रावल रतनसिंह – चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.)

रावल रतनसिंह

चित्तौड़ के अंतिम रावल शाखा शासक
शासनकाल: 1302-1303 ई.
👑 शासक परिचय (Profile)
राजवंश
रावल शाखा (गुहिल वंश) के अंतिम शासक
पिता
रावल समरसिंह
राजधानी
चित्तौड़गढ़
पत्नी
रानी पद्मिनी (पद्मावती)
प्रमुख सेनापति
गोरा (रानी पद्मिनी के चाचा), बादल (रानी पद्मिनी के भाई)
मृत्यु
26 अगस्त, 1303 ई. (सोमवार) – चित्तौड़ युद्ध में वीरगति
प्रमुख घटना
अलाउद्दीन खिलजी का चित्तौड़ आक्रमण एवं चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.)

📜 ऐतिहासिक संदर्भ

रावल समरसिंह की मृत्यु के बाद उनका पुत्र रतनसिंह 1302 ई. के लगभग चित्तौड़ की गद्दी पर बैठा। रावल रतनसिंह रावल शाखा के अंतिम राजा थे। उनके शासनकाल की सबसे महत्वपूर्ण और त्रासद घटना दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी का मेवाड़ आक्रमण एवं चित्तौड़ की विजय है।

🎯 रावल रतनसिंह का महत्व

  • रावल शाखा के अंतिम शासक: रतनसिंह के बाद मेवाड़ में राणा शाखा की शुरुआत हुई
  • प्रथम साका का नायक: चित्तौड़ के इतिहास में पहली बार केसरिया और जौहर की परंपरा स्थापित हुई
  • राजपूत गौरव का प्रतीक: अलाउद्दीन जैसे शक्तिशाली सुल्तान के सामने भी समर्पण नहीं किया
  • पद्मिनी की कथा: रानी पद्मिनी के साथ उनकी कहानी राजस्थानी लोक संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बन गई

👑 गुहिल वंश और रावल शाखा

मेवाड़ पर शासन करने वाला गुहिल वंश राजस्थान के सबसे प्राचीन और गौरवशाली राजवंशों में से एक है। इस वंश की दो प्रमुख शाखाएं थीं:

1️⃣ रावल शाखा

स्थापना: 8वीं शताब्दी
प्रमुख शासक: बप्पा रावल, कालभोज, अल्लट, जैत्रसिंह, तेजसिंह, समरसिंह
अंतिम शासक: रावल रतनसिंह (1302-1303)
उपाधि: “रावल”

2️⃣ राणा शाखा

स्थापना: 1326 ई. (हम्मीर देव द्वारा)
प्रमुख शासक: राणा हम्मीर, राणा कुम्भा, राणा सांगा, राणा प्रताप
विशेषता: चित्तौड़ की पुनर्विजय के बाद
उपाधि: “राणा”

🔄 रावल से राणा में परिवर्तन

रावल रतनसिंह की मृत्यु के बाद मेवाड़ पर लगभग 23 वर्षों तक मुस्लिम शासन रहा। 1326 ई. में राणा हम्मीर देव चौहान (सिसोदिया) ने चित्तौड़ को पुनः जीता और राणा शाखा की स्थापना की। इसके बाद मेवाड़ के शासक “रावल” की जगह “राणा” उपाधि धारण करने लगे।

🗺️ अलाउद्दीन खिलजी का विस्तारवादी साम्राज्य

अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.) दिल्ली सल्तनत का सबसे शक्तिशाली और महत्वाकांक्षी सुल्तान था। उसने न केवल उत्तर भारत बल्कि दक्षिण भारत तक अपना साम्राज्य विस्तार किया।

⚔️ अलाउद्दीन की प्रमुख विजयें (1296-1316)

1296 ई.
दिल्ली सल्तनत पर अधिकार
अपने चाचा और ससुर जलालुद्दीन खिलजी की हत्या कर सुल्तान बना
1297 ई.
गुजरात विजय
उलुग खां और नुसरत खां के नेतृत्व में, अपार धन-संपत्ति की प्राप्ति
1299 ई.
रणथम्भौर का प्रथम आक्रमण
हम्मीर देव चौहान ने पराजित किया (असफल)
1301 ई.
रणथम्भौर की विजय
हम्मीर देव चौहान की वीरगति, किले पर अधिकार
1303 ई.
चित्तौड़ विजय
रावल रतनसिंह की वीरगति, प्रथम साका
1305 ई.
मालवा विजय
ऐनुल मुल्क मुल्तानी के नेतृत्व में
1308 ई.
देवगिरि (दौलताबाद) विजय
मलिक काफूर के नेतृत्व में दक्षिण अभियान
1310 ई.
वारंगल विजय
काकतीय वंश की राजधानी, प्रताप रुद्र देव पराजित

