राजनीतिक दल Political Parties
लोकतंत्र के आधारस्तंभ: प्रकृति, कार्य, चुनौतियाँ और सुधार
परिचय और अर्थ
Introduction and Meaning
राजनीतिक दल क्या है?
राजनीतिक दल लोगों का एक ऐसा संगठित समूह है जो चुनाव लड़ने और सरकार में राजनीतिक सत्ता हासिल करने के उद्देश्य से काम करता है। ये समाज के ‘सामूहिक हित’ (Collective Good) को ध्यान में रखकर कुछ नीतियाँ और कार्यक्रम बनाते हैं। चूँकि हर किसी की राय अलग हो सकती है, इसलिए दल लोगों को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि उनकी नीतियाँ दूसरों से बेहतर क्यों हैं। वे चुनावों के माध्यम से इन नीतियों को लागू करने का प्रयास करते हैं।
राजनीतिक दल बनाम दबाव समूह (Political Parties vs. Pressure Groups)
अंतर 1 लक्ष्य (Goal)
प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक सत्ता हासिल करना और सरकार बनाना।
सत्ता पाना नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों को बाहर से प्रभावित (Influence) करना।
अंतर 2 माध्यम (Method)
ये चुनाव लड़ते हैं और अपने उम्मीदवार खड़े करते हैं।
ये चुनाव नहीं लड़ते। ये आंदोलन, प्रचार और लॉबिंग (Lobbying) का सहारा लेते हैं।
अंतर 3 दायरा (Scope)
इनका नजरिया विस्तृत होता है। ये समाज के सभी मुद्दों (शिक्षा, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था) पर काम करते हैं।
ये अक्सर किसी एक विशेष मुद्दे या वर्ग (जैसे- किसान, मजदूर, व्यापारी) तक सीमित होते हैं।
अंतर 4 जवाबदेही (Accountability)
ये पूरी जनता के प्रति जवाबदेह होते हैं।
ये मुख्य रूप से अपने समूह के सदस्यों के प्रति जवाबदेह होते हैं।
राजनीतिक दल के तीन प्रमुख हिस्से:
नेता (Leaders)
ये पार्टी के शीर्ष पर होते हैं। यही बड़े नीतिगत फैसले लेते हैं, चुनाव लड़ते हैं और सरकार बनने पर मंत्री पद संभालते हैं।
सक्रिय सदस्य (Active Members)
ये पार्टी संगठन की रीढ़ होते हैं। ये नेताओं के निर्देशों को ज़मीन पर उतारते हैं, रैलियाँ करते हैं और घर-घर प्रचार करते हैं।
अनुयायी (Followers)
ये पार्टी के सदस्य नहीं होते, लेकिन उसकी विचारधारा में विश्वास रखते हैं और चुनावों में उसे वोट देकर समर्थन देते हैं।
दल-गत भावना (Partisanship)
राजनीतिक दल समाज के किसी एक हिस्से से जुड़े होते हैं, इसलिए उनका नजरिया समाज के उस वर्ग/हिस्से की तरफ झुका होता है। इसे ही ‘दल-गत भावना’ कहते हैं।
“एक ‘पार्टीशन’ (Partisan) वह व्यक्ति होता है जो किसी दल, समूह या गुट के प्रति पूरी तरह समर्पित होता है और संतुलित विचार रखने में असमर्थ होता है।”
आम जनता अक्सर राजनीतिक दलों को लोकतंत्र की हर बुराई के लिए जिम्मेदार मानती है। अगर आप दूर-दराज के इलाक़ों में जाएँ, तो लोगों को संविधान के बारे में पता हो न हो, पर राजनीतिक दलों के बारे में ज़रूर पता होता है।
