ईंटें, मनके और अस्थियाँ हड़प्पा सभ्यता (Harappan Civilization)
मास्टर करिकुलम डिज़ाइनर द्वारा तैयार गहन नोट्स: विशिष्ट पुरावस्तुओं से लेकर सभ्यता के पतन तक का विस्तृत अध्ययन।
मुख्य अवधारणाएँ, शर्तें, स्थान और समय
Introductory Concepts, Terms, Place & Time
हड़प्पा सभ्यता (जिसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है) के इतिहास का निर्माण मुख्य रूप से पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर किया गया है। चूँकि इस सभ्यता की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, इसलिए हमें उन भौतिक अवशेषों पर निर्भर रहना पड़ता है जो पत्थर, मिट्टी और धातु के रूप में पीछे छूट गए हैं।
विशिष्ट पुरावस्तु: हड़प्पाई मुहर (Seal)
- सामग्री: सेलखड़ी (Steatite) नामक मुलायम पत्थर।
- विशेषता: जानवरों के चित्र (जैसे एकश्रृंगी) और एक रहस्यमयी लिपि के चिह्न।
- महत्व: यह संभवतः लंबी दूरी के व्यापार और विनिमय को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रयुक्त होती थी।
चित्र 1.1: एक हड़प्पाई मुहर
इतिहास जानने के स्रोत
लेखन साक्ष्य उपलब्ध होने के बावजूद अपठनीय हैं, अतः हम इन पर निर्भर हैं:
शब्दावली और कालक्रम (Terms & Chronology)
- हड़प्पा सभ्यता: ‘हड़प्पा’ नामक स्थान पर पहली बार खोजे जाने के कारण।
- सिंधु घाटी सभ्यता: सिंधु नदी घाटी के क्षेत्र में मुख्य बस्तियों के कारण।
- BP: Before Present (वर्तमान से पहले)।
- BCE (ई.पू.): Before Common Era (ईसा पूर्व)।
- CE (ई.): Common Era (ईसा मसीह के जन्म से)।
कृषि, पशुपालन और शिल्पकारी के शुरुआती साक्ष्य।
विशिष्ट मृदभांड, ईंटें, नगर नियोजन, मुहरें।
शहरी विशेषताओं का लुप्त होना, ग्रामीण जीवन।
भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)
इस सभ्यता का विस्तार क्षेत्र अत्यंत व्यापक था। इसमें विशिष्ट वस्तुएँ (जैसे मुहरें, बाट, पकी ईंटें) एक विशाल भू-भाग में मिली हैं:
निर्वाह के तरीके और कृषि प्रौद्योगिकी
Subsistence Strategies & Agricultural Technology
1. आहार संबंधी आदतें (Dietary Habits)
हड़प्पा सभ्यता के निवासी कई प्रकार के पेड़-पौधों से प्राप्त उत्पाद और जानवरों (मछली सहित) से प्राप्त भोजन करते थे।
पेड़-पौधों से प्राप्त उत्पाद (Plants)
- अनाज: गेहूँ, जौ, दाल, सफ़ेद चना तथा तिल।
- बाजरा: गुजरात के स्थलों से इसके दाने बड़ी मात्रा में मिले हैं।
- चावल: चावल के दाने अपेक्षाकृत बहुत कम पाए गए हैं।
जानवरों से प्राप्त उत्पाद (Animals)
- पालतू जानवर: मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस तथा सूअर।
- जंगली प्रजातियाँ: वराह (सूअर), हिरण तथा घड़ियाल (इनकी हड्डियाँ मिली हैं)।
- अन्य: मछली तथा पक्षियों की हड्डियाँ भी मिली हैं।
2. कृषि प्रौद्योगिकी (Agricultural Technology)
जुताई (Ploughing)
- वृषभ (Bull): मुहरों और मृण्मूर्तियों से संकेत मिलता है कि वृषभ ज्ञात था और खेतों को जोतने के लिए बैलों का प्रयोग होता था।
- हल के प्रतिरूप (Models): चोलिस्तान के कई स्थलों और बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के प्रतिरूप मिले हैं।
-
जुते हुए खेत का साक्ष्य (Kalibangan) आरंभिक हड़प्पा स्तर