🎯 चित्तौड़ विजय का सामरिक महत्व

1️⃣ भौगोलिक स्थिति

चित्तौड़ उत्तर भारत और दक्षिण भारत को जोड़ने वाला प्रमुख केंद्र था। गुजरात और मालवा से दक्षिण जाने वाले सभी मार्ग यहां से होकर गुजरते थे।

2️⃣ आर्थिक महत्व

व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण से अलाउद्दीन को अपार कर राजस्व मिलता। चित्तौड़ खनिज संपदा और कृषि उत्पादन में भी समृद्ध था।

3️⃣ सैन्य महत्व

चित्तौड़ दुर्ग अजेय माना जाता था। इसकी विजय से राजपूत राज्यों में भय का संचार हुआ और अलाउद्दीन की सैन्य शक्ति की धाक जम गई।

4️⃣ राजनीतिक संदेश

रणथम्भौर के बाद चित्तौड़ विजय ने यह संदेश दिया कि कोई भी राजपूत दुर्ग अब सुरक्षित नहीं है। यह अलाउद्दीन की दक्षिण विजय का पूर्व-पीठिका बना।

📊 अलाउद्दीन की सैन्य शक्ति (1303 के समय)

  • स्थायी सेना: लगभग 4,75,000 घुड़सवार (जियाउद्दीन बरनी के अनुसार)
  • युद्ध हाथी: हजारों युद्ध-प्रशिक्षित हाथी
  • घेराबंदी के यंत्र: मंजनीक (पत्थर फेंकने वाले यंत्र), अरादा (तीर चलाने वाले विशाल धनुष)
  • नियमित वेतन: सैनिकों को नकद वेतन देने वाला पहला सुल्तान
  • दाग और चेहरा प्रथा: घोड़ों पर दाग लगाना और सैनिकों का विवरण रखना

⚔️ चित्तौड़ का युद्ध (1303 ई.)

चित्तौड़ का युद्ध मेवाड़ के शासक रावल रतनसिंह (1302-03 ई.) एवं दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316 ई.) के मध्य 1303 ई. में हुआ था। यह युद्ध भारतीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।

🏰 चित्तौड़ दुर्ग का सामरिक महत्व

चित्तौड़ दुर्ग का सामरिक, व्यापारिक एवं भौगोलिक महत्त्व अत्यधिक था। मालवा, गुजरात तथा दक्षिण भारत जाने वाले मुख्य मार्ग चित्तौड़ से होकर गुजरते थे। अतः गुजरात और दक्षिण भारत पर प्रभुत्व स्थापित करने तथा यहाँ के व्यापार पर अधिकार करने के लिए चित्तौड़ विजय अलाउद्दीन के लिए जरूरी थी।

📅 युद्ध की समयरेखा (Timeline)

28 जनवरी, 1303 ई.

अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली से चित्तौड़ आक्रमण के लिए रवाना हुआ। विशाल सेना के साथ उसने मेवाड़ की ओर कूच किया।

फरवरी, 1303 ई.

घेराबंदी की शुरुआत: अलाउद्दीन ने अपनी सेना का शाही शिविर गंभीरी और बेड़च नदियों के मध्य लगाया। स्वयं सुल्तान ने अपना शिविर चितौड़ी नामक पहाड़ी पर लगाया, जहाँ से वह रोज किले की घेराबंदी के निर्देश देता था।

फरवरी – अगस्त, 1303 ई.

8 माह की लंबी घेराबंदी: चित्तौड़ के राजपूत वीरों ने 8 महीने तक डटकर मुकाबला किया। धीरे-धीरे रसद सामग्री की कमी होने लगी और परिस्थिति गंभीर हो गई।

25 अगस्त, 1303 ई. (रविवार)

केसरिया और जौहर का निर्णय: जब हार निश्चित हो गई, तो रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 1600 स्त्रियों ने जौहर किया। यह चित्तौड़ का प्रथम साका था। गोरा और बादल के नेतृत्व में राजपूत सैनिकों ने केसरिया वस्त्र धारण कर अंतिम युद्ध की तैयारी की।

26 अगस्त, 1303 ई. (सोमवार)

अंतिम युद्ध और वीरगति: 6 महीने व 7 दिन की लड़ाई के बाद रावल रतनसिंह वीरगति को प्राप्त हुए। राजपूत योद्धाओं ने किले के द्वार खोलकर शत्रु पर टूट पड़े और लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ दुर्ग फतह कर कत्लेआम का हुक्म दिया।

सितम्बर, 1303 ई.