[अतिरिक्त जानकारी] चुनाव प्रचार का बदलता स्वरूप
पहले दीवार लेखन (Wall Writing) चुनाव प्रचार का सबसे सस्ता तरीका था। लेकिन अब चुनाव आयोग ने इस पर रोक लगा दी है, जिससे पार्टियों को प्रचार के नए तरीके अपनाने पड़ रहे हैं।
राजनीतिक दल के कार्य
Functions of Political Parties
चुनाव लड़ना
Contesting Electionsलोकतंत्र में चुनाव राजनीतिक दलों द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवारों के बीच लड़ा जाता है। पार्टियाँ अपने उम्मीदवार चुनती हैं (भारत में शीर्ष नेता, अमेरिका में सदस्य) और उन्हें चुनाव चिन्ह देती हैं।
नीतियां और कार्यक्रम
Policiesदल अलग-अलग नीतियों को मतदाताओं के सामने रखते हैं। वे हजारों विचारों को कुछ मुख्य मुद्दों में समेटते हैं ताकि सरकार उन्हें लागू कर सके। मतदाता अपनी पसंद की नीतियों के लिए वोट देते हैं।
कानून निर्माण
Law Makingदेश के कानून निर्माण में दल निर्णायक भूमिका निभाते हैं। कानूनों पर औपचारिक बहस विधायिका में होती है, लेकिन सदस्य अपने नेता के निर्देश (व्हिप) के अनुसार ही वोट देते हैं।
सरकार बनाना
Forming Govtदल ही सरकार बनाते और चलाते हैं। वे बड़े नीतिगत फैसले लेते हैं। पार्टियाँ नेता चुनती हैं, उन्हें प्रशिक्षित करती हैं और मंत्री बनाती हैं ताकि वे पार्टी के सिद्धांतों के अनुसार शासन चला सकें।
विपक्ष की भूमिका
Role of Oppositionचुनाव हारने वाले दल ‘विरोधी पक्ष’ कहलाते हैं। उनकी भूमिका लोकतंत्र के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे:
जनमत निर्माण
Public Opinionदल मुद्दों को उठाते हैं और उन पर बहस करते हैं। लाखों कार्यकर्ताओं के माध्यम से वे लोगों की समस्याओं को सरकार तक पहुँचाते हैं और समाज में एक राय (Opinion) बनाते हैं।
योजनाओं तक पहुँच
Welfare Accessसाधारण नागरिक के लिए किसी सरकारी अधिकारी की तुलना में नेता से मिलना आसान होता है। दल सरकारी योजनाओं को लोगों तक पहुँचाने का माध्यम बनते हैं।
राजनीतिक दल की ज़रूरत क्यों?
कल्पना करें: यदि दल न हों तो क्या होगा?
- निर्दलीय उम्मीदवार: सारे उम्मीदवार स्वतंत्र होंगे। वे केवल अपने स्थानीय क्षेत्र के विकास के लिए वचनबद्ध होंगे, देश की बड़ी नीतियों के लिए कोई जिम्मेदार नहीं होगा।
- नीतिगत अनिश्चितता: कोई भी बड़े नीतिगत बदलाव (जैसे विदेश नीति या राष्ट्रीय सुरक्षा) के बारे में लोगों से चुनावी वायदे नहीं कर पाएगा, क्योंकि हर किसी की राय अलग होगी।
- जवाबदेही का अभाव: निर्वाचित प्रतिनिधि सिर्फ अपने क्षेत्र के कामों के लिए जवाबदेह होंगे। देश कैसे चले और सरकार की स्थिरता के लिए कोई उत्तरदायी नहीं होगा।
दलों का होना क्यों अनिवार्य है?
