भूमंडलीकृत विश्व का बनना – सम्पूर्ण अध्ययन मॉड्यूल
कक्षा 10 – इतिहास (खण्ड II)

भूमंडलीकृत विश्व का बनना The Making of a Global World

वैश्वीकरण का इतिहास केवल 50 साल पुराना नहीं है। प्राचीन काल से यात्री, व्यापारी और पुजारी अपने साथ सामान, पैसा, विचार, हुनर और यहाँ तक कि कीटाणु भी ले जाते थे।
क्या आप जानते हैं? मालदीव की कौड़ियाँ (Cowries), जिन्हें पैसे या मुद्रा के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, हजारों साल पहले चीन और पूर्वी अफ्रीका तक पहुँचती थीं।

1885
बर्लिन सम्मेलन (अफ़्रीका बँटवारा)
1890s
रिंडरपेस्ट का कहर
1929
महामंदी की शुरुआत
1944
ब्रेटन वुड्स समझौता

1. आधुनिक युग से पहले

रेशम मार्ग और भोजन की यात्रा

Map showing the Silk Routes
चित्र: सिल्क रूट का विशाल नेटवर्क जो एशिया को यूरोप और अफ्रीका से जोड़ता था (श्रेय: World History Encyclopedia)

रेशम मार्ग (Silk Route)

यह मार्गों का विशाल नेटवर्क था जो एशिया को यूरोप और उत्तरी अफ्रीका से जोड़ता था। यह 15वीं शताब्दी तक अस्तित्व में था।

  • निर्यात (एशिया से): चीनी रेशम (Silk), चीनी पॉटरी (Pottery), भारत के मसाले और कपड़े।
  • आयात (यूरोप से): सोना और चाँदी जैसी कीमती धातुएँ।
  • धर्म: शुरुआती ईसाई मिशनरी, मुस्लिम धर्मोपदेशक और बौद्ध धर्म (जो पूर्वी भारत से उपजा) इसी मार्ग से दुनिया में फैले।

भोजन की यात्रा

नूडल्स से स्पैघेत्ती

माना जाता है कि नूडल्स चीन से पश्चिम पहुँचे और स्पैघेत्ती बने। पास्ता अरब यात्रियों के साथ 5वीं सदी में सिसिली (इटली) पहुँचा।

अमेरिका की खोज

आलू, सोया, मक्का, टमाटर, मिर्च, शकरकंद आदि कोलंबस की अमेरिका खोज के बाद ही दुनिया को मिले।

केस स्टडी: आयरिश आलू अकाल (1845-1849)

आयरलैंड के गरीब किसान आलू पर इतने निर्भर थे कि 1840 के दशक के मध्य में फसल खराब होने पर 10 लाख (10,00,000) लोग भूख से मर गए।

2. विजय, बीमारी और व्यापार (16वीं सदी)

विश्व का ‘सिकुड़ना’: 16वीं सदी में जब यूरोपीय जहाज़ियों ने एशिया तक का समुद्री रास्ता ढूँढ़ लिया और वे पश्चिमी सागर को पार करते हुए अमेरिका तक जा पहुँचे, तो पूर्व-आधुनिक विश्व बहुत छोटा सा दिखाई देने लगा।

हिंद महासागर का महत्व: इससे पहले कई सदियों से हिंद महासागर के पानी में फलता-फूलता व्यापार, तरह-तरह के सामान, लोग, ज्ञान और परंपराएँ एक जगह से दूसरी जगह आ-जा रही थीं। भारतीय उपमहाद्वीप इन प्रवाहों के रास्ते में एक अहम बिंदु था। यूरोपीयों के दाखिले से यह आवाजाही और बढ़ने लगी और इन प्रवाहों की दिशा यूरोप की तरफ़ भी मुड़ने लगी।

अपनी ‘खोज’ से पहले लाखों साल से अमेरिका का दुनिया से कोई संपर्क नहीं था। लेकिन 16वीं सदी से उसकी विशाल भूमि और बेहिसाब फ़सलें व खनिज पदार्थ हर दिशा में जीवन का रूप-रंग बदलने लगे।

चेचक (Smallpox) – जैविक हथियार

लाखों साल से अलग-थलग रहने के कारण अमेरिकी मूल निवासियों में चेचक से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) नहीं थी। स्पेनिश सैनिकों के साथ पहुँचे कीटाणुओं ने पूरे समुदायों को खत्म कर दिया। बंदूकों को छीना जा सकता था, पर बीमारियों को नहीं।

