भूमंडलीकृत विश्व का बनना The Making of a Global World
वैश्वीकरण का इतिहास केवल 50 साल पुराना नहीं है। प्राचीन काल से यात्री, व्यापारी और पुजारी अपने साथ सामान, पैसा, विचार, हुनर और यहाँ तक कि कीटाणु भी ले जाते थे।
क्या आप जानते हैं? मालदीव की कौड़ियाँ (Cowries), जिन्हें पैसे या मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, हजारों साल पहले चीन और पूर्वी अफ्रीका तक पहुँचती थीं।
1. आधुनिक युग से पहले
रेशम मार्ग और भोजन की यात्रा
रेशम मार्ग (Silk Route)
यह मार्गों का विशाल नेटवर्क था जो एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जोड़ता था। यह 15वीं शताब्दी तक अस्तित्व में था।
- निर्यात (एशिया से): चीनी रेशम (Silk), चीनी पॉटरी (Pottery), भारत के मसाले और कपड़े।
- आयात (यूरोप से): सोना और चाँदी जैसी कीमती धातुएँ।
- धर्म: शुरुआती ईसाई मिशनरी, मुस्लिम धर्मोपदेशक और बौद्ध धर्म (जो पूर्वी भारत से उपजा) इसी मार्ग से दुनिया में फैले।
भोजन की यात्रा
नूडल्स से स्पैघेत्ती
माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम पहुँचे और स्पैघेत्ती बने। पास्ता अरब यात्रियों के साथ 5वीं सदी में सिसिली (इटली) पहुँचा।
अमेरिका की खोज
आलू, सोया, मक्का, टमाटर, मिर्च, शकरकंद आदि कोलंबस की अमेरिका खोज के बाद ही दुनिया को मिले।
आयरलैंड के गरीब किसान आलू पर इतने निर्भर थे कि 1840 के दशक के मध्य में फसल खराब होने पर 10 लाख (10,00,000) लोग भूख से मर गए।
2. विजय, बीमारी और व्यापार (16वीं सदी)
विश्व का ‘सिकुड़ना’: 16वीं सदी में जब यूरोपीय जहाज़ियों ने एशिया तक का समुद्री रास्ता ढूँढ़ लिया और वे पश्चिमी सागर को पार करते हुए अमेरिका तक जा पहुँचे, तो पूर्व-आधुनिक विश्व बहुत छोटा सा दिखाई देने लगा।
हिंद महासागर का महत्व: इससे पहले कई सदियों से हिंद महासागर के पानी में फलता-फूलता व्यापार, तरह-तरह के सामान, लोग, ज्ञान और परंपराएँ एक जगह से दूसरी जगह आ-जा रही थीं। भारतीय उपमहाद्वीप इन प्रवाहों के रास्ते में एक अहम बिंदु था। यूरोपीयों के दाखिले से यह आवाजाही और बढ़ने लगी और इन प्रवाहों की दिशा यूरोप की तरफ़ भी मुड़ने लगी।
अपनी ‘खोज’ से पहले लाखों साल से अमेरिका का दुनिया से कोई संपर्क नहीं था। लेकिन 16वीं सदी से उसकी विशाल भूमि और बेहिसाब फ़सलें व खनिज पदार्थ हर दिशा में जीवन का रूप-रंग बदलने लगे।
चेचक (Smallpox) – जैविक हथियार
लाखों साल से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिकी मूल निवासियों में चेचक से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) नहीं थी। स्पेनिश सैनिकों के साथ पहुँचे कीटाणुओं ने पूरे समुदायों को खत्म कर दिया। बंदूकों को छीना जा सकता था, पर बीमारियों को नहीं।
– जॉन विनथॉर्प (मैसाचुसेट्स के पहले गवर्नर), 1634
धन-संपदा और एल डोराडो (El Dorado)
- चाँदी का महत्व: आज के पेरू और मैक्सिको में मौजूद खानों से निकलने वाली क़ीमती धातुओं, खासतौर से चाँदी, ने यूरोप की संपदा को बढ़ाया और पश्चिम एशिया के साथ होने वाले उसके व्यापार को गति प्रदान की।
- सोने का शहर: 17वीं सदी के आते-आते पूरे यूरोप में दक्षिणी अमेरिका की धन-संपदा के बारे में तरह-तरह के क़िस्से बनने लगे थे। इन्हीं किंवदंतियों की बदौलत वहाँ के लोग ‘एल डोराडो’ को सोने का शहर मानने लगे और उसकी खोज में बहुत सारे खोजी अभियान शुरू किए गए।