जैसे-जैसे समाज बड़े और जटिल होते जाते हैं, उन्हें विभिन्न मुद्दों पर अलग-अलग विचारों को समेटने और सरकार की नज़र में लाने के लिए किसी माध्यम या एजेंसी की ज़रूरत होती है।
- प्रतिनिधित्व: विभिन्न जगहों से आए प्रतिनिधियों को साथ लाने के लिए ताकि एक ज़िम्मेदार सरकार बन सके।
- नीतियाँ बनाना: सरकार को समर्थन देने या उस पर अंकुश लगाने, नीतियाँ बनवाने और उनकी पैरवी करने के लिए एक तंत्र की ज़रूरत होती है।
[अतिरिक्त जानकारी] प्रतिनिधिक लोकतंत्र (Representative Democracy)
राजनीतिक दलों का उदय प्रतिनिधिक लोकतंत्र के उभार के साथ जुड़ा हुआ है। बड़े समाजों में सीधे शासन करना संभव नहीं है, इसलिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं और दल उन्हें संगठित करते हैं। यही कारण है कि दुनिया के लगभग सभी लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक दल पाए जाते हैं।
[अतिरिक्त जानकारी] वैश्विक परिदृश्य में भारत
आमतौर पर पूरी दुनिया में लोग राजनीतिक दलों पर कम भरोसा करते हैं, लेकिन भारत में तस्वीर थोड़ी अलग है। भारत में खुद को किसी दल का सदस्य बताने वालों का अनुपात कनाडा, जापान, स्पेन और दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों से भी ज्यादा है।
दलीय व्यवस्था के प्रकार
Types of Party Systems
| व्यवस्था | विशेषताएँ | गुण (Merits) | दोष (Demerits) |
|---|---|---|---|
| एकदलीय व्यवस्था (One Party) |
सिर्फ एक ही दल को सरकार बनाने और चलाने की अनुमति है। चुनाव होते हैं पर वास्तविक प्रतिस्पर्धा नहीं होती। उदा: चीन (कम्युनिस्ट पार्टी) |
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| दो दलीय व्यवस्था (Two Party) |
सत्ता मुख्य रूप से दो मुख्य दलों के बीच बदलती रहती है। अन्य छोटे दल हो सकते हैं पर वे सरकार नहीं बना पाते। उदा: अमरीका, ब्रिटेन |
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| बहुदलीय व्यवस्था (Multi Party) |
अनेक दल सत्ता के लिए होड़ में होते हैं। दो से अधिक दलों के अपने दम पर या गठबंधन करके सत्ता में आने की संभावना होती है। उदा: भारत, फ्रांस |
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1. एकदलीय व्यवस्था (One Party System)
इस व्यवस्था में, यद्यपि कानूनी रूप से लोग राजनीतिक दल बना सकते हैं, लेकिन चुनावी प्रणाली या संविधान ऐसा होता है कि सत्ता के लिए स्वतंत्र प्रतिस्पर्धा की अनुमति नहीं मिलती। इसे एक अच्छा लोकतांत्रिक विकल्प नहीं माना जाता क्योंकि लोकतंत्र के लिए कम से कम दो दलों का होना आवश्यक है ताकि लोगों के पास वास्तविक विकल्प हो।
2. दो-दलीय व्यवस्था (Bi-Party System)
यहाँ कई अन्य दल हो सकते हैं, चुनाव लड़ सकते हैं और कुछ सीटें जीत भी सकते हैं, लेकिन केवल दो मुख्य दलों के पास ही सरकार बनाने के लिए बहुमत हासिल करने का गंभीर मौका होता है। जैसे ब्रिटेन में ‘लेबर पार्टी’ और ‘कंजरवेटिव पार्टी’ और अमेरिका में ‘रिपब्लिकन’ और ‘डेमोक्रेट’।
3. बहुदलीय व्यवस्था (Multi-Party System)