“छोटी चेचक उपनिवेशकारों के लिए ईश्वर का वरदान है… परमेश्वर ने हमारी मिल्कीयत पर हमें मालिकाना दे दिया।”
जॉन विनथॉर्प (मैसाचुसेट्स के पहले गवर्नर), 1634

धन-संपदा और एल डोराडो (El Dorado)

  • चाँदी का महत्व: आज के पेरू और मैक्सिको में मौजूद खानों से निकलने वाली क़ीमती धातुओं, खासतौर से चाँदी, ने यूरोप की संपदा को बढ़ाया और पश्चिम एशिया के साथ होने वाले उसके व्यापार को गति प्रदान की।
  • सोने का शहर: 17वीं सदी के आते-आते पूरे यूरोप में दक्षिणी अमेरिका की धन-संपदा के बारे में तरह-तरह के क़िस्से बनने लगे थे। इन्हीं किंवदंतियों की बदौलत वहाँ के लोग ‘एल डोराडो’ को सोने का शहर मानने लगे और उसकी खोज में बहुत सारे खोजी अभियान शुरू किए गए।

चीन का अलगाव और केंद्र का बदलाव

अतीत (18वीं सदी तक): चीन और भारत दुनिया के सबसे धनी देशों में गिने जाते थे और एशियाई व्यापार में उनका दबदबा था।
बदलाव (15वीं सदी से): चीन ने विदेश संबंधों को कम करना शुरू कर दिया और दुनिया से अलग-थलग पड़ गया।
परिणाम: चीन की घटती भूमिका और अमेरिका के बढ़ते महत्व के कारण विश्व व्यापार का केंद्र पश्चिम की ओर खिसक गया। अब यूरोप ही विश्व व्यापार का सबसे बड़ा केंद्र बन गया।

यूरोप से पलायन क्यों? (19वीं सदी)

19वीं सदी तक यूरोप में हालात अत्यंत कठिन थे। आर्थिक तंगी और सामाजिक अशांति के कारण लगभग 5 करोड़ लोग यूरोप छोड़कर अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में जा बसे। इसके मुख्य कारण थे:

  • गरीबी और भूख: यूरोप में गरीबी और भूख का साम्राज्य था। अक्सर अकाल पड़ते थे, जिससे आम जीवन दूभर हो गया था।
  • भीड़ और बीमारियाँ: औद्योगिक शहरों में बेहिसाब भीड़ थी और घातक बीमारियाँ (जैसे चेचक, प्लेग) का बोलबाला था, जिससे मृत्यु दर अधिक थी।
  • धार्मिक टकराव: धार्मिक मतभेद आम थे। जो लोग स्थापित धार्मिक विश्वासों और तरीकों को नहीं मानते थे (धार्मिक असंतुष्ट), उन्हें कड़ा दंड दिया जाता था।
परिणाम: इन कष्टों और उत्पीड़न से बचने के लिए हजारों लोग अपना घर-बार छोड़कर अमेरिका भागने लगे, जहाँ वे सुरक्षित भविष्य और अवसरों की तलाश में थे।

3. उन्नीसवीं शताब्दी (1815-1914)

आर्थिक प्रवाह: व्यापार, श्रम और पूंजी

1. व्यापार (Trade)

कम प्रतिबंध

मुख्य रूप से वस्तुओं (जैसे कपड़ा, गेहूँ) का व्यापार।

25-40 गुना वृद्धि

2. श्रम (Labour)

अधिक प्रतिबंध

रोज़गार की तलाश में लोगों का एक जगह से दूसरी जगह पलायन।

5 करोड़ यूरोपीय, 15 करोड़ कुल

3. पूंजी (Capital)

कम प्रतिबंध

निवेश के लिए पैसे का दूर-दराज़ के इलाकों में प्रवाह।

दीर्घकालिक/अल्पकालिक निवेश

कॉर्न लॉ (Corn Laws)