चित्तौड़ पर मुस्लिम शासन: अलाउद्दीन कुछ दिनों तक चित्तौड़ में रुका। उसने अपने पुत्र खिज्र खां को चित्तौड़ का शासन सौंपा और चित्तौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद रख दिया।

1316 ई.

अलाउद्दीन की मृत्यु: अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद खिज्र खां ने चित्तौड़ का कार्यभार मालदेव चौहान (सोनगरा) को सौंपकर दिल्ली चला गया।

⚔️ युद्ध के प्रमुख पहलू

समय
28 जनवरी, 1303 से 26 अगस्त, 1303 (6 महीने 7 दिन)
सुल्तान का शिविर
चितौड़ी नामक पहाड़ी (गंभीरी और बेड़च नदियों के मध्य)
घेराबंदी का तरीका
पूर्ण नाकाबंदी, रसद सामग्री की आपूर्ति रोकना, निरंतर हमले
राजपूत रणनीति
दुर्ग की मजबूत रक्षा व्यवस्था, पर्वतीय स्थिति का लाभ, छापामार युद्ध
जौहर की संख्या
1600 स्त्रियाँ (रानी पद्मिनी के नेतृत्व में)
केसरिया के नायक
गोरा (पद्मिनी के चाचा), बादल (पद्मिनी के भाई), रावल रतनसिंह
विजय का परिणाम
अलाउद्दीन ने कत्लेआम करवाया, चित्तौड़ को खिज्राबाद नाम दिया

🏰 चित्तौड़ दुर्ग की स्थापत्य और रक्षा व्यवस्था

चित्तौड़गढ़ दुर्ग भारत के सबसे विशाल और अजेय दुर्गों में से एक है। यह मेसा पठार पर स्थित है और इसकी प्राकृतिक रक्षा व्यवस्था अत्यंत मजबूत थी।

ऊंचाई
समुद्र तल से लगभग 1850 फीट (564 मीटर)
क्षेत्रफल
लगभग 700 एकड़ (2.8 वर्ग किलोमीटर)
परिधि
लगभग 13 किलोमीटर (किले की दीवारों की लंबाई)
प्रवेश द्वार
7 प्रमुख द्वार (पोल) – पाडन पोल, भैरों पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोड़ला पोल, लक्ष्मण पोल, राम पोल
जल स्रोत
84 जल निकाय (तालाब, कुएं, बावड़ियां) – गौमुख कुंड, रतन सिंह का तालाब
दीवारों की मोटाई
3-5 मीटर तक, ऊंचाई 15-20 मीटर
प्रकार
गिरि दुर्ग (पहाड़ी दुर्ग) – सबसे सुरक्षित माना जाता था

🛡️ दुर्ग की रक्षा व्यवस्था

1️⃣ प्राकृतिक सुरक्षा

तीन तरफ से खड़ी चट्टानें, केवल एक संकरा रास्ता। दुर्ग पर चढ़ाई अत्यंत कठिन थी।

2️⃣ बहुस्तरीय प्रवेश

7 द्वारों से होकर गुजरना पड़ता था, प्रत्येक द्वार पर भारी रक्षा व्यवस्था।

3️⃣ जल संचय

84 जल स्रोत – लंबी घेराबंदी के दौरान भी पानी की कमी नहीं होती थी।

4️⃣ खाद्य भंडारण

विशाल अन्न भंडार और 700 एकड़ में कृषि योग्य भूमि – आत्मनिर्भर दुर्ग।

📚 समकालीन स्रोत – अमीर खुसरो का विवरण

अमीर खुसरो (1253-1325 ई.) अलाउद्दीन खिलजी के दरबारी कवि और इतिहासकार थे। वे चित्तौड़ अभियान के समय सुल्तान के साथ थे। उनकी रचनाओं में चित्तौड़ युद्ध का प्रत्यक्षदर्शी विवरण मिलता है।

