मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया – विस्तृत अध्ययन मॉड्यूल | Class 10 History
कक्षा 10 – इतिहास (NCERT)

मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया Print Culture and the Modern World

पूर्वी एशिया में हस्तलिखित छपाई से लेकर यूरोप में यांत्रिक प्रेस और भारत में राष्ट्रवाद के उदय तक की यात्रा। इस मॉड्यूल में एनसीईआरटी के सभी महत्वपूर्ण तथ्य, तिथियाँ और नाम शामिल हैं।

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शुरुआती मुद्रित पुस्तकें

China, Japan & Korea
Woodblock Illustration

जापानी वुडब्लॉक प्रिंट का उदाहरण

तकनीक: वुडब्लॉक (Woodblock)

मुद्रण की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई। स्याही लगी काठ की तख्ती (block) पर कागज को रगड़कर छपाई की जाती थी।

समस्या: कागज पतला और झरझरा था, इसलिए दोनों तरफ छपाई संभव नहीं थी।
समाधान: ‘अकॉर्डियन शैली’ (Accordion Book) – किनारों को मोड़ने के बाद सिल कर किताब बनाई जाती थी।

खुशनवीसी (Calligraphy): हाथ से बड़े सुंदर-सुडौल अक्षरों में लिखने की कला, जिसे ‘दक्ष सुलेखक’ (Scribes) करते थे।

चीन (China)

AD 594
  • शाही राजतंत्र (Imperial State): लंबे समय तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक। सिविल सेवा परीक्षा (Civil Service Exams) के लिए भारी मात्रा में किताबें छपती थीं।
  • 16वीं सदी बदलाव: परीक्षा देने वालों की तादाद बढ़ी → किताबों की छपाई भी बढ़ी।
  • 17वीं सदी (शहरी संस्कृति): व्यापारी हिसाब-किताब के लिए प्रिंट का उपयोग करने लगे। पढ़ना एक ‘शगल’ (Fashion) बन गया। अमीर महिलाओं, पत्नियों और नर्तकियों ने आत्मकथाएं और कविताएं लिखीं।
  • शंघाई (19वीं सदी): पश्चिमी तकनीक आने पर ‘नई मुद्रण संस्कृति’ का केंद्र बना। हाथ की छपाई की जगह मशीनी छपाई ने ली।

जापान (Japan)

AD 768-770
  • बौद्ध प्रचारक: चीन से छपाई तकनीक लाए।
  • डायमंड सूत्र (AD 868): जापान की सबसे पुरानी छपी पुस्तक। इसमें पाठ के साथ काठ पर खुदे चित्र थे।
  • मध्यकालीन जापान: कपड़े, ताश के पत्ते और कागजी नोटों पर तस्वीरें छपती थीं।
  • एदो (Edo – आधुनिक टोक्यो): ‘उकियो’ (Ukiyo – तैरती दुनिया के चित्र) शैली। कितागावा उतामारो जैसे कलाकारों ने आम शहरी जीवन चित्रित किया। पुस्तकालयों में खाना पकाने, शिष्टाचार, और वाद्ययंत्रों की किताबें भरी थीं।

कोरिया (Korea)

13th C.
UNESCO
Tripitaka Koreana

लकड़ी के 80,000 ब्लॉक पर उकेरा गया बौद्ध धर्मग्रंथों का विशाल संग्रह।

Jikji (जिकजी)

1377: यह दुनिया की सबसे पुरानी मौजूद किताब है जो मूवेबल मेटल टाइप (चल धातु प्रकार) से छपी थी। इसमें ज़ेन बौद्ध धर्म की विशेषताएं हैं।