पृष्ठभूमि: 18वीं सदी के अंत में ब्रिटेन की आबादी तेजी से बढ़ी, जिससे भोजन की मांग बढ़ी और कृषि उत्पाद महंगे हो गए।
कानून (The Law): बड़े भूस्वामियों के दबाव में सरकार ने मक्का के आयात पर पाबंदी लगा दी। इसी कानून को ‘कॉर्न लॉ’ कहा जाता था।
कानून का खात्मा (Abolition): खाद्य पदार्थों की ऊँची कीमतों से परेशान उद्योगपतियों और शहरी लोगों ने सरकार को मजबूर कर दिया कि वह कॉर्न लॉ को फौरन समाप्त कर दे।
परिणाम (Impact):
  • खाद्य पदार्थों का आयात बहुत सस्ता हो गया।
  • ब्रिटिश किसान आयातित माल की कीमत का मुकाबला नहीं कर पाए।
  • विशाल भूभागों पर खेती बंद हो गई।
  • हजारों लोग बेरोजगार हो गए और शहरों या दूसरे देशों में पलायन कर गए।

तकनीक की भूमिका (Refrigeration)

[Image of Refrigerated Ship diagram]
1870 से पहले

अमेरिका से यूरोप जिंदा जानवर भेजे जाते थे। वे जगह ज्यादा घेरते थे, मर जाते थे या बीमार पड़ जाते थे। इसलिए मांस बहुत महंगा था और गरीबों की पहुँच से बाहर था।

नयी तकनीक (Solution)

पानी के जहाजों में रेफ्रिजरेशन (शीतलन) की तकनीक स्थापित की गई।

क्रांतिकारी प्रभाव:
  • जानवरों को यात्रा से पहले ही मारा जाने लगा (अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया में)।
  • केवल मांस भेजा जाने लगा जिससे समुद्री यात्रा का खर्चा कम हुआ।
  • यूरोप में मांस के दाम गिर गए
  • गरीबों की खुराक में अब मक्खन और अंडे भी शामिल हो गए।
  • जीवन स्तर सुधरा तो देश में शांति स्थापित हुई।

🇮🇳 भारत में ‘नहर बस्तियाँ’ (Canal Colonies)

ब्रिटिश सरकार ने पंजाब में अर्ध-रेगिस्तानी परती जमीनों को उपजाऊ बनाने के लिए नहरों का जाल बिछाया ताकि निर्यात के लिए गेहूँ और कपास उगाया जा सके। यहाँ दूसरे स्थानों से लोगों को लाकर बसाया गया, जिन्हें ‘केनाल कॉलोनी’ कहा गया।

4. उपनिवेशवाद और उसका प्रभाव

रिंडरपेस्ट और गिरमिटिया मज़दूर

Map of Africa colonized by European powers
चित्र: औपनिवेशिक अफ्रीका (19वीं सदी के अंत में) – (श्रेय: Britannica)
Map showing migration routes of indentured labourers from India
चित्र: भारतीय गिरमिटिया मजदूरों के पलायन मार्ग (श्रेय: Reddit)

अफ़्रीका का बँटवारा (1885)

यूरोपीय ताकतें (ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम) 1885 में बर्लिन में मिलीं और उन्होंने अफ़्रीका को नक्शे पर सीधी लकीरें खींचकर आपस में बाँट लिया।

सर हेनरी मॉर्टन स्टैनली: एक पत्रकार/खोजी जिन्हें लिविंग्स्टन को खोजने भेजा गया था। उन्होंने हथियारों के साथ अफ़्रीका का नक्शा बनाया जिससे जीत आसान हुई।

रिंडरपेस्ट (मवेशी प्लेग) – 1890s

यह बीमारी इतालवी सैनिकों के लिए लाए गए एशियाई जानवरों के जरिए पूर्वी अफ्रीका पहुंची और ‘जंगल की आग’ की तरह फैली। इसने 90% मवेशियों को मार डाला।

प्रभाव: अफ़्रीकियों की आजीविका खत्म हो गई। वे वेतन के लिए काम नहीं करना चाहते थे, लेकिन अब मजबूरी में यूरोपीय बागानों/खानों में श्रम करना पड़ा।

भारत से अनुबंधित श्रमिक (गिरमिटिया)

इसे ‘नई दास प्रथा’ कहा गया। लाखों भारतीयों (यूपी, बिहार, तमिलनाडु) को कैरिबियाई द्वीप (त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम), मॉरीशस और फिजी ले जाया गया।