✍️ अमीर खुसरो की प्रमुख रचनाएं और विवरण

खजाइन-उल-फुतूह (तारीख-ए-अलाई)
अलाउद्दीन की विजयों का विस्तृत विवरण। चित्तौड़ की घेराबंदी, युद्ध की रणनीति, और अंतिम विजय का समकालीन वर्णन।
आशिक़ा (प्रेम कथा)
इसमें चित्तौड़ अभियान का काव्यात्मक वर्णन है। युद्ध के दृश्यों का सजीव चित्रण।
📖 अमीर खुसरो के अनुसार युद्ध का विवरण:
  • सुल्तान का प्रस्थान: 28 जनवरी 1303 को दिल्ली से विशाल सेना के साथ
  • शिविर स्थल: गंभीरी और बेड़च नदियों के मध्य, चितौड़ी पहाड़ी पर सुल्तान का व्यक्तिगत तंबू
  • घेराबंदी की रणनीति: दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया, रसद आपूर्ति पूर्णतः रोक दी
  • युद्ध यंत्र: मंजनीकों से निरंतर पत्थरबाजी, अरादों से तीरंदाजी
  • राजपूतों का प्रतिरोध: 8 महीने तक वीरतापूर्वक लड़ाई, किले की दीवारों से तीरंदाजी और पत्थरबाजी
  • अंतिम युद्ध: रसद समाप्त होने पर राजपूतों ने द्वार खोलकर मरते दम तक युद्ध किया
  • विजय: 26 अगस्त 1303 को अलाउद्दीन ने चित्तौड़ पर विजय प्राप्त की
🔍 महत्वपूर्ण तथ्य

अमीर खुसरो ने अपने विवरण में रानी पद्मिनी का कोई उल्लेख नहीं किया। उन्होंने केवल सामरिक और राजनीतिक कारणों का वर्णन किया है। यह पद्मावत कथा के काल्पनिक होने का एक प्रमुख प्रमाण है।

📜 अन्य समकालीन और निकटवर्ती स्रोत

जियाउद्दीन बरनी
तारीख-ए-फिरोजशाही (14वीं शताब्दी)
अलाउद्दीन के शासनकाल का विस्तृत विवरण। चित्तौड़ विजय का सामरिक महत्व वर्णित।
इसामी
फुतूह-उस-सलातीन (1350 ई.)
दिल्ली सुल्तानों की विजयों का वर्णन।
हम्मीर रासो
14-15वीं शताब्दी
राजस्थानी काव्य परंपरा में रतनसिंह का वर्णन (ऐतिहासिक और काव्यात्मक मिश्रण)।
कर्नल जेम्स टॉड
Annals and Antiquities of Rajasthan (1829 ई.)
राजस्थानी परंपरा और लोककथाओं के आधार पर विवरण।

⚔️ युद्ध की सैन्य रणनीति

चित्तौड़ युद्ध में दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी सैन्य रणनीति अपनाई। अलाउद्दीन की घेराबंदी रणनीति और राजपूतों की रक्षा व्यवस्था दोनों ही उल्लेखनीय थीं।

🏹 अलाउद्दीन की आक्रमण रणनीति

1️⃣ पूर्ण घेराबंदी (Total Blockade)

दुर्ग को चारों ओर से घेर लिया गया। किसी भी प्रकार की रसद सामग्री या सहायता अंदर नहीं जाने दी गई। बाहरी संपर्क पूर्णतः काट दिया।

2️⃣ मनोवैज्ञानिक युद्ध

निरंतर हमले और युद्ध के नगाड़े बजाकर दुर्ग के अंदर भय और निराशा का वातावरण बनाया। रात में भी चैन से सोने नहीं दिया।

3️⃣ घेराबंदी यंत्रों का प्रयोग

मंजनीक: भारी पत्थर फेंकने के यंत्र, दीवारों को क्षति पहुंचाने के लिए।
अरादा: विशाल धनुष से तीरों की वर्षा।
सुरंग खोदना: दीवारों को गिराने के लिए।

4️⃣ धैर्य और समय का खेल

अलाउद्दीन जानता था कि लंबी घेराबंदी से रसद समाप्त होगी और राजपूतों को आत्मसमर्पण करना पड़ेगा। उसने धैर्य से 8 महीने तक घेराबंदी जारी रखी।

🛡️ राजपूतों की रक्षा रणनीति

1️⃣ दुर्ग की प्राकृतिक रक्षा

पहाड़ी पर स्थित होने से सीधा हमला असंभव था। शत्रु को खड़ी चढ़ाई करनी पड़ती थी जहां ऊपर से तीर, पत्थर और गर्म तेल बरसाया जाता था।

2️⃣ सात द्वारों की रक्षा

प्रत्येक द्वार पर मजबूत रक्षा व्यवस्था। एक द्वार टूटने पर भी शत्रु को शेष छह द्वारों से गुजरना पड़ता। संकरे मार्ग पर बड़ी सेना का कोई लाभ नहीं।