पुरातत्वविदों को राजस्थान के कालीबंगन में जुते हुए खेत (Ploughed Field) के साक्ष्य मिले हैं। यह कृषि इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है।
तकनीकी विन्यास (Layout):
- खेत में हल रेखाओं (Furrow marks) के दो समूह विद्यमान थे।
- ये रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (Right Angles) पर काटती थीं।
महत्वपूर्ण निष्कर्ष: यह ग्रिड पैटर्न दर्शाता है कि हड़प्पावासी मिश्रित खेती (Mixed Cropping) की तकनीक जानते थे और एक ही खेत में एक साथ दो अलग-अलग फसलें (जैसे सरसों और चना) उगाते थे।
सिंचाई (Irrigation)
महत्वपूर्ण कारण: अधिकांश हड़प्पा स्थल अर्ध-शुष्क क्षेत्रों (Semi-arid lands) में स्थित हैं, जहाँ कृषि के लिए केवल बारिश पर्याप्त नहीं थी, इसलिए सिंचाई आवश्यक थी।
- साक्ष्य: शोर्तुघई (अफ़गानिस्तान) से नहरों के स्पष्ट अवशेष मिले हैं।
- अनुपस्थिति: पंजाब और सिंध में नहरें नहीं मिलीं।
- कारण (पुरातत्वविदों का मत): संभवतः प्राचीन नहरें बहुत पहले ही गाद (Silt) से भर गई थीं।
कटाई के औज़ार (Harvesting Tools)
पुरातत्वविद अभी भी निश्चित नहीं हैं कि फसल कटाई के लिए किन औजारों का प्रयोग होता था। क्या वे लकड़ी के हत्थों में बिठाए गए पत्थर के फलकों का प्रयोग करते थे या धातु के औज़ारों का? (तांबे के औजार भी मिले हैं)।
अनाज पीसने के यंत्र: अवतल चक्कियाँ (Saddle Querns)
मोहनजोदड़ो में अवतल चक्कियाँ बड़ी संख्या में मिली हैं। ये कठोर, कंकरीले, अग्निज अथवा बलुआ पत्थर से निर्मित थीं। चूंकि इनके तल उत्तल हैं, इन्हें जमीन में जमा कर रखा जाता था।
शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी
Craft Production Centers & Techniques
चन्हुदड़ो (Chanhudaro): एक विशिष्ट शिल्प केंद्र
यह मोहनजोदड़ो (125 हेक्टेयर) की तुलना में एक बहुत छोटी बस्ती (मात्र 7 हेक्टेयर) थी, जो लगभग पूरी तरह से शिल्प-उत्पादन में संलग्न थी।
1. मनकों के निर्माण में प्रयुक्त पदार्थ
- कार्नीलियन: सुंदर लाल रंग का।
- जैस्पर (Jasper)
- स्फटिक (Crystal)
- क्वार्ट्ज़ (Quartz)
- सेलखड़ी (Steatite): बहुत मुलायम।
- ताँबा (Copper)
- काँसा (Bronze)
- सोना (Gold)
- शंख (Shell)
- फ़यॉन्स (Faience)
- पकी मिट्टी (Terracotta)
आकार: चक्राकार, बेलनाकार, गोलाकार, ढोलाकार तथा खंडित। कुछ को चित्रकारी से सजाया गया था।
2. निर्माण की तकनीकें (Techniques)
यह रंग पीले रंग के कच्चे माल तथा उत्पादन के विभिन्न चरणों में मनकों को आग में पकाकर प्राप्त किया जाता था।
प्रक्रिया: बड़े पिंड को तोड़ना -> शल्क निकालना -> घिसाई -> पॉलिश -> छेद करना।
यह मुलायम पत्थर है। कुछ मनके इसके चूर्ण के लेप को साँचे में ढालकर बनाए जाते थे, जिससे विविध आकार संभव हुए (ठोस पत्थरों के ज्यामितीय आकारों के विपरीत)।
नोट: प्राचीन तकनीक विशेषज्ञ अभी भी हैरान हैं कि ‘सूक्ष्म मनके’ कैसे बनाए जाते थे।
शंख उत्पादन केंद्र (Shell Industry)
नागेश्वर और बालाकोट: ये बस्तियाँ समुद्र तट के समीप स्थित थीं।
- उत्पाद: चूड़ियाँ, करछियाँ, पच्चीकारी की वस्तुएँ।
- यहाँ से तैयार माल दूसरी बस्तियों तक भेजा जाता था।
उत्पादन केंद्रों की पहचान (Identification)
पुरातत्वविद ‘कूड़ा-करकट’ (Waste) को शिल्प कार्य का सबसे अच्छा संकेतक मानते हैं।