भारत जैसे विशाल विविधता वाले देश के लिए यह व्यवस्था सबसे उपयुक्त है क्योंकि दो या तीन दल इतने बड़े देश की सारी सामाजिक और भौगोलिक विविधता को समेट नहीं सकते। यह प्रणाली बहुत गड़बड़ और अस्थिर लग सकती है, लेकिन यह विभिन्न हितों और रायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व की अनुमति देती है।
उदाहरण:
- NDA: राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (भाजपा नेतृत्व)
- UPA: संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (कांग्रेस नेतृत्व)
- वाम मोर्चा: Left Front
नोट: दलीय व्यवस्था का चुनाव कोई देश अपनी मर्जी से नहीं करता; यह वहां के समाज की प्रकृति, इतिहास और विभाजन से विकसित होता है।
राष्ट्रीय राजनीतिक दल (National Parties)
मान्यता प्राप्त दल (NCERT 2024-25 अद्यतन)
राष्ट्रीय दल की मान्यता की शर्तें (कोई एक पूरी हो):
- लोकसभा या 4 राज्यों के विधानसभा चुनावों में 6% वोट + लोकसभा में 4 सीटें।
- या लोकसभा की कुल सीटों का 2% (11 सीटें) जीतें, जो कम से कम 3 अलग-अलग राज्यों से हों।
- या दल को कम से कम 4 राज्यों में ‘राज्यीय दल’ की मान्यता प्राप्त हो।
[अतिरिक्त] चुनाव चिन्ह:
चुनाव आयोग मान्यता प्राप्त दलों के लिए चुनाव चिन्ह आरक्षित करता है। केवल उस पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार ही उस चिन्ह का प्रयोग कर सकता है।
[अतिरिक्त जानकारी] मोहम्मद यूनुस और ‘नागरिक शक्ति’
बांग्लादेश के नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस ने 2007 में एक नई पार्टी ‘नागरिक शक्ति’ बनाने का प्रयास किया था। उनका उद्देश्य था कि पुराने ढर्रे की राजनीति को बदला जाए। यह एक उदाहरण है कि कैसे गैर-राजनीतिक लोग भी सुधार के लिए राजनीति में आने की कोशिश करते हैं। (स्रोत: पृष्ठ 62, बॉक्स)
1. आम आदमी पार्टी (AAP)
2012- उद्भव: अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी जन लोकपाल आंदोलन से जन्मी पार्टी।
- विचारधारा: स्वराज, जवाबदेही, स्वच्छ प्रशासन और पारदर्शिता। यह पार्टी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के ‘दिल्ली मॉडल’ पर जोर देती है।
- स्थिति: दिल्ली और पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार। गोवा और गुजरात में भी उपस्थिति। 2023 में इसे राष्ट्रीय दल का दर्जा मिला।
2. बहुजन समाज पार्टी (BSP)
1984- नेतृत्व: स्व. कांशीराम द्वारा गठित। वर्तमान में सुश्री मायावती प्रमुख हैं।
- आधार: ‘बहुजन समाज’ जिसमें दलित, आदिवासी, पिछड़ी जातियाँ और धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल हैं।
- प्रेरणा: साहू महाराज, महात्मा फुले, पेरियार रामास्वामी नायकर और बाबासाहेब आंबेडकर के विचारों से प्रेरित।
- उद्देश्य: दलितों और शोषितों के लिए राजनीतिक सत्ता और सामाजिक न्याय हासिल करना। इसका मुख्य आधार उत्तर प्रदेश में है।
3. भारतीय जनता पार्टी (BJP)
1980- मूल: श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा 1951 में गठित ‘भारतीय जनसंघ’ का पुनर्जन्म।