2

यूरोप में मुद्रण का आगमन

हस्तलिखित पांडुलिपियों से गुटेनबर्ग की क्रांति तक का सफर

पृष्ठभूमि: कागज और काठ की तख्ती

11वीं सदी: कागज का आगमन

Silk Route

कागज चीन से रेशम मार्ग (Silk Route) के जरिए यूरोप पहुंचा। इसने चर्मपत्र (Vellum) की जगह लेना शुरू किया और पांडुलिपियों (Manuscripts) का उत्पादन आसान बनाया।

1295 ई.: मार्को पोलो की वापसी

Italy

महान खोजी यात्री मार्को पोलो चीन से इटली लौटे और अपने साथ वुडब्लॉक प्रिंटिंग (तख्ती की छपाई) का ज्ञान लाए। इटली से यह तकनीक बाकी यूरोप में फैल गई।

उपयोग: किताबें, कपड़े (Textiles), ताश के पत्ते और धार्मिक चित्र छापने के लिए।

हस्तलिखित किताबों का संकट

जैसे-जैसे साक्षरता बढ़ी, मांग पूरी करना असंभव हो गया। अमीर लोग 50-50 सुलेखक (Scribes) रखते थे, फिर भी नकल उतारना महंगा, श्रमसाध्य और समय लेने वाला था।

कुलीन वर्ग (Elites)

सस्ती मुद्रित किताबों को ‘अश्लील’ मानते थे। केवल वेलम (Vellum – जानवरों की खाल) पर लिखी किताबें पसंद करते थे।

आम पाठक

कागज पर छपी सस्ती प्रतियां खरीदते थे।

योहान गुटेनबर्ग (Johann Gutenberg)

स्ट्रैसबर्ग, जर्मनी (1430s – 1448)

Gutenberg Printing Press
गुटेनबर्ग का प्रिंटिंग प्रेस

आविष्कार के आधार स्तंभ

  • जैतून/शराब प्रेस (Olive Press) प्रिंटिंग प्रेस का आदर्श मॉडल बना।
  • सीसे के सांचे (Lead Moulds) अक्षर गढ़ने के लिए (Movable Type)।
  • सुनार कला (Goldsmith) पत्थरों को चमकाने और धातुओं को गढ़ने में महारत।

पहली किताब: बाइबिल

उत्पादन: 180 प्रतियां समय: 3 साल

विशेषता: यह हस्तलिखित पांडुलिपि जैसी दिखती थी। धातु के अक्षरों ने हाथ की लिखावट की नकल की। हाशिये (Borders) पर कलाकारों ने हाथ से फूल-पत्तियां बनाईं। हर किताब अनोखी थी।

मुद्रण क्रांति (Print Revolution)

हाथ की छपाई से मशीनी छपाई (Mechanical Printing) का सफर

2 करोड़
1450-1500
20 करोड़
1500-1550

4. पढ़ने का जुनून और फ्रांसीसी क्रांति

लोकप्रिय साहित्य (17वीं-18वीं सदी)

किताबें बेचने वाले फेरीवाले (Chapmen) गाँव-गाँव जाने लगे।

  • चैपबुक्स (Chapbooks): इंग्लैंड में। पॉकेट आकार की सस्ती किताबें (एक पेनी कीमत)।
  • बिब्लियोथीक ब्ल्यू (Bibliotheque Bleue): फ्रांस में। सस्ते कागज पर छपी और नीली जिल्द वाली किताबें।
  • अन्य: पंचांग (Almanac), लोककथाएं, और अखबार (युद्ध और व्यापार की खबरें)।

ज्ञानोदय (Enlightenment)

न्यूटन और टॉमस पेन जैसे वैज्ञानिकों और वोल्तेयर व रूसो जैसे दार्शनिकों की किताबें भारी मात्रा में छपीं और पढ़ी गईं। विज्ञान, तर्क और विवेकवाद लोकप्रिय हुए।

“हे निरंकुशवादी शासकों, अब तुम्हारे काँपने का वक्त आ गया है! आभासी लेखक की क़लम के ज़ोर के आगे तुम हिल उठोगे!”
– लुई-सेबेस्टियन मर्सिए (Mercier)