पत्थर के बेकार टुकड़े, त्यागा गया माल और अपूर्ण वस्तुएँ बताती हैं कि शिल्प कार्य कहाँ होता था। (यह बड़े शहरों जैसे मोहनजोदड़ो में भी मिला है)।
माल प्राप्त करने की नीतियाँ
Strategies for Procuring Materials & Trade
परिवहन के साधन (Modes of Transport)
1. उपमहाद्वीप से माल प्राप्त करना (Local Procurement)
नीति (क): बस्तियाँ स्थापित करना (Establishing Settlements)
हड़प्पावासी उन स्थानों पर बस्तियाँ बसाते थे जहाँ कच्चा माल आसानी से उपलब्ध था।
नीति (ख): अभियान भेजना (Sending Expeditions)
उन क्षेत्रों में अभियान भेजना जहाँ बस्तियाँ नहीं थीं, लेकिन संसाधन थे।
ताँबे (Copper) के लिए। पुरातत्वविदों ने इसे ‘गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति’ का नाम दिया है। यहाँ विशिष्ट गैर-हड़प्पाई मृदभांड और ताँबे की विपुल संपदा मिली है।
मुख्य रूप से सोने (Gold) के लिए अभियान भेजे जाते थे।
2. सुदूर क्षेत्रों से संपर्क (Contact with Distant Lands)
ताँबे का आयात
- रासायनिक साक्ष्य: ओमानी ताँबे और हड़प्पाई वस्तुओं, दोनों में निकल (Nickel) के अंश मिले हैं, जो साझा उद्भव दर्शाते हैं।
- हड़प्पाई मर्तबान (Black Jar): ओमान में एक विशिष्ट हड़प्पाई मर्तबान मिला है जिस पर काली मिट्टी की मोटी परत चढ़ी थी (रिसाव रोकने के लिए)। ]
- विनिमय: संभवतः हड़प्पावासी इसमें रखे सामान के बदले ताँबा लेते थे।
लिखित साक्ष्य (3000 ई.पू.)
मेसोपोटामियाई लेखों में तीन क्षेत्रों का जिक्र है:
- दिलमुन: बहरीन द्वीप।
- मगन: ओमान (ताँबे के लिए)।
- मेलुहा: हड़प्पाई क्षेत्र (“नाविकों का देश”)।
हाजा पक्षी (Haja Bird) का मिथक
“तुम्हारा पक्षी हाजा पक्षी हो, उसकी आवाज़ राजप्रासाद में सुनाई दे।”
पुरातत्वविदों के अनुसार यह मोर (Peacock) था।
अन्य पुरातात्विक साक्ष्य
- मेसोपोटामिया में हड़प्पाई मुहरें, बाट और पासे मिले हैं।
- बेलनाकार मुहर: मेसोपोटामिया की मुहर पर बना ‘कूबड़दार वृषभ’ सिंधु क्षेत्र से प्रेरित लगता है।
मुहरें, लिपि और बाट
Administrative Tools: Seals, Script & Weights
मुहरें और मुद्रांकन (Seals & Sealing)
मुहरों का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए होता था।
- सामान से भरे थैले का मुख रस्सी से बाँधा जाता था।
- गाँठ पर थोड़ी गीली मिट्टी जमा कर एक या अधिक मुहरों से दबाया जाता था।
- यदि गंतव्य पर पहुँचने तक मुद्रांकन (Sealing) अक्षुण्ण (intact) रहा, तो इसका अर्थ था कि थैले के साथ छेड़-छाड़ नहीं की गई।
बाट (Weights)
- सामग्री: चर्ट (Chert) नामक पत्थर।
- आकार: आमतौर पर घनाकार (Cubical) और किसी भी निशान से रहित।
छोटे बाटों का प्रयोग संभवतः आभूषणों और मनकों को तौलने के लिए होता था। (धातु के तराजू के पलड़े भी मिले हैं)।
एक रहस्यमय लिपि (Enigmatic Script)
हड़प्पाई मुहरों पर एक पंक्ति में कुछ लिखा होता है (संभवतः मालिक का नाम)। साथ ही एक जानवर का चित्र होता था (अनपढ़ लोगों के लिए संकेत)।
विशेषताएँ
- यह वर्णमालीय नहीं थी (चिह्नों की संख्या बहुत अधिक है)।
- चिह्नों की संख्या: 375 से 400 के बीच।
- सबसे लंबा अभिलेख: लगभग 26 चिह्न।
लिखने की दिशा
दाएँ से बाएँ (Right to Left)
साक्ष्य: मुहरों पर दाईं ओर चौड़ा अंतराल है और बाईं ओर संकुचित (स्थान कम पड़ने के कारण)।
लेखन के साक्ष्य कहाँ मिले?