3️⃣ रात्रिकालीन छापामार हमले

राजपूत योद्धा रात में छापामार हमले करते थे। मुगल शिविरों में अचानक हमला कर भारी क्षति पहुंचाते और वापस दुर्ग में आ जाते थे।

4️⃣ जल और खाद्य भंडार

84 जल स्रोत और विशाल अन्न भंडार के कारण लंबी घेराबंदी में भी टिके रहे। दुर्ग के अंदर कृषि भी होती थी।

⚖️ युद्ध का निर्णायक मोड़

  • 8 महीने की लंबी घेराबंदी: अंततः राजपूतों का रसद भंडार समाप्त होने लगा
  • बाहरी सहायता की असंभवता: कोई भी राजपूत राज्य सहायता नहीं भेज सका (अलाउद्दीन की शक्ति का भय)
  • हार का सामना: जब हार निश्चित हो गई तो राजपूतों ने आत्मसमर्पण की जगह वीरगति को चुना
  • साका की परंपरा: जौहर (स्त्रियां) और केसरिया (पुरुष) – सम्मान के साथ मृत्यु

🗡️ गोरा और बादल की वीरता

चित्तौड़ के प्रथम साके में गोरा और बादल की वीरता अमर हो गई। गोरा रानी पद्मिनी के चाचा थे और बादल उनके भाई थे। जब परिस्थिति निराशाजनक हो गई और रसद सामग्री समाप्त होने लगी, तो उन्होंने अंतिम युद्ध का निर्णय लिया।

⚔️ केसरिया – अंतिम युद्ध की तैयारी

🎭 केसरिया क्या है?

केसरिया राजपूत योद्धाओं की वह परंपरा है जब हार निश्चित हो जाती है। केसरिया (भगवा) वस्त्र धारण कर योद्धा अपने दुर्ग के द्वार खोल देते हैं और शत्रु पर टूट पड़ते हैं। यह मरते दम तक लड़ने की प्रतिज्ञा का प्रतीक है। इसका उद्देश्य अधिक से अधिक शत्रुओं को मारना और वीरगति प्राप्त करना होता है।

⚡ गोरा और बादल का पराक्रम

जब रानी पद्मिनी ने जौहर कर लिया, तो गोरा और बादल ने अपने साथियों के साथ केसरिया वस्त्र धारण किए। प्रातःकाल चित्तौड़ दुर्ग के द्वार खोलकर वे मुगल सेना पर टूट पड़े।

  • उन्होंने असंख्य मुगल सैनिकों को मार गिराया
  • अंतिम सांस तक लड़ते रहे और वीरगति प्राप्त की
  • उनकी वीरता ने राजपूत इतिहास में अमर स्थान बनाया
  • उनकी गाथा आज भी लोकगीतों में गाई जाती है
💭 ऐतिहासिक महत्व

गोरा और बादल की वीरता ने राजपूत संस्कृति में केसरिया की परंपरा को स्थापित किया। इसके बाद भी चित्तौड़ में दो और साके हुए, लेकिन प्रथम साके का महत्व सबसे अधिक है क्योंकि इसने भविष्य की पीढ़ियों के लिए एक मिसाल कायम की।

🔥 रानी पद्मिनी का जौहर – प्रथम साका

जब चित्तौड़ की रक्षा असंभव हो गई और हार निश्चित हो गई, तो रानी पद्मिनी ने 1600 स्त्रियों के साथ जौहर किया। यह चित्तौड़ का प्रथम साका था, जो राजपूत इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

🔥 जौहर – राजपूत स्त्रियों का बलिदान

📖 जौहर क्या है?

जौहर राजपूत स्त्रियों की वह प्रथा थी जिसमें युद्ध में हार निश्चित होने पर वे शत्रु के हाथों अपमानित होने से बचने के लिए सामूहिक रूप से अग्नि में कूदकर आत्मबलिदान कर देती थीं। यह उनके सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा का अंतिम उपाय था।

📊 संख्या

1600 स्त्रियाँ ने जौहर किया, जिनमें रानी पद्मिनी, राजपरिवार की महिलाएं और सामान्य स्त्रियाँ शामिल थीं।