क्या मुद्रण ने फ्रांसीसी क्रांति (1789) की जमीन तैयार की? (3 तर्क)

1. ज्ञानोदय के विचारकों का प्रसार:

वोल्टेयर और रूसो ने चर्च और राजा की निरंकुश सत्ता की आलोचना की। उन्होंने मांग की कि हर चीज को ‘तर्क’ (Reason) और ‘विवेक’ की कसौटी पर कसा जाए।

2. वाद-विवाद की संस्कृति (Dialogue & Debate):

पुराने मूल्यों, संस्थाओं और शाही कायदों पर सार्वजनिक बहस शुरू हुई। लोग सवाल पूछने लगे, जिससे ‘सामाजिक क्रांति’ के विचार जन्मे।

3. राजशाही का मजाक (Literature Mocking Royalty):

कार्टूनों और व्यंग्य चित्रों (Caricatures) में दिखाया गया कि राजा भोग-विलास में डूबे हैं जबकि जनता भूखी मर रही है। इसने लोगों को राजतंत्र के खिलाफ भड़काया।

5. उन्नीसवीं सदी: बच्चे, महिलाएं और मजदूर

बच्चे (Children)

प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य होने से बच्चे अहम पाठक बन गए।

  • 1857: फ्रांस में केवल बच्चों के लिए प्रेस स्थापित की गई।
  • ग्रिम बंधु (Grimm Brothers, Germany): बरसों लगाकर किसानों से लोककथाएं जमा कीं और उन्हें संपादित (अश्लील अंश हटाकर) कर 1812 में छापा।

महिलाएं (Women)

महिलाएं अहम पाठक और लेखिका बनीं। पेनी मैगजीन (Penny Magazines) और गृहस्थी सिखाने वाली किताबें लोकप्रिय हुईं।

उपन्यासकार: जेन ऑस्टेन, ब्रोंटे बहनें, जॉर्ज एलियट। इन्होंने ‘नयी नारी’ को परिभाषित किया: दृढ़ इच्छाशक्ति और सूझ-बूझ वाली।

मजदूर (Workers)

17वीं सदी से ही किराये के पुस्तकालय (Lending Libraries) मौजूद थे। 19वीं सदी में मजदूरों ने आत्म-सुधार के लिए इनका इस्तेमाल किया।

काम के घंटे कम होने पर उन्होंने राजनीतिक पर्चे और आत्मकथाएं लिखीं। (उदा: थॉमस वुड, मैक्सिम गोर्की)।

तकनीकी नवाचार (Innovations)

  • रिचर्ड एम. हो (New York): शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस (Cylindrical Press)। प्रति घंटे 8,000 शीट छपाई।
  • ऑफसेट प्रेस (Offset Press): 19वीं सदी के अंत में। एक साथ 6 रंग की छपाई मुमकिन।
  • बिजली से चलने वाले प्रेस: 20वीं सदी की शुरुआत में तेजी आई।
  • शिलिंग सीरीज (Shilling Series): 1920 के दशक में इंग्लैंड में लोकप्रिय सस्ती किताबें।
  • डस्ट कवर (Dust Cover): 20वीं सदी का नवाचार।
  • पेपरबैक (Paperback): 1930 की महामंदी (Great Depression) के दौरान बिक्री बनाए रखने के लिए सस्ते संस्करण।

6. भारत और मुद्रण की दुनिया

पांडुलिपियों की समृद्ध परंपरा से लेकर छापेखाने के आगमन तक का सफर।

भाग 1 मुद्रण से पहले: पांडुलिपियों की दुनिया

निर्माण और परंपरा

  • भाषाएँ: संस्कृत, अरबी, फारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाएँ।
  • सामग्री: ताड़ के पत्ते (Palm Leaves) या हाथ से बने कागज।
  • सजावट: पन्नों पर बेहतरीन तस्वीरें बनाई जाती थीं।
  • संरक्षण: तख्तियों की जिल्द में या सिलकर बांधा जाता था।