*क्या साक्षरता व्यापक थी? (नष्टप्राय वस्तुओं पर भी लिखावट हो सकती थी)
सभ्यता का अंत (The End of Civilization)
Decline (c. 1800 BCE) & Theories
पतन का कालक्रम (Chronology)
- 1800 ई.पू. तक चोलिस्तान (Cholistan) जैसे क्षेत्रों में अधिकांश विकसित हड़प्पा स्थलों को त्याग दिया गया था।
- 1900 ई.पू. के बाद गुजरात, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नई बस्तियों में आबादी बढ़ने लगी।
- उत्तर हड़प्पा बाद की संस्कृतियों को ‘उत्तर हड़प्पा’ (Late Harappan) या ‘अनुवर्ती संस्कृतियाँ’ कहा गया, जो ग्रामीण जीवनशैली की ओर संकेत करती हैं।
भौतिक संस्कृति में बदलाव
- विशिष्ट वस्तुओं का लोप: मुहरें, बाट (Weights), विशिष्ट मनके और लंबी दूरी का व्यापार समाप्त हो गया।
- लेखन का अंत: लिपि का प्रयोग बंद हो गया।
- निर्माण में ह्रास: आवास निर्माण की तकनीकें कमजोर हो गईं। बड़ी सार्वजनिक संरचनाओं (जैसे स्नानागार) का निर्माण बंद हो गया।
- स्थानीय बाट: मानकीकृत बाट प्रणाली के स्थान पर स्थानीय बाटों का प्रयोग होने लगा।
पतन के संभावित कारण
ये कारण कुछ बस्तियों के लिए सही हो सकते हैं, परन्तु पूरी सभ्यता के पतन की व्याख्या नहीं करते।
- जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
- वनों की कटाई (Deforestation)
- अत्यधिक बाढ़ या नदियों का सूख जाना (जैसे सरस्वती नदी)।
- एकीकरण का अंत: सबसे प्रबल तर्क यह है कि ‘हड़प्पाई राज्य’ जैसा सुदृढ़ एकीकरण तत्व समाप्त हो गया था।
आक्रमण का सिद्धांत: एक विवाद (The Invasion Debate)
क्या आर्यों ने हड़प्पा सभ्यता को नष्ट किया?