1 एजेंटों की भूमिका: एजेंट कमीशन के लिए मजदूरों को फुसलाते थे, झूठी जानकारी देते थे और कभी-कभी अपहरण भी करते थे।
2 सांस्कृतिक मिश्रण: त्रिनिदाद में ‘होसे’ (Hoseay) (इमाम हुसैन का जुलूस मेला), ‘चटनी म्यूजिक’ और ‘रास्ताफारियानवाद’ रचनात्मक अभिव्यक्ति बने।
3 वंशज: नोबेल विजेता वी.एस. नायपॉल और क्रिकेटर (शिवनरेन चंद्रपॉल, रामनेरेश सरवन) इन्ही के वंशज हैं। 1921 में यह प्रथा खत्म हुई।

5. भारतीय उद्यमी और व्यापार

वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका

Map showing trade routes linking India to the world in 17th Century
चित्र: भारत को विश्व से जोड़ते व्यापारिक मार्ग (17वीं सदी) – (श्रेय: World History Encyclopedia)

विदेश में भारतीय उद्यमी

शिकारीपुरी श्रॉफ़ और नट्टुकोट्टई चेट्टियार

ये उन बैंकरों और व्यापारियों में से थे जो मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में निर्यातोन्मुखी खेती के लिए कर्ज़ देते थे।

  • वे अपनी जेब से पैसा लगाते थे या यूरोपीय बैंकों से कर्ज़ लेते थे।
  • उनके पास दूर-दूर तक पैसे पहुँचाने की एक व्यवस्थित पद्धति थी।
  • उन्होंने व्यावसायिक संगठनों के देसी स्वरूप भी विकसित कर लिए थे।
हैदराबादी सिंधी व्यापारी

ये व्यापारी तो यूरोपीय उपनिवेशों से भी आगे तक जा निकले। 1860 के दशक से उन्होंने दुनिया भर के बंदरगाहों पर अपने बड़े-बड़े एम्पोरियम (Emporium) खोल दिए।

सफलता का कारण: इन दुकानों में सैलानियों को आकर्षक स्थानीय और विदेशी चीजें मिलती थीं। सुरक्षित और आरामदेह जलपोतों के आ जाने से सैलानियों की संख्या बढ़ने लगी, जिससे इनका कारोबार खूब फला-फूला।

व्यापार और उपनिवेशवाद

कपास का निर्यात: ब्रिटेन में औद्योगीकरण के बाद भारतीय सूती कपड़े का निर्यात गिर गया (1800 में 30% → 1870 में 3%)। इसके बदले कच्चे माल (कपास, नील, अफीम) का निर्यात बढ़ा।

अफीम व्यापार: ब्रिटेन भारत में अफीम उगाकर चीन को बेचता था और उससे मिले पैसे से चीन से चाय खरीदता था।

व्यापार अधिशेष (Trade Surplus) & होम चार्जेज

ब्रिटेन भारत को सामान ज्यादा बेचता था (फायदा/अधिशेष)। इस मुनाफे का इस्तेमाल वह अन्य देशों के घाटे भरने (बहुपक्षीय बंदोबस्त) और ‘होम चार्जेज’ (Home Charges – अफसरों की पेंशन, बाहरी कर्ज का ब्याज) चुकाने में करता था।

6. महायुद्धों के बीच (1914-1945)

पहला आधुनिक औद्योगिक युद्ध और महामंदी

प्रथम विश्व युद्ध (1914-18)

यह पहला औद्योगिक युद्ध था (मशीनगन, टैंक, रासायनिक हथियार, विमान)। 90 लाख लोग मारे गए, 2 करोड़ घायल।

  • कामकाजी पुरुष कम हो गए, आय गिरी।
  • औरतें कारखानों में काम करने आईं।
  • अमेरिका ब्रिटेन का कर्जदार से कर्जदाता बन गया।

बृहत् उत्पादन (Mass Production)

हेनरी फोर्ड (कार निर्माता) ने शिकागो बूचड़खाने की तर्ज पर ‘असेंबली लाइन’ अपनाई।

  • टी-मॉडल कार (हर 3 मिनट में एक)।
  • वेतन बढ़ा (5 डॉलर/दिन – जनवरी 1914)।
  • हायर-परचेज (Hire-purchase): किश्तों पर फ्रिज, कार, रेडियो खरीदने का चलन बढ़ा।

महामंदी (Great Depression)