चीन का अलगाव और केंद्र का बदलाव
यूरोप से पलायन क्यों? (19वीं सदी)
19वीं सदी तक यूरोप में हालात अत्यंत कठिन थे। आर्थिक तंगी और सामाजिक अशांति के कारण लगभग 5 करोड़ लोग यूरोप छोड़कर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जा बसे। इसके मुख्य कारण थे:
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गरीबी और भूख: यूरोप में गरीबी और भूख का साम्राज्य था। अक्सर अकाल पड़ते थे, जिससे आम जीवन दूभर हो गया था।
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भीड़ और बीमारियाँ: औद्योगिक शहरों में बेहिसाब भीड़ थी और घातक बीमारियाँ (जैसे चेचक, प्लेग) का बोलबाला था, जिससे मृत्यु दर अधिक थी।
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धार्मिक टकराव: धार्मिक मतभेद आम थे। जो लोग स्थापित धार्मिक विश्वासों और तरीकों को नहीं मानते थे (धार्मिक असंतुष्ट), उन्हें कड़ा दंड दिया जाता था।
3. उन्नीसवीं शताब्दी (1815-1914)
आर्थिक प्रवाह: व्यापार, श्रम और पूंजी
1. व्यापार (Trade)
कम प्रतिबंधमुख्य रूप से वस्तुओं (जैसे कपड़ा, गेहूँ) का व्यापार।
2. श्रम (Labour)
अधिक प्रतिबंधरोज़गार की तलाश में लोगों का एक जगह से दूसरी जगह पलायन।
3. पूंजी (Capital)
कम प्रतिबंधनिवेश के लिए पैसे का दूर-दराज़ के इलाकों में प्रवाह।
कॉर्न लॉ (Corn Laws)
- खाद्य पदार्थों का आयात बहुत सस्ता हो गया।
- ब्रिटिश किसान आयातित माल की कीमत का मुकाबला नहीं कर पाए।
- विशाल भूभागों पर खेती बंद हो गई।
- हजारों लोग बेरोजगार हो गए और शहरों या दूसरे देशों में पलायन कर गए।
तकनीक की भूमिका (Refrigeration)
[Image of Refrigerated Ship diagram]अमेरिका से यूरोप जिंदा जानवर भेजे जाते थे। वे जगह ज्यादा घेरते थे, मर जाते थे या बीमार पड़ जाते थे। इसलिए मांस बहुत महंगा था और गरीबों की पहुँच से बाहर था।
पानी के जहाजों में रेफ्रिजरेशन (शीतलन) की तकनीक स्थापित की गई।
- जानवरों को यात्रा से पहले ही मारा जाने लगा (अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया में)।
- केवल मांस भेजा जाने लगा जिससे समुद्री यात्रा का खर्चा कम हुआ।
- यूरोप में मांस के दाम गिर गए।
- गरीबों की खुराक में अब मक्खन और अंडे भी शामिल हो गए।
- जीवन स्तर सुधरा तो देश में शांति स्थापित हुई।
🇮🇳 भारत में ‘नहर बस्तियाँ’ (Canal Colonies)
ब्रिटिश सरकार ने पंजाब में अर्ध-रेगिस्तानी परती जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछाया ताकि निर्यात के लिए गेहूँ और कपास उगाया जा सके। यहाँ दूसरे स्थानों से लोगों को लाकर बसाया गया, जिन्हें ‘केनाल कॉलोनी’ कहा गया।
4. उपनिवेशवाद और उसका प्रभाव
रिंडरपेस्ट और गिरमिटिया मज़दूर
अफ़्रीका का बँटवारा (1885)
यूरोपीय ताकतें (ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम) 1885 में बर्लिन में मिलीं और उन्होंने अफ़्रीका को नक्शे पर सीधी लकीरें खींचकर आपस में बाँट लिया।
रिंडरपेस्ट (मवेशी प्लेग) – 1890s
यह बीमारी इतालवी सैनिकों के लिए लाए गए एशियाई जानवरों के जरिए पूर्वी अफ्रीका पहुंची और ‘जंगल की आग’ की तरह फैली। इसने 90% मवेशियों को मार डाला।