1. सिद्धांत का प्रतिपादन (R.E.M. Wheeler, 1947)
मोहनजोदड़ो की ‘डेडमेन लेन’ (Deadman Lane) में मिले नरकंकालों को आधार बनाकर व्हीलर ने तर्क दिया कि सभ्यता का अंत एक बाहरी आक्रमण से हुआ।
2. खंडन (George Dales, 1964)
डेल्स ने सिद्ध किया कि ये अस्थि-पंजर एक ही काल के नहीं थे।
- विनाश का कोई स्तर (Layer of destruction) नहीं मिला।
- व्यापक अग्निकांड के चिह्न नहीं हैं।
- कवचधारी सैनिकों के शव नहीं मिले हैं।
3. नवीनतम साक्ष्य: राखीगढ़ी DNA (2013-2019)
राखीगढ़ी (हरियाणा) से प्राप्त कंकाल के DNA विश्लेषण से पता चला कि हड़प्पावासी इस क्षेत्र के मूल निवासी (Indigenous) थे।
हड़प्पा सभ्यता की खोज (Discovery)
From Confusion to Clarity
जब हड़प्पा सभ्यता के शहर नष्ट हो गए, तो लोग धीरे-धीरे उनके विषय में सब कुछ भूल गए। बाद में जब लोगों ने यहाँ ईंटें चुराना या खेती करना शुरू किया, तो उन्हें अपरिचित वस्तुएँ मिलीं, जिनका अर्थ वे समझ नहीं पाए।
1 कनिंघम का भ्रम (Cunningham’s Confusion)
- परिचय: अलेक्जेंडर कनिंघम, भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) के पहले डायरेक्टर जनरल।
- रुचि: उनकी मुख्य रुचि आरंभिक ऐतिहासिक काल (6ठी शताब्दी ई.पू. से 4थी शताब्दी ईस्वी) में थी।
- मार्गदर्शन: वे लिखित स्रोतों (जैसे चीनी बौद्ध तीर्थयात्रियों के वृत्तांत) का प्रयोग करना पसंद करते थे।
- गलती क्या हुई? हड़प्पा चीनी यात्रियों के यात्रा-कार्यक्रम (Itinerary) में नहीं था। जब एक अंग्रेज ने उन्हें हड़प्पाई मुहर दी, तो उन्होंने उसे उस काल-खंड (ऐतिहासिक काल) में दिनांकित करने का असफल प्रयास किया जिससे वे परिचित थे। वे हड़प्पा की प्राचीनता को समझ नहीं पाए।
“उन्होंने सोचा कि भारतीय इतिहास गंगा की घाटी के शहरों के साथ शुरू हुआ था।”
2 एक नवीन प्राचीन सभ्यता (1920s)
हड़प्पा में मुहरें खोज निकालीं (जो ऐतिहासिक काल से बहुत पुरानी थीं)।
मोहनजोदड़ो में मुहरें ढूँढ़ीं, जिससे यह सिद्ध हुआ कि दोनों स्थल एक ही संस्कृति के भाग हैं।
सर जॉन मार्शल (1924)
ASI के डायरेक्टर जनरल के रूप में, उन्होंने पूरे विश्व के सामने सिंधु घाटी में एक नवीन सभ्यता की खोज की घोषणा की।
“मार्शल ने भारत को जहाँ पाया था, उसे उससे तीन हज़ार वर्ष पीछे छोड़ा” – एस.एन. राव
पुरातत्व तकनीक: स्तर-विन्यास (Stratigraphy)
पुरास्थल के टीले (Mounds) क्रमिक परतों (Layers) से बनते हैं।
- सबसे निचले स्तर = प्राचीनतम (Oldest)
- सबसे ऊपरी स्तर = नवीनतम (Newest)
- बंजर स्तर: वह परत जहाँ किसी बसावट के सबूत नहीं मिलते (परित्याग का काल)।
3 नयी तकनीकें (Wheeler, 1944)
आर.ई.एम. व्हीलर (R.E.M. Wheeler)
इन्होंने मार्शल की गलती सुधारी। उन्होंने पहचाना कि एकसमान क्षैतिज इकाइयों के बजाय टीले के स्तर-विन्यास (Stratigraphy) का अनुसरण करना आवश्यक था।
सैनिक परिशुद्धता (Military Precision)विभाजन का प्रभाव (Post-1947)
चूँकि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान में चले गए, भारतीय पुरातत्वविदों ने भारत में नए स्थलों को ढूँढा:
आधुनिक अन्वेषण (1980s onwards)