पांडुलिपियों की सीमाएँ

काफी महंगी और तैयार करने में समयसाध्य।
बहुत नाजुक, संभालना मुश्किल।
लिपियों की विविधता के कारण पढ़ना कठिन।
💡 बंगाल की अनोखी स्थिति: पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल में ग्रामीण पाठशालाओं का जाल था, लेकिन छात्र किताबें नहीं पढ़ते थे। गुरु याददाश्त से सुनाते थे और छात्र लिख लेते थे। इस तरह लोग ‘बिना किताब पढ़े साक्षर’ बन जाते थे।

भाग 2 छपाई का आगमन (1550 – 1800)

16वीं सदी (मध्य) – गोवा

पुर्तगाली मिशनरी (Portuguese Missionaries)

प्रिंटिंग प्रेस पहली बार गोवा आया।
जेसुइट पुजारी: कोंकणी सीखी और पुस्तिकाएं छापीं।
1674 तक: कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं।

1579 & 1713 – दक्षिण भारत

कैथोलिक और डच योगदान

  • 1579 (कोचीन): पहली तमिल किताब (कैथोलिक पुजारियों द्वारा)।
  • 1713: पहली मलयालम किताब (कैथोलिक पुजारियों द्वारा)।
  • डच प्रोटेस्टेंट: 32 तमिल किताबें छापीं (पुरानी किताबों का अनुवाद)।
1780 – अंग्रेजी प्रेस

जेम्स ऑगस्टस हिक्की (Bengal Gazette)

“हर किसी के लिए खुली एक व्यावसायिक पत्रिका, जो किसी के प्रभाव में नहीं है।”

• यह एक निजी अंग्रेजी उद्यम था, औपनिवेशिक शासन से आजाद।

सामग्री: विज्ञापन (दासों की बिक्री सहित) और कंपनी के वरिष्ठ अधिकारियों की गपबाजी।

विवाद: गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने नाराज होकर हिक्की पर मुकदमा चलाया और सरकारी अखबारों को बढ़ावा दिया।

18वीं सदी का अंत

भारतीयों की शुरुआत

भारतीयों ने भी अखबार छापने शुरू किए। पहला साप्ताहिक ‘बंगाल गजट’ गंगाधर भट्टाचार्य द्वारा लाया गया (जो राजा राममोहन राय के करीब थे)।

7. धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें

19वीं सदी की शुरुआत में धार्मिक मसलों पर बहसें तेज हो गईं। समाज सुधारक और रूढ़िवादी समूह अपने विचारों को फैलाने के लिए प्रिंट का सहारा ले रहे थे। ये बहसें अब केवल विद्वानों तक सीमित नहीं थीं, बल्कि आम जनता भी इनमें हिस्सा ले सकती थी।

हिंदू सुधार और विवाद

वैचारिक युद्ध (1821)

राजा राममोहन राय: ‘संवाद कौमुदी’ प्रकाशित किया (सती प्रथा, मूर्तिपूजा और ब्राह्मणवादी कर्मकांडों का विरोध)।
रूढ़िवादी हिंदू: जवाब में ‘समाचार चंद्रिका’ का प्रकाशन किया।

धार्मिक ग्रंथों का प्रसार
  • रामचरितमानस: तुलसीदास की किताब का पहला मुद्रित संस्करण (कलकत्ता, 1810)।
  • 19वीं सदी के मध्य तक सस्ते लिथोग्राफिक (Lithographic) संस्करणों से बाजार पट गया।
प्रमुख प्रकाशक:

नवल किशोर प्रेस (लखनऊ) और श्री वेंकटेश्वर प्रेस (बंबई)। इन्होंने स्थानीय भाषाओं में अनगिनत धार्मिक ग्रंथ छापे, जिन्हें अनपढ़ लोगों के बीच भी बोलकर पढ़ा जा सकता था।