- विचारधारा: सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (हिंदुत्व) और अंत्योदय (पंक्ति के अंतिम व्यक्ति का उदय)। यह भारत की प्राचीन संस्कृति और मूल्यों से प्रेरणा लेकर आधुनिक भारत बनाना चाहती है।
- लक्ष्य: जम्मू-कश्मीर का पूर्ण एकीकरण (धारा 370 हटाना), समान नागरिक संहिता (UCC), और धर्मांतरण पर रोक।
- स्थिति: वर्तमान में दुनिया का सबसे बड़ा राजनीतिक दल (सदस्यता के आधार पर)। 2014 और 2019 में पूर्ण बहुमत।
4. सीपीआई – मार्क्ससिस्ट (CPI-M)
1964- विचारधारा: मार्क्सवाद-लेनिनवाद में विश्वास। समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र का समर्थन। साम्राज्यवाद और सांप्रदायिकता का विरोध।
- आधार: पश्चिम बंगाल (लगातार 34 साल शासन का रिकॉर्ड), केरल और त्रिपुरा में मज़बूत पकड़।
- समर्थक वर्ग: गरीब, कारखाना मज़दूर, खेतिहर मज़दूर और बुद्धिजीवी।
- आर्थिक रुख: नई आर्थिक नीतियों और उदारीकरण की आलोचक है क्योंकि वे मानते हैं इससे आर्थिक असमानता बढ़ती है।
5. इंडियन नेशनल काँग्रेस (INC)
1885- इतिहास: दुनिया के सबसे पुराने दलों में से एक। भारत की आज़ादी में केंद्रीय भूमिका और स्वतंत्रता के बाद कई दशकों तक सत्ता में रही।
- विचारधारा: मध्यमार्गी (न वामपंथी, न दक्षिणपंथी)। धर्मनिरपेक्षता और “सर्वधर्म समभाव” में अटूट विश्वास।
- नीतियां: कमजोर वर्गों, गरीबों और अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा। नई आर्थिक नीतियों का समर्थन करती है पर “मानवीय चेहरे” के साथ।
- गठबंधन: संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) का नेतृत्व करती है।
6. नेशनल पीपुल्स पार्टी (NPP)
2013- नेतृत्व: पी. ए. संगमा द्वारा गठित। चुनाव चिन्ह ‘किताब’ है।
- महत्व: यह पूर्वोत्तर भारत का पहला और एकमात्र दल है जिसे राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त है।
- आधार: मुख्य रूप से मेघालय में (जहाँ इसकी सरकार है), साथ ही मणिपुर, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में उपस्थिति।
- दर्शन: आदिवासी हितों की रक्षा, साक्षरता बढ़ाना, और क्षेत्रीय संस्कृति का संरक्षण।
क्षेत्रीय दल (Regional Parties)
निर्वाचन आयोग इन्हें ‘राज्यीय दल’ कहता है। यह ज़रूरी नहीं कि ये अपनी विचारधारा में क्षेत्रीय ही हों।
राज्यीय दल की मान्यता की शर्तें (कोई एक पूरी हो):
- विधानसभा चुनाव में 6% वोट + 2 सीटें।
- या राज्य में लोकसभा चुनाव में 6% वोट + 1 लोकसभा सीट।
- या विधानसभा की कुल सीटों का 3% या 3 सीटें (जो भी ज्यादा हो)।
- या राज्य में हुए लोकसभा या विधानसभा चुनाव में कुल वैध मतों का 8% प्राप्त करें (बिना किसी सीट के भी)।
प्रमुख क्षेत्रीय दलों की राज्यवार सूची:
उत्तर व मध्य भारत
पश्चिम व दक्षिण भारत
पूर्व व पूर्वोत्तर भारत
क्या लोग दलों से जुड़े हैं? (People’s Participation)
भागीदारी का स्तर (Level of Participation)
अक्सर यह माना जाता है कि दलों की लोकप्रियता गिर रही है, लेकिन भारत में आंकड़े कुछ और कहानी कहते हैं। भारत में राजनीतिक भागीदारी बढ़ रही है।
- सदस्यता: भारत में राजनीतिक दलों की सदस्यता का अनुपात पिछले 30 सालों में लगातार बढ़ा है।