अब अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से सतह अन्वेषण (Surface Exploration) और वैज्ञानिक तकनीकों (मिट्टी/पत्थर/वनस्पति अवशेषों का सूक्ष्म विश्लेषण) पर जोर दिया जा रहा है।
अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएँ
Problems of Piecing Together the Past
1. क्या बचता है? (The Survival Issue)
पुरातत्व केवल भौतिक अवशेषों पर निर्भर है। समस्या यह है कि जैविक पदार्थ (कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी, सरकंडे) उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अक्सर सड़ जाते हैं।
जो बचता है: पत्थर, पकी मिट्टी (Terracotta), और धातु।
2. खोजों का वर्गीकरण (Classification of Finds)
यह सरल है: पत्थर, मिट्टी, धातु, अस्थि, हाथीदाँत आदि।
क्या यह औजार है, आभूषण है, या आनुष्ठानिक वस्तु? यह तय करना कठिन होता है।
मनके, चक्कियाँ, पत्थर के फलक—इनका कार्य आज की वस्तुओं से समानता के आधार पर समझा जाता है।
वस्तु कहाँ मिली? घर में, नाले में, कब्र में या भट्ठी में? इससे उसका उपयोग तय होता है।
3. व्याख्या की समस्याएँ: धार्मिक प्रथाएँ
पुरातत्वविद अक्सर “असामान्य और अपरिचित” वस्तुओं को धार्मिक महत्व का मान लेते हैं।
मातृदेवियाँ (Mother Goddesses)
आभूषणों से लदी हुई नारी मृण्मूर्तियाँ, जिनके शीर्ष पर विस्तृत प्रसाधन थे।
आद्य शिव (Proto-Shiva)
मुहरों पर एक पुरुष जिसे ‘योगी’ की मुद्रा में बैठे और जानवरों से घिरा (पशुपति) दिखाया गया है।
लिंग और प्रकृति पूजा
पत्थर की शंक्वाकार वस्तुओं को लिंग माना गया। पेड़-पौधे (पीपल) और एकश्रृंगी जानवर (Unicorn) भी धार्मिक संकेत माने गए।
व्याख्या का संकट: शिव या शमन? (The Rudra Conundrum)
अतः यह चित्रण वैदिक रुद्र से मेल नहीं खाता। कुछ विद्वान इसे शमन (Shaman) मानते हैं।
महत्वपूर्ण कालरेखा (Timelines)
1. आरंभिक भारतीय पुरातत्व के प्रमुख कालखंड (Major Periods)
आरंभिक कृषक तथा पशुपालक।
ताँबे का पहली बार प्रयोग।
नगरीय सभ्यता का विकास (परिपक्व चरण)।
सामाजिक भिन्नताओं का अवलोकन
Strategies to Find Social Differences
1 शवाधानों का अध्ययन (Study of Burials)
“मिस्र के पिरामिडों (जो हड़प्पा के समकालीन थे) में राजकीय धन-संपत्ति दफनाई जाती थी, लेकिन हड़प्पा में ऐसा नहीं था।”
2 ‘विलासिता’ की वस्तुओं की खोज
पुरातत्वविदों ने पुरावस्तुओं को दो वर्गों में वर्गीकृत किया है:
A. उपयोगी वस्तुएँ (Utilitarian)
रोज़मर्रा के उपयोग की वस्तुएँ जो पत्थर या मिट्टी जैसे सामान्य पदार्थों से बनी थीं।
उदाहरण: चक्कियाँ, मृदभांड, सुइयां, झाँवा (flesh-rubbers)। ये बस्तियों में सर्वत्र मिलती हैं।
B. विलास की वस्तुएँ (Luxuries)
महँगी, दुर्लभ, स्थानीय स्तर पर अनुपलब्ध पदार्थों से या जटिल तकनीकों से बनी वस्तुएँ।
वर्गीकरण की समस्या
यदि फ़यॉन्स (दुर्लभ पदार्थ) से बनी तकलियाँ (Spindle whorls – रोजमर्रा की वस्तु) मिलती हैं, तो पुरातत्वविद दुविधा में पड़ जाते हैं कि इसे ‘उपयोगी’ माना जाए या ‘विलास’ की वस्तु।
संचय (Hoards)
सावधानीपूर्वक पात्रों (घड़ों) में दबाकर रखी गई वस्तुएँ। अधिकांश स्वर्णाभूषण संचयों से ही मिले हैं। यह दर्शाता है कि सोना अत्यंत कीमती था।