बेचनी पड़ी
परिणाम: कर्ज़-जाल (Debt-Trap)
निष्कर्ष: ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थितियों के खतरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।
ऋण की शर्तें
Terms of Credit
ग्रामीण क्षेत्रों में साख की मुख्य मांग फसल उगाने के लिए होती है।
ऋण की शर्तें (Terms of Credit)
-
1ब्याज दर – मूल रकम के साथ अदा
-
2समर्थक ऋणाधार (Collateral)
-
3आवश्यक कागज़ात
-
4भुगतान के तरीके
समर्थक ऋणाधार (Collateral)
वह संपत्ति जिसका मालिक कर्ज़दार है और जो उधारदाता को गारंटी के रूप में दी जाती है।
भूमि, इमारत
गाड़ी
पशु
बैंकों में पूँजी
यदि कर्ज़दार उधार वापस नहीं कर पाता, तो उधारदाता को समर्थक ऋणाधार बेचने का अधिकार होता है।
आवास ऋण का उदाहरण – मेघा
आवश्यकताएँ:
- नौकरी और वेतन संबंधी रिकॉर्ड दिखाना
- नए घर के सभी कागज़ ऋणाधार के रूप में
प्रक्रिया:
- बैंक कागज़ात रखता है
- कर्ज़ लौटाने पर कागज़ात वापस
विविध प्रकार के साख प्रबंध
एक गाँव का उदाहरण
श्यामल – छोटा किसान
अनौपचारिक ऋणपहले (महाजन से):
60% वार्षिक
(5% मासिक)
अब (कृषि व्यापारी से):
36% वार्षिक
(3% मासिक)
शर्त: फसल तैयार होने पर उसी व्यापारी को बेचनी होगी (व्यापारी सस्ते में खरीदकर मुनाफा कमाता है)
अरुण – मध्यम किसान
औपचारिक ऋणबैंक से ऋण:
8.5% वार्षिक
लाभ: आलू की फसल को शीत भंडार गृह में रखकर उसके बदले नया ऋण ले सकता है
रमा – भूमिहीन कृषि मज़दूर
अनौपचारिक ऋणभू-स्वामी-नियोक्ता से:
60% वार्षिक
(5% मासिक)
- कर्ज़ को काम करके वापस करती है
- पुराना ऋण चुकाए बिना नया ऋण लेना पड़ता है
- भूमिहीनों के लिए एकमात्र स्रोत
सहकारी समितियों से ऋण
ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते ऋण का एक अन्य स्रोत सहकारी समितियाँ हैं।
- सदस्य अपने संसाधनों को एकत्र करते हैं
- जमा पूँजी को ऋणाधार मानकर बैंक से ऋण प्राप्त
- कृषि उपकरण, खेती, मछली पकड़ना, घर बनाने के लिए कर्ज़
भारत में औपचारिक क्षेत्रक में साख
Formal Sector Credit in India
| विशेषता | औपचारिक स्रोत | अनौपचारिक स्रोत |
|---|---|---|
| उदाहरण | बैंक, सहकारी समितियाँ | साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त |
| निगरानी | RBI द्वारा निगरानी | कोई संस्था नहीं |
| ब्याज दर | कम (8-12%) | बहुत अधिक (36-60%+) |
| नियम | सरकारी नियमों के अधीन | ऐच्छिक, कोई नियम नहीं |
| वसूली | कानूनी तरीके | नाजायज़ तरीके संभव |
ग्रामीण भारत में ऋण स्रोत (2019)
51%
व्यावसायिक बैंक
सबसे बड़ा हिस्सा23%
साहूकार
अनौपचारिकभारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की भूमिका
- औपचारिक ऋण स्रोतों की कार्यप्रणाली पर नज़र रखना
- बैंक न्यूनतम नकद शेष बनाए रखें
- छोटे किसानों और छोटे उद्योगों को भी ऋण मिले
- ऋण और ब्याज दरों की जानकारी लेना
औपचारिक और अनौपचारिक साख – किसे क्या मिलता है?