1929 से 1930 के मध्य तक।

  • कृषि अति-उत्पादन (कीमतें गिरीं)।
  • अमेरिका ने विदेशी कर्ज वापस खींचे।
  • 4000 बैंक और 1,10,000 कंपनियाँ बंद हो गईं।
  • बेरोजगारी और गरीबी।

भारत और महामंदी

किसान (तबाह):

कृषि उत्पादों की कीमतें आधी रह गईं (बंगाल में कच्चा पटसन 60% गिरा), लेकिन सरकार ने लगान कम नहीं किया। किसान कर्ज में डूब गए।

“चलो भाइयों, नकद की उम्मीद में और ज्यादा पटसन तुम उगाओ…” – बंगाल के एक कवि की पंक्तियाँ।

शहरी वर्ग (सुरक्षित):

निश्चित आय वालों (वेतनभोगी/जमींदार) को फायदा हुआ क्योंकि कीमतें गिर गई थीं। राष्ट्रवादी दबाव में उद्योगों को सीमा शुल्क से सुरक्षा मिली।

कीन्स का मत: भारत से सोने के निर्यात (Distress Gold) ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में मदद की (लेकिन भारतीय किसान को फायदा नहीं हुआ)।

7. विश्व अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण

ब्रेटन वुड्स और वैश्वीकरण की शुरुआत

ब्रेटन वुड्स समझौता (जुलाई 1944)

स्थान: अमेरिका स्थित न्यू हैम्पशायर के माउंट वाशिंगटन होटल में।
उद्देश्य: दो महायुद्धों के बाद औद्योगिक विश्व में आर्थिक स्थिरता और पूर्ण रोजगार (Full Employment) बनाए रखना।

1. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)

इसका गठन सदस्य देशों के विदेश व्यापार में लाभ और घाटे (Trade Deficits) से निपटने के लिए किया गया था। यह अल्पकालिक ऋण प्रदान करता है।

2. विश्व बैंक (IBRD)

अंतर्राष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इसका गठन युद्धोत्तर पुनर्निर्माण और विकास के लिए लंबे समय के लिए पैसे का इंतज़ाम करने के लिए किया गया।

स्थिर विनिमय दर (Fixed Exchange Rate) प्रणाली

ब्रेटन वुड्स व्यवस्था निश्चित विनिमय दरों पर आधारित थी। इसमें राष्ट्रीय मुद्राएँ (जैसे भारतीय रुपया) अमेरिकी डॉलर के साथ एक निश्चित दर पर बँधी थीं। डॉलर का मूल्य सोने (Gold) से बँधा था (1 डॉलर = 35 औंस सोना)। यह व्यवस्था सरकारों को स्थिरता प्रदान करती थी।

ब्रेटन वुड्स की जुड़वाँ संतान (The Twins) अमेरिका के पास वीटो (Veto) का अधिकार

G-77 और NIEO

1950 और 60 के दशक में पश्चिमी देशों (औद्योगिक राष्ट्रों) ने भारी आर्थिक विकास किया, लेकिन नव-स्वतंत्र राष्ट्रों (Developing Nations) को इसका कोई खास लाभ नहीं मिला। वे गरीबी और संसाधनों की कमी से जूझ रहे थे।

प्रतिक्रिया: विकासशील देशों ने संगठित होकर समूह-77 (G-77) का गठन किया और नई अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली (NIEO – New International Economic Order) की मांग की।

NIEO की मुख्य मांगें

  • संसाधनों पर नियंत्रण: अपने प्राकृतिक संसाधनों (खनिज, तेल आदि) पर उनका पूरा और वास्तविक नियंत्रण हो, जिसका दोहन विदेशी कंपनियाँ कर रही थीं।
  • कच्चे माल के दाम: उन्हें अपने कच्चे माल का सही और लाभकारी दाम मिले।
  • बाजार तक पहुँच: उनके तैयार मालों (Manufactured Goods) को विकसित देशों के बाजारों में बेचने के लिए बेहतर पहुँच और निष्पक्ष अवसर मिले।
  • तकनीक और सहायता: विकास के लिए बेहतर वित्तीय सहायता और कम लागत पर तकनीक उपलब्ध हो।

वैश्वीकरण की शुरुआत (1970s के बाद)