- निकटता: खुद को किसी दल का ‘करीबी’ बताने वालों की संख्या भी बढ़ी है।
- प्रचार में हिस्सा: भारत में चुनाव प्रचार में भाग लेने वाले लोगों का प्रतिशत दुनिया में सबसे ज़्यादा में से एक है।
विश्वास का संकट (Crisis of Trust)
यह एक दिलचस्प विरोधाभास है। जहाँ एक तरफ लोग दलों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उन पर भरोसा नहीं करते।
- सबसे कम भरोसा: दुनिया भर के लोकतन्त्रों में (भारत सहित), ‘राजनीतिक दल’ उन संस्थाओं में से हैं जिन पर लोग सबसे कम भरोसा करते हैं।
- दोषारोपण: अपनी ज़्यादातर समस्याओं के लिए लोग दलों को ही जिम्मेदार मानते हैं।
भारत बनाम अन्य देश
विकसित देशों (जैसे कनाडा, जापान, स्पेन) में दलों की सदस्यता और भागीदारी घट रही है, जबकि भारत में यह बढ़ रही है। इसका एक कारण यह है कि भारत में लोगों को लगता है कि दलों के ज़रिए वे सरकारी नीतियों को बदल सकते हैं और अपने जीवन में सुधार ला सकते हैं।
राजनीतिक दलों के सामने चुनौतियाँ
Challenges to Political Parties
आंतरिक लोकतंत्र का अभाव
Lack of Internal Democracyदुनिया भर में यह प्रवृत्ति बन गई है कि सारी ताकत एक या कुछ शीर्ष नेताओं के हाथ में सिमट जाती है।
- सदस्यों की खुली सूची या नियमित बैठकें नहीं होतीं।
- आंतरिक चुनाव नहीं होते, कार्यकर्ताओं को जानकारी नहीं मिलती।
- सिद्धांतों से ज़्यादा ‘नेताओं के प्रति वफादारी’ अहम हो जाती है।
वंशवाद की चुनौती
Dynastic Successionपारदर्शिता न होने के कारण सामान्य कार्यकर्ता के लिए शीर्ष पद तक पहुँचना लगभग असंभव होता है।
- सत्ताधारी लोग अपने परिवार या दोस्तों को अनुचित लाभ पहुँचाते हैं।
- शीर्ष पद अक्सर एक ही परिवार के नियंत्रण में होते हैं।
- अनुभवहीन या बिना जनाधार वाले लोग ताकतवर पदों पर आ जाते हैं।
पैसा और अपराधी तत्व
Money and Muscle Powerचुनाव जीतने की चिंता में दल कोई भी जायज-नाजायज तरीका अपनाने से नहीं चूकते।
- पैसे वाले उम्मीदवारों को टिकट दिया जाता है।
- अमीर चंदा देने वाले नीतियों को प्रभावित करते हैं।
- जीतने के लिए अपराधियों का समर्थन लिया जाता है या उन्हें टिकट दिया जाता है।
विकल्पहीनता
Lack of Meaningful Choiceविभिन्न पार्टियों की नीतियों और कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण अंतर कम हुआ है, जिससे सार्थक विकल्प नहीं मिल पाता।
- बड़ी पार्टियों के बीच आर्थिक और बुनियादी मुद्दों पर वैचारिक समानता बढ़ गई है।
- अलग नीतियाँ चाहने वालों के पास कोई विकल्प नहीं होता।
- नेताओं के दल बदलने से विकल्प और भी सीमित हो जाते हैं।
[अतिरिक्त] बर्लुस्कोनी और कारपोरेट राजनीति
इटली के प्रधानमंत्री बर्लुस्कोनी का उदाहरण यह दिखाता है कि कैसे बड़े व्यवसायी राजनीति को नियंत्रित कर सकते हैं। वे इटली के बड़े मीडिया हाउस, बैंक और फुटबॉल क्लब के मालिक थे, जिसने उन्हें सत्ता में आने में मदद की।
दल-बदल कानून (Anti-Defection Law)
10वीं अनुसूची और 52वां संविधान संशोधन
दल-बदल क्या है? (What is Defection?)