शहरी गरीब परिवार
शहरी अमीर परिवार
समस्या: अमीर सस्ते औपचारिक ऋण लेते हैं, जबकि गरीब को कर्ज़ के लिए बहुत अधिक पैसा देना पड़ता है।
अनौपचारिक क्षेत्रक की समस्याएँ
- देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं
- ऐच्छिक दरों पर ऋण
- नाजायज़ तरीकों से पैसे वापस लेना
- ऋण की ऊँची लागत से ऋण-जाल में फँसना
लक्ष्य: सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है। औपचारिक स्रोतों की गतिविधियों को ग्रामीण इलाकों में बढ़ाना चाहिए।
निर्धनों के स्वयं सहायता समूह
Self Help Groups (SHGs) for the Poor
गरीबों की औपचारिक ऋण तक पहुँच में बाधाएँ
- सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की अनुपस्थिति
- ऋणाधार (Collateral) और विशेष कागज़ातों की ज़रूरत
- ऋणाधार की अनुपलब्धता – प्रमुख कारण
अनौपचारिक ऋणदाताओं की सुविधा
साहूकार कर्ज़दारों को व्यक्तिगत स्तर पर जानते हैं, इसलिए वे अक्सर बिना ऋणाधार के भी ऋण देने को तैयार हो जाते हैं।
लेकिन: वे ऊँची ब्याज दरें लेते हैं और नाजायज़ तरीके अपनाते हैं।
स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups – SHGs)
यह गरीबों, विशेषकर महिलाओं, को छोटे-छोटे समूहों (15-20 सदस्य) में संगठित करने और उनकी बचत पूँजी को एकत्र करने पर आधारित एक नया तरीका है।
कैसे काम करता है:
- सदस्य समूह से छोटे कर्ज़ ले सकते हैं
- ब्याज साहूकार से कम होता है
- 1-2 वर्षों की नियमित बचत के बाद बैंक से ऋण के योग्य
ऋण का उद्देश्य:
- समूह के नाम पर ऋण
- सदस्यों के लिए स्वरोज़गार के अवसर
SHG की भूमिका और लाभ
- समूह के सदस्य स्वयं निर्णय लेते हैं (लक्ष्य, रकम, ब्याज दर, लौटाने की अवधि)
- समूह की ज़िम्मेदारी ऋण वापस लौटाना
- बैंक बिना ऋणाधार के भी ऋण देने को तैयार
- ऋणाधार की कमी की समस्या से उबारना
- महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनती हैं
- सामाजिक विषयों (स्वास्थ्य, पोषण, घरेलू हिंसा) पर चर्चा का मंच
बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक (Grameen Bank)
स्थापना: 1970
प्रो. मोहम्मद यूनुस
संस्थापक – 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता
- उचित ब्याज दरों पर गरीबों की ऋण ज़रूरतों को पूरा करना
- अधिकांश कर्ज़दार महिलाएं हैं
- बहुत सफल मॉडल
मुख्य बिंदु – सारांश
Key Points Summary
मुद्रा
- • विनिमय का माध्यम
- • RBI करेंसी नोट जारी करता है
- • माँग जमा भी मुद्रा है
- • दोहरे संयोग की ज़रूरत समाप्त
बैंक
- • 15% नकद आरक्षित
- • 85% ऋण के लिए
- • मध्यस्थता की भूमिका
- • ब्याज का अंतर = आय
साख/ऋण
- • सकारात्मक और नकारात्मक दोनों भूमिकाएँ
- • ऋण की शर्तें महत्वपूर्ण
- • समर्थक ऋणाधार (Collateral)
- • कर्ज़-जाल का खतरा
औपचारिक vs अनौपचारिक
- • औपचारिक: सस्ता, RBI निगरानी
- • अनौपचारिक: महँगा, कोई निगरानी नहीं
- • गरीब अनौपचारिक पर निर्भर
- • SHGs समाधान प्रदान करते हैं
मुद्रा के आधुनिक रूप (करेंसी और जमा) आधुनिक बैंक प्रणाली की कार्यप्रणाली से बहुत करीब से जुड़े हुए हैं।