👑 नेतृत्व

रानी पद्मिनी ने स्वयं जौहर का नेतृत्व किया और सभी स्त्रियों को साहस दिया।

🕉️ धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

जौहर केवल आत्महत्या नहीं थी, बल्कि यह राजपूत संस्कृति में सम्मान और गौरव का प्रतीक थी। स्त्रियाँ यह मानती थीं कि शत्रु के हाथों अपमानित होने से बेहतर है अग्नि में स्वयं को समर्पित कर देना। इस परंपरा ने राजपूत समाज में महिलाओं की वीरता और त्याग को अमर बना दिया।

📌 चित्तौड़ के तीन साके

  • प्रथम साका (1303 ई.): अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण पर – रानी पद्मिनी का जौहर, रावल रतनसिंह की वीरगति
  • द्वितीय साका (1535 ई.): गुजरात के बहादुर शाह के आक्रमण पर – रानी कर्मवती का जौहर
  • तृतीय साका (1567-68 ई.): अकबर के आक्रमण पर – रानी फूल कंवर का जौहर, जयमल-पत्ता की वीरता

🏛️ खिज्र खां का चित्तौड़ शासन

अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ विजय के बाद कुछ दिनों तक वहाँ रुककर अपने पुत्र खिज्र खां को चित्तौड़ का शासन सौंप दिया और स्वयं दिल्ली लौट गया। उसने चित्तौड़ का नाम बदलकर खिज्राबाद रख दिया।

🏗️ खिज्र खां के निर्माण कार्य

खिज्र खां ने चित्तौड़ में कुछ महत्वपूर्ण निर्माण कार्य करवाए:

  • गंभीरी नदी पर पुल: आसपास के भवनों को तुड़वाकर किले पर पहुंचने के लिए गंभीरी नदी पर पुल बनवाया
  • शिलालेख: इस पुल में शिलालेख भी लगवाए जो मेवाड़ इतिहास के लिए बड़े प्रमाणिक हैं
  • मकबरा (1310 ई.): चित्तौड़ की तलहटी के बाहर एक मकबरा बनवाया गया
📜 1310 ई. का फारसी लेख

मकबरे में लगे हुए 1310 ई. के फारसी लेख में बताया गया है कि अलाउद्दीन खिलजी उस समय का “सूर्य, ईश्वर की छाया और संसार का रक्षक” था। यह लेख अलाउद्दीन की महत्वाकांक्षा और उसकी विजय के गौरव को दर्शाता है।

🔄 मालदेव चौहान को सौंपना (1316 ई.)

1316 ई. में अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु के बाद खिज्र खां ने चित्तौड़ का कार्यभार मालदेव चौहान (सोनगरा) को सौंपकर दिल्ली चला गया। इसके बाद मेवाड़ में फिर से स्वतंत्रता की लहर आई।

🌊 चित्तौड़ विजय का दीर्घकालिक प्रभाव

चित्तौड़ की विजय केवल एक दुर्ग की हार नहीं थी, बल्कि इसने राजस्थान और भारतीय इतिहास पर गहरा प्रभाव डाला।

📊 राजनीतिक और सामरिक प्रभाव

1️⃣ राजपूत शक्ति का क्षय

चित्तौड़ की हार के बाद राजपूत राज्यों में भय का माहौल बन गया। रणथम्भौर और चित्तौड़ – दोनों सबसे मजबूत दुर्गों की हार ने राजपूत शक्ति को कमजोर कर दिया।

2️⃣ दक्षिण विजय का मार्ग

चित्तौड़ विजय के बाद अलाउद्दीन का दक्षिण भारत तक विस्तार सरल हो गया। 1308-1311 के बीच देवगिरि, वारंगल और मदुरै तक विजय प्राप्त की।

3️⃣ अलाउद्दीन की प्रतिष्ठा

चित्तौड़ जीतने के बाद अलाउद्दीन खिलजी की प्रतिष्ठा और शक्ति चरम पर पहुंच गई। वह भारत का सबसे शक्तिशाली सुल्तान बन गया।

4️⃣ मुगल सत्ता की स्थापना

चित्तौड़ पर 13 वर्षों तक (1303-1316) मुस्लिम शासन रहा। यह पहली बार था जब मेवाड़ पर विदेशी शासन स्थापित हुआ।

💪 साका परंपरा की स्थापना

चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.) ने राजपूत इतिहास में एक नई परंपरा की नींव रखी। जब हार निश्चित हो तो आत्मसमर्पण की जगह सम्मान के साथ मृत्यु को चुनना – यह आदर्श स्थापित हो गया।