प्रभाव: अफ़्रीकियों की आजीविका खत्म हो गई। वे वेतन के लिए काम नहीं करना चाहते थे, लेकिन अब मजबूरी में यूरोपीय बागानों/खानों में श्रम करना पड़ा।
भारत से अनुबंधित श्रमिक (गिरमिटिया)
इसे ‘नई दास प्रथा’ कहा गया। लाखों भारतीयों (यूपी, बिहार, तमिलनाडु) को कैरिबियाई द्वीप (त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम), मॉरीशस और फिजी ले जाया गया।
5. भारतीय उद्यमी और व्यापार
वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका
विदेश में भारतीय उद्यमी
ये उन बैंकरों और व्यापारियों में से थे जो मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यातोन्मुखी खेती के लिए कर्ज़ देते थे।
- वे अपनी जेब से पैसा लगाते थे या यूरोपीय बैंकों से कर्ज़ लेते थे।
- उनके पास दूर-दूर तक पैसे पहुँचाने की एक व्यवस्थित पद्धति थी।
- उन्होंने व्यावसायिक संगठनों के देसी स्वरूप भी विकसित कर लिए थे।
ये व्यापारी तो यूरोपीय उपनिवेशों से भी आगे तक जा निकले। 1860 के दशक से उन्होंने दुनिया भर के बंदरगाहों पर अपने बड़े-बड़े एम्पोरियम (Emporium) खोल दिए।
व्यापार और उपनिवेशवाद
कपास का निर्यात: ब्रिटेन में औद्योगीकरण के बाद भारतीय सूती कपड़े का निर्यात गिर गया (1800 में 30% → 1870 में 3%)। इसके बदले कच्चे माल (कपास, नील, अफीम) का निर्यात बढ़ा।
व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) & होम चार्जेज
ब्रिटेन भारत को सामान ज्यादा बेचता था (फायदा/अधिशेष)। इस मुनाफे का इस्तेमाल वह अन्य देशों के घाटे भरने (बहुपक्षीय बंदोबस्त) और ‘होम चार्जेज’ (Home Charges – अफसरों की पेंशन, बाहरी कर्ज का ब्याज) चुकाने में करता था।
6. महायुद्धों के बीच (1914-1945)
पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध और महामंदी
प्रथम विश्व युद्ध (1914-18)
यह पहला औद्योगिक युद्ध था (मशीनगन, टैंक, रासायनिक हथियार, विमान)। 90 लाख लोग मारे गए, 2 करोड़ घायल।
- कामकाजी पुरुष कम हो गए, आय गिरी।
- औरतें कारखानों में काम करने आईं।
- अमेरिका ब्रिटेन का कर्जदार से कर्जदाता बन गया।
बृहत् उत्पादन (Mass Production)
हेनरी फोर्ड (कार निर्माता) ने शिकागो बूचड़खाने की तर्ज पर ‘असेंबली लाइन’ अपनाई।
- टी-मॉडल कार (हर 3 मिनट में एक)।
- वेतन बढ़ा (5 डॉलर/दिन – जनवरी 1914)।
- हायर-परचेज (Hire-purchase): किश्तों पर फ्रिज, कार, रेडियो खरीदने का चलन बढ़ा।
महामंदी (Great Depression)
1929 से 1930 के मध्य तक।
- कृषि अति-उत्पादन (कीमतें गिरीं)।
- अमेरिका ने विदेशी कर्ज वापस खींचे।
- 4000 बैंक और 1,10,000 कंपनियाँ बंद हो गईं।
- बेरोजगारी और गरीबी।
भारत और महामंदी
किसान (तबाह):
कृषि उत्पादों की कीमतें आधी रह गईं (बंगाल में कच्चा पटसन 60% गिरा), लेकिन सरकार ने लगान कम नहीं किया। किसान कर्ज में डूब गए।
शहरी वर्ग (सुरक्षित):
निश्चित आय वालों (वेतनभोगी/जमींदार) को फायदा हुआ क्योंकि कीमतें गिर गई थीं। राष्ट्रवादी दबाव में उद्योगों को सीमा शुल्क से सुरक्षा मिली।
7. विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण
ब्रेटन वुड्स और वैश्वीकरण की शुरुआत
ब्रेटन वुड्स समझौता (जुलाई 1944)
1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)