मुस्लिम चिंताएं और देवबंद

डर का माहौल

मुस्लिम राजवंशों के पतन के बाद उलेमाओं (Ulama) को डर था कि औपनिवेशिक शासक कहीं धर्मांतरण को बढ़ावा न दें या मुस्लिम कानूनों (Sharia) को न बदल दें।

देवबंद मदरसा (स्थापना 1867)

इन्होंने हजारों ‘फतवे’ (Fatwas) जारी किए।
उद्देश्य: मुसलमानों को रोजमर्रा की जिंदगी जीने का सलीका और इस्लामी सिद्धांतों के मायने समझाना।

उर्दू प्रिंट संस्कृति:

सस्ते लिथोग्राफिक प्रेस का इस्तेमाल करके फारसी और उर्दू में धार्मिक अनुवाद, अखबार और गुटके छापे गए। (उदा. ‘जाम-ए-जहाँ नामा’ और ‘शम्सुल अखबार’ – 1822)।

अखिल भारतीय जुड़ाव: प्रिंट ने न केवल समुदायों के बीच मतभेद पैदा किए, बल्कि इसने पूरे भारत में लोगों को एक-दूसरे से जोड़ा। अखबार एक जगह की खबरें दूसरी जगह पहुँचाते थे, जिससे अखिल भारतीय पहचान (Pan-Indian Identity) का निर्माण हुआ।

8. प्रकाशन के नए रूप और महिलाएं

उपन्यास, दृश्य संस्कृति और महिलाओं की मुखर होती आवाजें।

दृश्य संस्कृति (Visual Culture)

  • राजा रवि वर्मा (Raja Ravi Varma)

    इन्होंने आम खपत के लिए बेहतरीन तेलचित्र (Oil Paintings) और तस्वीरें बनाईं।

  • कैलेंडर और गरीब

    सस्ते कैलेंडर बाजार में उपलब्ध हुए। गरीब लोग भी अपने घरों को देवी-देवताओं की तस्वीरों से सजाने लगे।

  • व्यंग्य और कार्टून (Caricatures)

    1870 तक पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर कार्टून छपने लगे।
    उदा: ‘इंडियन शारिवारी’ (Indian Charivari) ने पश्चिमी पोशाक पहनने वाले भारतीयों का मजाक उड़ाया।

साहित्य के नए रूप

छापेखाने ने उपन्यास, गीत, लघु कथाएँ और निबंध जैसी नई साहित्यिक विधाओं को जन्म दिया।

“उपन्यासों में लोगों ने अपनी जिंदगी, अपने तजुर्बे, अपने भोगे हुए रिश्तों को देखना शुरू किया।”

नारी शक्ति महिलाएं और मुद्रण (Women & Print)

राससुंदरी देवी (Rashsundari Debi)

पूर्वी बंगाल की एक रूढ़िवादी महिला। उन्होंने रसोई में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा।

कृति: ‘आमार जीबन’ (1876) – बंगाली भाषा की पहली संपूर्ण आत्मकथा।
1860s
कैलाशबाशिनी देवी (बंगाल)

महिलाओं को घरों में कैद करने और उनसे अनपढ़ दासी की तरह काम कराने के खिलाफ लिखा।

1880s
ताराबाई शिंदे & पंडिता रमाबाई (महाराष्ट्र)

उच्च जाति की विधवाओं की दयनीय स्थिति पर रोष व्यक्त किया और स्त्री-पुरुष असमानता पर लिखा।

1926
बेगम रुकैया सखावत हुसैन

“नारी-शिक्षा के विरोधी कहते हैं कि इससे महिलाएँ उदंड हो जाएँगी… अगर पुरुष पढ़-लिखकर नहीं भटकते, तो महिलाएँ क्यों बिगड़ जाएँगी?” (बंगाल महिला शिक्षा सम्मेलन)