विधायिका के लिए किसी दल विशेष से चुना गया प्रतिनिधि जब उस दल को छोड़कर किसी दूसरे दल में शामिल हो जाता है, तो इसे दल-बदल कहते हैं।
मुख्य प्रावधान
- अयोग्यता: अगर कोई निर्वाचित सदस्य अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदन की सदस्यता खत्म हो जाएगी।
- व्हिप का उल्लंघन: अगर सदस्य पार्टी निर्देश (Whip) के खिलाफ वोट करता है या अनुपस्थित रहता है, और 15 दिन में पार्टी उसे माफ नहीं करती, तो वह अयोग्य हो जाएगा।
- निर्णय: अयोग्यता का अंतिम फैसला सदन के अध्यक्ष (Speaker) का होता है।
उद्देश्य और प्रभाव
- उद्देश्य: 1985 में 52वें संशोधन द्वारा इसे लाया गया ताकि ‘आया राम, गया राम’ (बार-बार पार्टी बदलने) की राजनीति पर रोक लगे और सरकारें स्थिर रहें।
- अपवाद (Exception): अगर किसी पार्टी के कम से कम 2/3 सदस्य एक साथ अलग होकर दूसरी पार्टी में विलय (Merger) करते हैं, तो उन पर यह कानून लागू नहीं होता।
दलों को सुधारने के उपाय
Reforms in Political Parties
हाल में किए गए प्रयास (Recent Efforts)
दल-बदल कानून
विधायकों/सांसदों को चुनाव जीतने के बाद पार्टी बदलने से रोकने के लिए संविधान में संशोधन (52वां)। उल्लंघन करने पर अपनी सीट गँवानी पड़ती है।
शपथ पत्र (Affidavit)
सुप्रीम कोर्ट के आदेश से हर उम्मीदवार को नामांकन के समय अपनी संपत्ति और अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों का ब्यौरा देना अनिवार्य है।
संगठन चुनाव
चुनाव आयोग ने एक आदेश के जरिए सभी दलों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे अपने सांगठनिक चुनाव कराएं और अपना आयकर रिटर्न भरें।
भविष्य के सुझाव (Future Suggestions)
आंतरिक कामकाज का कानून
राजनीतिक दलों के आंतरिक कामकाज को व्यवस्थित करने के लिए कानून बने। सदस्यों का रजिस्टर रखना, अपने संविधान का पालन करना और विवादों के लिए स्वतंत्र प्राधिकारी (Judge) रखना अनिवार्य हो।
महिलाओं के लिए आरक्षण
यह अनिवार्य किया जाए कि दल अपने टिकटों का कम से कम एक-तिहाई (33%) हिस्सा महिलाओं को दें। दल के फैसला लेने वाले पदों पर भी महिलाओं का कोटा हो।
चुनाव का सरकारी खर्च (State Funding)
सरकार चुनाव लड़ने के लिए दलों को धन दे। यह मदद पेट्रोल, कागज, फोन आदि के रूप में या नकद हो सकती है। इससे अमीर चंद्रादाताओं का प्रभाव कम होगा।
नागरिकों की भूमिका
- दबाव बनाना: लोग, दबाव समूह, आंदोलन और मीडिया के जरिए दलों पर सुधार के लिए दबाव बना सकते हैं। अगर दलों को लगेगा कि सुधार न करने से उनका जनाधार गिरेगा, तो वे गंभीर होंगे।
- भागीदारी: लोकतंत्र की गुणवत्ता नागरिकों की सक्रियता पर निर्भर करती है। बाहर से आलोचना करने के बजाय राजनीति में उतर कर ही इसे सुधारा जा सकता है।
अति-विनियमन (Over-regulation) की चेतावनी
राजनीतिक दलों पर बहुत ज्यादा सख्त कानून थोपना भी नुकसानदेह हो सकता है।
- इससे दल कानून को दरकिनार करने के रास्ते ढूँढने लगेंगे।
- सभी दल मिलकर ऐसे कानून पास ही नहीं होने देंगे जो उन्हें पसंद न हों।
“खराब राजनीति का समाधान राजनीति से हटना नहीं, बल्कि ज्यादा और बेहतर राजनीति है।”