इसका गठन सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे (Trade Deficits) से निपटने के लिए किया गया था। यह अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है।
2. विश्व बैंक (IBRD)
अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसका गठन युद्धोत्तर पुनर्निर्माण और विकास के लिए लंबे समय के लिए पैसे का इंतज़ाम करने के लिए किया गया।
स्थिर विनिमय दर (Fixed Exchange Rate) प्रणाली
ब्रेटन वुड्स व्यवस्था निश्चित विनिमय दरों पर आधारित थी। इसमें राष्ट्रीय मुद्राएँ (जैसे भारतीय रुपया) अमेरिकी डॉलर के साथ एक निश्चित दर पर बँधी थीं। डॉलर का मूल्य सोने (Gold) से बँधा था (1 डॉलर = 35 औंस सोना)। यह व्यवस्था सरकारों को स्थिरता प्रदान करती थी।
G-77 और NIEO
1950 और 60 के दशक में पश्चिमी देशों (औद्योगिक राष्ट्रों) ने भारी आर्थिक विकास किया, लेकिन नव-स्वतंत्र राष्ट्रों (Developing Nations) को इसका कोई खास लाभ नहीं मिला। वे गरीबी और संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे।
NIEO की मुख्य मांगें
- संसाधनों पर नियंत्रण: अपने प्राकृतिक संसाधनों (खनिज, तेल आदि) पर उनका पूरा और वास्तविक नियंत्रण हो, जिसका दोहन विदेशी कंपनियाँ कर रही थीं।
- कच्चे माल के दाम: उन्हें अपने कच्चे माल का सही और लाभकारी दाम मिले।
- बाजार तक पहुँच: उनके तैयार मालों (Manufactured Goods) को विकसित देशों के बाजारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच और निष्पक्ष अवसर मिले।
- तकनीक और सहायता: विकास के लिए बेहतर वित्तीय सहायता और कम लागत पर तकनीक उपलब्ध हो।
वैश्वीकरण की शुरुआत (1970s के बाद)
📅 महत्वपूर्ण तिथियाँ (Timeline)
सिंधु घाटी सभ्यता का पश्चिमी एशिया से जुड़ाव।
बर्लिन सम्मेलन (यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका का बंटवारा)।
अफ्रीका में रिंडरपेस्ट बीमारी का फैलना।
प्रथम विश्व युद्ध।
गिरमिटिया श्रम प्रथा का उन्मूलन।
महामंदी की शुरुआत।
ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (IMF और विश्व बैंक का गठन)।
परीक्षा विशेष (Exam Notes)
महत्वपूर्ण शब्दावली
संभावित प्रश्न (Q&A)
Q. कॉर्न लॉ (Corn Law) को समाप्त करने के क्या प्रभाव हुए?
भोजन की कीमतें गिरीं, लेकिन ब्रिटिश किसान सस्ते आयातित माल का मुकाबला नहीं कर पाए। खेती बंद हुई और हजारों लोग बेरोजगार होकर शहरों या विदेश (अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया) पलायन कर गए।
Q. रिंडरपेस्ट ने अफ्रीका को कैसे प्रभावित किया?
इस बीमारी ने 90% मवेशियों को मार डाला। इससे अफ्रीकियों की आजीविका और स्वतंत्रता खत्म हो गई, जिससे वे श्रम बाजार में धकेले गए और यूरोपीय उपनिवेशीकरण आसान हो गया।
Q. ब्रिटेन ‘व्यापार अधिशेष’ का उपयोग कैसे करता था?
ब्रिटेन भारत के साथ व्यापार अधिशेष का उपयोग अन्य देशों के साथ अपने व्यापार घाटे को भरने और ‘होम चार्जेज’ (पेंशन, ब्याज आदि) चुकाने में करता था। इसे बहुपक्षीय बंदोबस्त कहते हैं।
Q. महामंदी का भारतीय किसानों पर क्या प्रभाव पड़ा?
कीमतें 50% गिर गईं, लेकिन सरकार ने लगान कम नहीं किया। बंगाल के पटसन उत्पादक और गेहूं किसान कर्ज में डूब गए। उन्हें अपनी सोने-चाँदी की संपत्ति बेचनी पड़ी।