पंजाब (रुढ़िवादी प्रयास)

राम चड्ढा: ‘इस्त्री धर्म विचार’ छापा – ताकि औरतों को आज्ञाकारी पत्नी बनाया जा सके।

खालसा ट्रैक्ट सोसायटी: सस्ती पुस्तिकाएं छापीं जो एक अच्छी औरत बनने का संदेश देती थीं।

बंगाल (बटटाला – Battala)

लोकप्रिय साहित्य केंद्र: यह सस्ती किताबों का गढ़ था। यहाँ धार्मिक ग्रंथों के साथ-साथ ‘स्कैंडल’ (अश्लील) साहित्य भी छपता था।

फेरीवाले (Peddlers): ये किताबें लेकर घर-घर जाते थे, जिससे महिलाओं को घर बैठे पढ़ने की सहूलियत मिली।

10. मुद्रण और प्रतिबंध (Censorship)

प्रेस की आजादी और औपनिवेशिक दमन के बीच संघर्ष का इतिहास।

1798 से पहले: शुरुआती डर

शुरुआत में ईस्ट इंडिया कंपनी को भारतीय प्रेस से ज्यादा चिंता उन अंग्रेजों से थी जो कंपनी के कुप्रशासन की आलोचना करते थे। कंपनी को डर था कि ये आलोचनाएं इंग्लैंड में उनके व्यापारिक एकाधिकार (Trade Monopoly) को खतरे में डाल सकती हैं।

1835: आजादी की बहाली

संपादकों की अर्जी के बाद, गवर्नर जनरल बेंटिक ने प्रेस कानूनों की समीक्षा की।

टॉमस मैकाले (Thomas Macaulay) ने उदारवादी कानून बनाए जिन्होंने प्रेस की पुरानी आजादियों को बहाल कर दिया।

सुधार काल

1857 के बाद: दमन की नीति

1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों का रवैया बदल गया। ‘देसी’ (Vernacular) प्रेस को दबाने की मांग उठी ताकि राष्ट्रवादी भावनाओं को कुचला जा सके।

1878 – वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट

  • मॉडल: यह आयरिश प्रेस कानून (Irish Press Laws) पर आधारित था।
  • प्रावधान: सरकार को देसी भाषाई अखबारों में छपी रपट और संपादकीय को सेंसर करने का व्यापक अधिकार मिला।
  • सजा: अगर कोई रपट ‘राजद्रोही’ छपती थी, तो पहले चेतावनी दी जाती थी। अगर अनसुनी हुई, तो प्रेस और मशीनें जब्त कर ली जाती थीं।

राष्ट्रवादी प्रतिरोध

बाल गंगाधर तिलक & ‘केसरी’

दमन के बावजूद राष्ट्रवादी अखबार बढ़ते गए।
1907: जब पंजाब के क्रांतिकारियों को कालापानी भेजा गया, तो तिलक ने अपने अखबार ‘केसरी’ में उनके प्रति गहरी हमदर्दी जताई।
परिणाम: उन्हें 1908 में कैद कर लिया गया, जिसके विरोध में पूरे भारत में व्यापक प्रदर्शन हुए।

“वाणी की स्वतंत्रता … प्रेस की स्वतंत्रता … और सामूहिकता की स्वतंत्रता। भारत सरकार जनमत को व्यक्त करने वाले इन तीन शक्तिशाली वाहनों को कुचलने की कोशिश कर रही है। स्वराज की लड़ाई सबसे पहले इन संकटग्रस्त आजादियों की लड़ाई है।”

महात्मा गांधी

1922 (असहयोग आंदोलन के दौरान)

एनसीईआरटी (NCERT) पाठ्यक्रम पर आधारित विस्तृत अध्ययन सामग्री

© परीक्षा तैयारी मॉड्यूल | इतिहास कक्षा 10

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