1303 ई.
आक्रमणकारी: अलाउद्दीन खिलजी
घटनाएं: रानी पद्मिनी का जौहर (1600 स्त्रियां), रावल रतनसिंह की वीरगति
1535 ई. (द्वितीय साका)
आक्रमणकारी: बहादुर शाह (गुजरात)
घटनाएं: रानी कर्मवती का जौहर (13,000 स्त्रियां), राजपूत सैनिकों का केसरिया
1567-68 ई. (तृतीय साका)
आक्रमणकारी: अकबर (मुगल)
घटनाएं: रानी फूल कंवर का जौहर (8,000 स्त्रियां), जयमल-फत्ता की वीरता
🔥 साका परंपरा का महत्व

प्रथम साका ने यह सिद्ध कर दिया कि राजपूत पराजय स्वीकार कर सकते हैं, लेकिन अपमान नहीं। यह परंपरा आगे चलकर राजपूत संस्कृति की पहचान बन गई। जौहर और केसरिया ने राजपूत स्त्रियों और पुरुषों के असाधारण साहस और आत्म-सम्मान को प्रदर्शित किया।

🏰 मेवाड़ की पुनर्स्थापना (1326 ई.)

रावल रतनसिंह की मृत्यु के बाद मेवाड़ पर लगभग 23 वर्षों तक विदेशी शासन रहा। 1316 ई. में अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद स्थिति बदलने लगी।

👑 राणा हम्मीर देव – मेवाड़ का पुनरुद्धारक

शासक
राणा हम्मीर देव सिसोदिया (चौहान शाखा से)
चित्तौड़ विजय
1326 ई. में मालदेव चौहान को पराजित कर चित्तौड़ पुनः विजय
महत्व
राणा शाखा के संस्थापक, मेवाड़ की स्वतंत्रता की पुनर्स्थापना
उपाधि परिवर्तन
“रावल” से “राणा” – नए युग की शुरुआत
वंशज
राणा कुम्भा, राणा सांगा, राणा प्रताप – सभी हम्मीर के वंशज
✨ हम्मीर देव का योगदान
  • चित्तौड़ की पुनर्विजय: 23 वर्षों के विदेशी शासन को समाप्त किया
  • दुर्ग का पुनर्निर्माण: युद्ध में क्षतिग्रस्त दुर्ग और भवनों का जीर्णोद्धार
  • राणा शाखा की स्थापना: नई शासक परंपरा की शुरुआत
  • मेवाड़ का विस्तार: आसपास के क्षेत्रों को फिर से मेवाड़ में मिलाया
  • राजपूत गौरव की बहाली: हार की लज्जा को विजय के गौरव में बदला

🔄 रावल से राणा – एक नए युग का आरंभ

  • रावल शाखा (8वीं शताब्दी – 1303 ई.): बप्पा रावल से रतनसिंह तक
  • विदेशी शासन (1303-1326 ई.): खिज्र खां और मालदेव चौहान
  • राणा शाखा (1326 ई. से): हम्मीर देव से महाराणा प्रताप और उनके वंशज
  • विशेषता: राणा उपाधि अधिक गौरवशाली और शक्तिशाली मानी गई

📚 पद्मावत – इतिहास या काव्य?

मलिक मोहम्मद जायसी ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘पद्मावत’ (1540 ई.) में अलाउद्दीन के चित्तौड़ आक्रमण का कारण रावल रतनसिंह की सुन्दर पत्नी पद्मिनी (पद्मावती) को प्राप्त करने की लालसा बताया है।

📖 पद्मावत की कथा

📝 जायसी का वर्णन

जायसी के अनुसार, अलाउद्दीन ने रानी पद्मिनी के अनुपम सौंदर्य की प्रशंसा सुनकर उसे पाने की इच्छा से चित्तौड़ पर आक्रमण किया। पद्मावत में रानी पद्मिनी को सिंहल (श्रीलंका) की राजकुमारी बताया गया है, जिनके रूप की तुलना किसी से नहीं की जा सकती थी।

🤔 ऐतिहासिक विवाद

यह कथा काल्पनिक प्रतीत होती है क्योंकि:

  • मलिक मोहम्मद जायसी ने पद्मावत ग्रंथ को 1540 ई. में शेरशाह सूरी के समय लिखा
  • रावल रतनसिंह, रानी पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी की यह घटना 1303 ई. की है
  • घटना और ग्रंथ लेखन के बीच 237 वर्ष का अंतर है
  • अलाउद्दीन के समकालीन इतिहासकार अमीर खुसरो ने पद्मिनी का कोई उल्लेख नहीं किया