World Map illustrating post-war divisions
चित्र: युद्धोत्तर विश्व का एक चित्रण (Gomberg Map) – (श्रेय: Wikimedia Commons)
1
विनिमय दर में बदलाव: 60 के दशक में अमेरिकी डॉलर कमजोर हुआ और सोने की तुलना में इसकी कीमत गिरी। स्थिर (Fixed) विनिमय दर व्यवस्था खत्म हुई और अस्थिर (Floating) विनिमय दर शुरू हुई।
2
MNCs का स्थानांतरण: 70 के दशक के आखिरी सालों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने एशिया के उन देशों में उत्पादन केंद्रित किया जहाँ वेतन कम थे (जैसे चीन, भारत, ब्राजील)। इससे विश्व व्यापार का भूगोल बदल गया।
3
चीन का प्रवेश: 1949 की क्रांति के बाद चीन अलग-थलग था। नई आर्थिक नीतियों के बाद वह विश्व अर्थव्यवस्था में लौटा। वहां के कम वेतन के कारण विदेशी कंपनियों ने निवेश किया, जिससे सस्ती इलेक्ट्रॉनिक चीजें और खिलौने बाजार में आए।

📅 महत्वपूर्ण तिथियाँ (Timeline)

3000 ईसा पूर्व

सिंधु घाटी सभ्यता का पश्चिमी एशिया से जुड़ाव।

1885

बर्लिन सम्मेलन (यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीका का बंटवारा)।

1890 का दशक

अफ्रीका में रिंडरपेस्ट बीमारी का फैलना।

1914-1918

प्रथम विश्व युद्ध।

1921

गिरमिटिया श्रम प्रथा का उन्मूलन।

1929

महामंदी की शुरुआत।

1944 (जुलाई)

ब्रेटन वुड्स सम्मेलन (IMF और विश्व बैंक का गठन)।

परीक्षा विशेष (Exam Notes)

महत्वपूर्ण शब्दावली

वीटो (निषेधाधिकार): वह अधिकार जिसके सहारे एक ही सदस्य की असहमति किसी भी प्रस्ताव को खारिज कर सकती है।
विनिमय दर (Exchange Rate): विभिन्न देशों की मुद्राओं को जोड़ने वाली व्यवस्था। स्थिर (सरकार द्वारा नियंत्रित) vs परिवर्तनशील (बाजार द्वारा तय)।
गिरमिटिया (Indentured): अनुबंधित मजदूर जिन्हें एक निश्चित समय के लिए विदेश ले जाया जाता था। इसे ‘नई दास प्रथा’ भी कहा गया।
व्यापार अधिशेष (Trade Surplus): जब निर्यात का मूल्य आयात से अधिक हो (जैसे ब्रिटेन का भारत के साथ था)।

संभावित प्रश्न (Q&A)

Q. कॉर्न लॉ (Corn Law) को समाप्त करने के क्या प्रभाव हुए?

भोजन की कीमतें गिरीं, लेकिन ब्रिटिश किसान सस्ते आयातित माल का मुकाबला नहीं कर पाए। खेती बंद हुई और हजारों लोग बेरोजगार होकर शहरों या विदेश (अमेरिका/ऑस्ट्रेलिया) पलायन कर गए।

Q. रिंडरपेस्ट ने अफ्रीका को कैसे प्रभावित किया?

इस बीमारी ने 90% मवेशियों को मार डाला। इससे अफ्रीकियों की आजीविका और स्वतंत्रता खत्म हो गई, जिससे वे श्रम बाजार में धकेले गए और यूरोपीय उपनिवेशीकरण आसान हो गया।

Q. ब्रिटेन ‘व्यापार अधिशेष’ का उपयोग कैसे करता था?

ब्रिटेन भारत के साथ व्यापार अधिशेष का उपयोग अन्य देशों के साथ अपने व्यापार घाटे को भरने और ‘होम चार्जेज’ (पेंशन, ब्याज आदि) चुकाने में करता था। इसे बहुपक्षीय बंदोबस्त कहते हैं।

Q. महामंदी का भारतीय किसानों पर क्या प्रभाव पड़ा?

कीमतें 50% गिर गईं, लेकिन सरकार ने लगान कम नहीं किया। बंगाल के पटसन उत्पादक और गेहूं किसान कर्ज में डूब गए। उन्हें अपनी सोने-चाँदी की संपत्ति बेचनी पड़ी।

एनसीईआरटी (NCERT) पाठ्यक्रम पर आधारित अध्ययन सामग्री

© परीक्षा तैयारी मॉड्यूल | इतिहास कक्षा 10

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