🔍 इतिहासकारों के मत

परंपरागत इतिहासकार
पद्मिनी की कथा को ऐतिहासिक मानते हैं। उनका मानना है कि जायसी ने लोक परंपरा पर आधारित कथा लिखी।
आधुनिक इतिहासकार
अधिकांश आधुनिक इतिहासकार पद्मिनी की कथा को काल्पनिक मानते हैं। उनके अनुसार अलाउद्दीन का वास्तविक उद्देश्य चित्तौड़ का सामरिक और व्यापारिक महत्व था।
अमीर खुसरो
अलाउद्दीन के दरबारी कवि और समकालीन इतिहासकार। उन्होंने चित्तौड़ विजय का विस्तृत वर्णन किया लेकिन पद्मिनी का कोई उल्लेख नहीं किया।
कर्नल जेम्स टॉड
राजस्थान के इतिहास में पद्मिनी की कथा का उल्लेख किया, लेकिन इसे लोक परंपरा के रूप में प्रस्तुत किया।

💡 निष्कर्ष

वास्तविक कारण: अलाउद्दीन का चित्तौड़ आक्रमण सामरिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों से था, न कि रानी पद्मिनी को पाने के लिए। पद्मावत एक सूफी काव्य है जो प्रेम, त्याग और आध्यात्मिकता के प्रतीकों का उपयोग करता है। हालांकि, यह कथा राजस्थानी लोक संस्कृति का अभिन्न अंग बन गई है और रानी पद्मिनी राजपूत वीरता और त्याग का प्रतीक बन गई हैं।

📚 RPSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु

याद रखने योग्य तथ्य

🎯 मुख्य तथ्य:
  • शासनकाल: 1302-1303 ई. (लगभग 1 वर्ष)
  • विशेषता: रावल शाखा के अंतिम शासक
  • पत्नी: रानी पद्मिनी (पद्मावती)
  • मुख्य घटना: चित्तौड़ का प्रथम साका (1303 ई.)
  • युद्ध प्रारंभ: 28 जनवरी, 1303
  • युद्ध समाप्ति: 26 अगस्त, 1303 (सोमवार)
  • घेराबंदी की अवधि: 6 महीने 7 दिन
  • जौहर की संख्या: 1600 स्त्रियाँ
  • सेनापति: गोरा (पद्मिनी के चाचा), बादल (पद्मिनी के भाई)
  • खिज्राबाद: चित्तौड़ का नया नाम
  • नया शासक: खिज्र खां (अलाउद्दीन का पुत्र)
🎯 संभावित प्रश्न पैटर्न:
  • रावल रतनसिंह किस शाखा के अंतिम शासक थे? (उत्तर: रावल शाखा)
  • चित्तौड़ का प्रथम साका कब हुआ? (उत्तर: 1303 ई.)
  • रानी पद्मिनी के नेतृत्व में कितनी स्त्रियों ने जौहर किया? (उत्तर: 1600)
  • गोरा और बादल कौन थे? (उत्तर: पद्मिनी के चाचा और भाई)
  • अलाउद्दीन ने चित्तौड़ का नाम बदलकर क्या रखा? (उत्तर: खिज्राबाद)
  • पद्मावत किसने लिखा और कब? (उत्तर: मलिक मोहम्मद जायसी, 1540 ई.)
  • अलाउद्दीन खिलजी की मृत्यु कब हुई? (उत्तर: 1316 ई.)
  • चित्तौड़ विजय के बाद किसे शासक बनाया गया? (उत्तर: खिज्र खां)

📅 महत्वपूर्ण तिथियाँ (परीक्षा के लिए)

28 जनवरी, 1303
अलाउद्दीन खिलजी दिल्ली से चित्तौड़ के लिए रवाना
25 अगस्त, 1303
रानी पद्मिनी का जौहर (1600 स्त्रियों के साथ)
26 अगस्त, 1303
रावल रतनसिंह की वीरगति, चित्तौड़ पर अलाउद्दीन का अधिकार
1303-1316 ई.
खिज्र खां का चित्तौड़ शासन
1310 ई.
मकबरे में फारसी लेख (अलाउद्दीन की प्रशंसा में)
1316 ई.
अलाउद्दीन की मृत्यु, मालदेव चौहान को चित्तौड़ सौंपना
1540 ई.
मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा ‘पद्मावत’ की रचना

रावल रतनसिंह और रानी पद्मिनी की गाथा राजस्थान के गौरवशाली इतिहास का अमर अध्याय है।

“जय मेवाड़, जय राजपूताना”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *