ईंटें, मनके और अस्थियाँ – हड़प्पा सभ्यता (संपूर्ण अध्ययन नोट्स)
कक्षा 12 – इतिहास (अध्याय 1)

ईंटें, मनके और अस्थियाँ हड़प्पा सभ्यता (Harappan Civilization)

मास्टर करिकुलम डिज़ाइनर द्वारा तैयार गहन नोट्स: विशिष्ट पुरावस्तुओं से लेकर सभ्यता के पतन तक का विस्तृत अध्ययन।

2600-1900
ईसा पूर्व (परिपक्व काल)
2/3
बस्तियाँ सरस्वती बेसिन में
4:2:1
ईंटों का अनुपात
375-400
लिपि के चिह्न

मुख्य अवधारणाएँ, शर्तें, स्थान और समय

Introductory Concepts, Terms, Place & Time

हड़प्पा सभ्यता (जिसे सिंधु घाटी सभ्यता भी कहा जाता है) के इतिहास का निर्माण मुख्य रूप से पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर किया गया है। चूँकि इस सभ्यता की लिपि को अभी तक पढ़ा नहीं जा सका है, इसलिए हमें उन भौतिक अवशेषों पर निर्भर रहना पड़ता है जो पत्थर, मिट्टी और धातु के रूप में पीछे छूट गए हैं।

विशिष्ट पुरावस्तु: हड़प्पाई मुहर (Seal)

  • सामग्री: सेलखड़ी (Steatite) नामक मुलायम पत्थर।
  • विशेषता: जानवरों के चित्र (जैसे एकश्रृंगी) और एक रहस्यमयी लिपि के चिह्न।
  • महत्व: यह संभवतः लंबी दूरी के व्यापार और विनिमय को सुविधाजनक बनाने के लिए प्रयुक्त होती थी।
हड़प्पाई मुहर

चित्र 1.1: एक हड़प्पाई मुहर

इतिहास जानने के स्रोत

लेखन साक्ष्य उपलब्ध होने के बावजूद अपठनीय हैं, अतः हम इन पर निर्भर हैं:

आवास (Houses) मृदभाण्ड (Pots) आभूषण (Ornaments) औज़ार (Tools) ईंटें (Bricks)

शब्दावली और कालक्रम (Terms & Chronology)

सभ्यता का नामकरण
  • हड़प्पा सभ्यता: ‘हड़प्पा’ नामक स्थान पर पहली बार खोजे जाने के कारण।
  • सिंधु घाटी सभ्यता: सिंधु नदी घाटी के क्षेत्र में मुख्य बस्तियों के कारण।
तिथियाँ (Abbreviations)
  • BP: Before Present (वर्तमान से पहले)।
  • BCE (ई.पू.): Before Common Era (ईसा पूर्व)।
  • CE (ई.): Common Era (ईसा मसीह के जन्म से)।
संस्कृति (Culture)
पुरातत्वविद ‘संस्कृति’ शब्द का प्रयोग पुरावस्तुओं के ऐसे समूह के लिए करते हैं जो एक विशिष्ट शैली की होती हैं और एक विशेष काल तथा भौगोलिक क्षेत्र से संबद्ध होती हैं।
आरंभिक चरण
प्रारंभिक हड़प्पा
6000 – 2600 ई.पू.

कृषि, पशुपालन और शिल्पकारी के शुरुआती साक्ष्य।

FOCUS
शहरी चरण
परिपक्व हड़प्पा
2600 – 1900 ई.पू.

विशिष्ट मृदभांड, ईंटें, नगर नियोजन, मुहरें।

पतन का चरण
उत्तर हड़प्पा
1900 – 1300 ई.पू.

शहरी विशेषताओं का लुप्त होना, ग्रामीण जीवन।

भौगोलिक विस्तार (Geographical Extent)

इस सभ्यता का विस्तार क्षेत्र अत्यंत व्यापक था। इसमें विशिष्ट वस्तुएँ (जैसे मुहरें, बाट, पकी ईंटें) एक विशाल भू-भाग में मिली हैं:

अफ़गानिस्तान
जम्मू
बलूचिस्तान (पाक)
सिंध (पाक)
पंजाब (पाक & भारत)
हरियाणा & राजस्थान
पश्चिमी उत्तर प्रदेश
गुजरात & महाराष्ट्र

निर्वाह के तरीके और कृषि प्रौद्योगिकी

Subsistence Strategies & Agricultural Technology

1. आहार संबंधी आदतें (Dietary Habits)

हड़प्पा सभ्यता के निवासी कई प्रकार के पेड़-पौधों से प्राप्त उत्पाद और जानवरों (मछली सहित) से प्राप्त भोजन करते थे।

पेड़-पौधों से प्राप्त उत्पाद (Plants)

  • अनाज: गेहूँ, जौ, दाल, सफ़ेद चना तथा तिल।
  • बाजरा: गुजरात के स्थलों से इसके दाने बड़ी मात्रा में मिले हैं।
  • चावल: चावल के दाने अपेक्षाकृत बहुत कम पाए गए हैं।

जानवरों से प्राप्त उत्पाद (Animals)

  • पालतू जानवर: मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस तथा सूअर।
  • जंगली प्रजातियाँ: वराह (सूअर), हिरण तथा घड़ियाल (इनकी हड्डियाँ मिली हैं)।
  • अन्य: मछली तथा पक्षियों की हड्डियाँ भी मिली हैं।
पुरा-वनस्पतिज्ञ (Archaeo-botanists): वनस्पति अध्ययन के विशेषज्ञ।
पुरा-प्राणीविज्ञानी (Archaeo-zoologists): जानवरों की हड्डियों के विशेषज्ञ।

2. कृषि प्रौद्योगिकी (Agricultural Technology)

V. IMP

जुताई (Ploughing)

  • वृषभ (Bull): मुहरों और मृण्मूर्तियों से संकेत मिलता है कि वृषभ ज्ञात था और खेतों को जोतने के लिए बैलों का प्रयोग होता था।
  • हल के प्रतिरूप (Models): चोलिस्तान के कई स्थलों और बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल के प्रतिरूप मिले हैं।
  • जुते हुए खेत का साक्ष्य (Kalibangan) आरंभिक हड़प्पा स्तर

    पुरातत्वविदों को राजस्थान के कालीबंगन में जुते हुए खेत (Ploughed Field) के साक्ष्य मिले हैं। यह कृषि इतिहास का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण है।

    तकनीकी विन्यास (Layout):
    • खेत में हल रेखाओं (Furrow marks) के दो समूह विद्यमान थे।
    • ये रेखाएँ एक-दूसरे को समकोण (Right Angles) पर काटती थीं।
    महत्वपूर्ण निष्कर्ष: यह ग्रिड पैटर्न दर्शाता है कि हड़प्पावासी मिश्रित खेती (Mixed Cropping) की तकनीक जानते थे और एक ही खेत में एक साथ दो अलग-अलग फसलें (जैसे सरसों और चना) उगाते थे।

सिंचाई (Irrigation)

महत्वपूर्ण कारण: अधिकांश हड़प्पा स्थल अर्ध-शुष्क क्षेत्रों (Semi-arid lands) में स्थित हैं, जहाँ कृषि के लिए केवल बारिश पर्याप्त नहीं थी, इसलिए सिंचाई आवश्यक थी।

नहरें (Canals)
  • साक्ष्य: शोर्तुघई (अफ़गानिस्तान) से नहरों के स्पष्ट अवशेष मिले हैं।
  • अनुपस्थिति: पंजाब और सिंध में नहरें नहीं मिलीं।
  • कारण (पुरातत्वविदों का मत): संभवतः प्राचीन नहरें बहुत पहले ही गाद (Silt) से भर गई थीं।
जलाशय (Reservoirs) धौलावीरा (गुजरात) में मिले भव्य पत्थर के जलाशयों का प्रयोग संभवतः कृषि के लिए जल संचयन (Water Harvesting) हेतु किया जाता था।
कुएँ (Wells) ऐसा भी संभव है कि कुओं से प्राप्त पानी का प्रयोग सिंचाई के लिए किया जाता था।

कटाई के औज़ार (Harvesting Tools)

पुरातत्वविद अभी भी निश्चित नहीं हैं कि फसल कटाई के लिए किन औजारों का प्रयोग होता था। क्या वे लकड़ी के हत्थों में बिठाए गए पत्थर के फलकों का प्रयोग करते थे या धातु के औज़ारों का? (तांबे के औजार भी मिले हैं)।

अनाज पीसने के यंत्र: अवतल चक्कियाँ (Saddle Querns)

मोहनजोदड़ो में अवतल चक्कियाँ बड़ी संख्या में मिली हैं। ये कठोर, कंकरीले, अग्निज अथवा बलुआ पत्थर से निर्मित थीं। चूंकि इनके तल उत्तल हैं, इन्हें जमीन में जमा कर रखा जाता था।

1. पीसने वाली चक्कियाँ जिन पर दूसरा छोटा पत्थर आगे-पीछे चलाया जाता था (अनाज पीसने के लिए)।
2. सालन/कूटना पत्थर जड़ी-बूटियों और मसालों को कूटने के लिए (Curry Stones)।
रोचक तथ्य (स्रोत 1): अर्नेस्ट मैके ने लिखा है कि ‘सालन पत्थर’ (Curry Stone) का प्रकार इतना आधुनिक दिखता था कि संग्रहालय के बावर्ची ने रसोई में प्रयोग के लिए इसे उधार माँग लिया था।

सामाजिक भिन्नताओं का अवलोकन

Strategies to Find Social Differences

1 शवाधानों का अध्ययन (Study of Burials)

“मिस्र के पिरामिडों (जो हड़प्पा के समकालीन थे) में राजकीय धन-संपत्ति दफनाई जाती थी, लेकिन हड़प्पा में ऐसा नहीं था।”

  • गर्त की बनावट (Pits): मृतकों को गर्तों में दफनाया जाता था। कुछ गर्तों की सतह पर ईंटों की चिनाई मिली है, जो संभवतः सामाजिक भिन्नता का संकेत हो सकती है।
  • आभूषण (Ornaments): पुरुष और महिला दोनों के कंकालों के पास आभूषण मिले हैं।
    साक्ष्य (1980 के दशक में हड़प्पा): एक पुरुष की खोपड़ी के पास शंख के तीन छल्ले, जैस्पर (उपरत्न) के मनके और सैकड़ों सूक्ष्म मनकों का आभूषण मिला।
  • कुछ कब्रों में तांबे के दर्पण (Copper Mirrors) भी मिले हैं।
निष्कर्ष: हड़प्पावासी मृतकों के साथ बहुमूल्य वस्तुएँ दफनाने में विश्वास नहीं रखते थे।

2 ‘विलासिता’ की वस्तुओं की खोज

पुरातत्वविदों ने पुरावस्तुओं को दो वर्गों में वर्गीकृत किया है:

A. उपयोगी वस्तुएँ (Utilitarian)

रोज़मर्रा के उपयोग की वस्तुएँ जो पत्थर या मिट्टी जैसे सामान्य पदार्थों से बनी थीं।
उदाहरण: चक्कियाँ, मृदभांड, सुइयां, झाँवा (flesh-rubbers)। ये बस्तियों में सर्वत्र मिलती हैं।

B. विलास की वस्तुएँ (Luxuries)

महँगी, दुर्लभ, स्थानीय स्तर पर अनुपलब्ध पदार्थों से या जटिल तकनीकों से बनी वस्तुएँ।

उदाहरण: फ़यॉन्स (Faience) के पात्र निर्माण: घिसी हुई रेत/बालू + रंग + गोंद -> पकाया गया। इसे बनाना कठिन था। संभवतः सुगंधित द्रव्यों के पात्र थे।
वितरण (Distribution): महँगी वस्तुएँ केवल बड़ी बस्तियों (मोहनजोदड़ो, हड़प्पा) में मिली हैं, छोटी बस्तियों (कालीबंगन) में नहीं।

वर्गीकरण की समस्या

यदि फ़यॉन्स (दुर्लभ पदार्थ) से बनी तकलियाँ (Spindle whorls – रोजमर्रा की वस्तु) मिलती हैं, तो पुरातत्वविद दुविधा में पड़ जाते हैं कि इसे ‘उपयोगी’ माना जाए या ‘विलास’ की वस्तु।

संचय (Hoards)

सावधानीपूर्वक पात्रों (घड़ों) में दबाकर रखी गई वस्तुएँ। अधिकांश स्वर्णाभूषण संचयों से ही मिले हैं। यह दर्शाता है कि सोना अत्यंत कीमती था।

शिल्प उत्पादन के विषय में जानकारी

Craft Production Centers & Techniques

केस स्टडी

चन्हुदड़ो (Chanhudaro): एक विशिष्ट शिल्प केंद्र

यह मोहनजोदड़ो (125 हेक्टेयर) की तुलना में एक बहुत छोटी बस्ती (मात्र 7 हेक्टेयर) थी, जो लगभग पूरी तरह से शिल्प-उत्पादन में संलग्न थी।

मनके बनाना शंख की कटाई धातु-कर्म मुहर निर्माण बाट बनाना

1. मनकों के निर्माण में प्रयुक्त पदार्थ

पत्थर (Stones)
  • कार्नीलियन: सुंदर लाल रंग का।
  • जैस्पर (Jasper)
  • स्फटिक (Crystal)
  • क्वार्ट्ज़ (Quartz)
  • सेलखड़ी (Steatite): बहुत मुलायम।
धातुएँ (Metals)
  • ताँबा (Copper)
  • काँसा (Bronze)
  • सोना (Gold)
अन्य पदार्थ
  • शंख (Shell)
  • फ़यॉन्स (Faience)
  • पकी मिट्टी (Terracotta)

आकार: चक्राकार, बेलनाकार, गोलाकार, ढोलाकार तथा खंडित। कुछ को चित्रकारी से सजाया गया था।

2. निर्माण की तकनीकें (Techniques)

कार्नीलियन का लाल रंग

यह रंग पीले रंग के कच्चे माल तथा उत्पादन के विभिन्न चरणों में मनकों को आग में पकाकर प्राप्त किया जाता था।

प्रक्रिया: बड़े पिंड को तोड़ना -> शल्क निकालना -> घिसाई -> पॉलिश -> छेद करना।

सेलखड़ी (Steatite) की सूक्ष्मता

यह मुलायम पत्थर है। कुछ मनके इसके चूर्ण के लेप को साँचे में ढालकर बनाए जाते थे, जिससे विविध आकार संभव हुए (ठोस पत्थरों के ज्यामितीय आकारों के विपरीत)।

नोट: प्राचीन तकनीक विशेषज्ञ अभी भी हैरान हैं कि ‘सूक्ष्म मनके’ कैसे बनाए जाते थे।

छेद करने के विशेष उपकरण: चन्हुदड़ो, लोथल और धौलावीरा से मिले हैं।

शंख उत्पादन केंद्र (Shell Industry)

नागेश्वर और बालाकोट: ये बस्तियाँ समुद्र तट के समीप स्थित थीं।

  • उत्पाद: चूड़ियाँ, करछियाँ, पच्चीकारी की वस्तुएँ।
  • यहाँ से तैयार माल दूसरी बस्तियों तक भेजा जाता था।

उत्पादन केंद्रों की पहचान (Identification)

पुरातत्वविद ‘कूड़ा-करकट’ (Waste) को शिल्प कार्य का सबसे अच्छा संकेतक मानते हैं।

पत्थर के बेकार टुकड़े, त्यागा गया माल और अपूर्ण वस्तुएँ बताती हैं कि शिल्प कार्य कहाँ होता था। (यह बड़े शहरों जैसे मोहनजोदड़ो में भी मिला है)।

माल प्राप्त करने की नीतियाँ

Strategies for Procuring Materials & Trade

परिवहन के साधन (Modes of Transport)

स्थल मार्ग (Land Routes) बैलगाड़ियों के मिट्टी से बने खिलौनों के प्रतिरूप संकेत करते हैं कि यह परिवहन का एक महत्वपूर्ण साधन था।
जल मार्ग (Water Routes) सिंधु तथा इसकी उपनदियों के नदी-मार्ग और तटीय मार्गों (Coastal routes) का प्रयोग होता था।

1. उपमहाद्वीप से माल प्राप्त करना (Local Procurement)

नीति (क): बस्तियाँ स्थापित करना (Establishing Settlements)

हड़प्पावासी उन स्थानों पर बस्तियाँ बसाते थे जहाँ कच्चा माल आसानी से उपलब्ध था।

नागेश्वर & बालाकोट शंख (Shell) के लिए (समुद्र तट पर)।
शोर्तुघई (अफ़गानिस्तान) लाजवर्द मणि (Lapis Lazuli – नीला पत्थर) के लिए।
लोथल (गुजरात) कार्नीलियन (भड़ौच से), सेलखड़ी (द. राजस्थान से) और धातु।

नीति (ख): अभियान भेजना (Sending Expeditions)

उन क्षेत्रों में अभियान भेजना जहाँ बस्तियाँ नहीं थीं, लेकिन संसाधन थे।

खेतड़ी अंचल (राजस्थान)

ताँबे (Copper) के लिए। पुरातत्वविदों ने इसे ‘गणेश्वर-जोधपुरा संस्कृति’ का नाम दिया है। यहाँ विशिष्ट गैर-हड़प्पाई मृदभांड और ताँबे की विपुल संपदा मिली है।

दक्षिण भारत

मुख्य रूप से सोने (Gold) के लिए अभियान भेजे जाते थे।

2. सुदूर क्षेत्रों से संपर्क (Contact with Distant Lands)

ओमान (Magan)

ताँबे का आयात

  • रासायनिक साक्ष्य: ओमानी ताँबे और हड़प्पाई वस्तुओं, दोनों में निकल (Nickel) के अंश मिले हैं, जो साझा उद्भव दर्शाते हैं।
  • हड़प्पाई मर्तबान (Black Jar): ओमान में एक विशिष्ट हड़प्पाई मर्तबान मिला है जिस पर काली मिट्टी की मोटी परत चढ़ी थी (रिसाव रोकने के लिए)। ]
  • विनिमय: संभवतः हड़प्पावासी इसमें रखे सामान के बदले ताँबा लेते थे।
मेसोपोटामिया

लिखित साक्ष्य (3000 ई.पू.)

मेसोपोटामियाई लेखों में तीन क्षेत्रों का जिक्र है:

  • दिलमुन: बहरीन द्वीप।
  • मगन: ओमान (ताँबे के लिए)।
  • मेलुहा: हड़प्पाई क्षेत्र (“नाविकों का देश”)।
आयात: कार्नीलियन, लाजवर्द, ताँबा, सोना, लकड़ियाँ।
हाजा पक्षी (Haja Bird) का मिथक

“तुम्हारा पक्षी हाजा पक्षी हो, उसकी आवाज़ राजप्रासाद में सुनाई दे।”
पुरातत्वविदों के अनुसार यह मोर (Peacock) था।

अन्य पुरातात्विक साक्ष्य
  • मेसोपोटामिया में हड़प्पाई मुहरें, बाट और पासे मिले हैं।
  • बेलनाकार मुहर: मेसोपोटामिया की मुहर पर बना ‘कूबड़दार वृषभ’ सिंधु क्षेत्र से प्रेरित लगता है।

मुहरें, लिपि और बाट

Administrative Tools: Seals, Script & Weights

मुहरें और मुद्रांकन (Seals & Sealing)

मुहरों का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्कों को सुविधाजनक बनाने के लिए होता था।

सुरक्षा प्रक्रिया (Security Process):
  1. सामान से भरे थैले का मुख रस्सी से बाँधा जाता था।
  2. गाँठ पर थोड़ी गीली मिट्टी जमा कर एक या अधिक मुहरों से दबाया जाता था।
  3. यदि गंतव्य पर पहुँचने तक मुद्रांकन (Sealing) अक्षुण्ण (intact) रहा, तो इसका अर्थ था कि थैले के साथ छेड़-छाड़ नहीं की गई।
यह प्रेषक की पहचान (Identity) का प्रमाण भी था।

बाट (Weights)

  • सामग्री: चर्ट (Chert) नामक पत्थर।
  • आकार: आमतौर पर घनाकार (Cubical) और किसी भी निशान से रहित।
निचले मानदंड (Lower Denominations) द्विआधारी (Binary): 1, 2, 4, 8, 16, 32… 12,800 तक।
ऊपरी मानदंड (Higher Denominations) दशमलव प्रणाली (Decimal System) का अनुसरण करते थे।

छोटे बाटों का प्रयोग संभवतः आभूषणों और मनकों को तौलने के लिए होता था। (धातु के तराजू के पलड़े भी मिले हैं)।

एक रहस्यमय लिपि (Enigmatic Script)

हड़प्पाई मुहरों पर एक पंक्ति में कुछ लिखा होता है (संभवतः मालिक का नाम)। साथ ही एक जानवर का चित्र होता था (अनपढ़ लोगों के लिए संकेत)।

विशेषताएँ
  • यह वर्णमालीय नहीं थी (चिह्नों की संख्या बहुत अधिक है)।
  • चिह्नों की संख्या: 375 से 400 के बीच।
  • सबसे लंबा अभिलेख: लगभग 26 चिह्न।
लिखने की दिशा

दाएँ से बाएँ (Right to Left)

साक्ष्य: मुहरों पर दाईं ओर चौड़ा अंतराल है और बाईं ओर संकुचित (स्थान कम पड़ने के कारण)।

लेखन के साक्ष्य कहाँ मिले?
मुहरें ताँबे के औजार मर्तबानों के रिम ताँबे/मिट्टी की पट्टिकाएँ आभूषण अस्थि छड़ें प्राचीन सूचना पट्ट (धौलावीरा)

*क्या साक्षरता व्यापक थी? (नष्टप्राय वस्तुओं पर भी लिखावट हो सकती थी)

प्राचीन सत्ता (Ancient Authority)

Political Organization & Decision Making

जटिल फैसले और कार्यान्वयन के संकेत (Indications of Complex Decisions)

हड़प्पाई समाज में ऐसे कई संकेत मिलते हैं जो यह दर्शाते हैं कि जटिल निर्णय लिए जाते थे और उन्हें लागू किया जाता था:

1. असाधारण एकरूपता (Uniformity)

मृदभांडों, मुहरों, बाटों और ईंटों में।
ईंटें: जिनका उत्पादन अलग-अलग केंद्रों पर होता था, फिर भी जम्मू से गुजरात तक पूरे क्षेत्र में उनका अनुपात समान (4:2:1) था।

2. नियोजित बस्तियाँ (Planned Settlements)

बस्तियाँ रणनीतिक रूप से कच्चे माल के स्रोतों के पास बसाई गई थीं।

3. संगठित श्रम (Organized Labor)

ईंटें बनाने और विशाल दीवारों/चबूतरों के निर्माण के लिए श्रम को बड़े पैमाने पर संगठित किया गया था।

“इन सभी क्रियाकलापों को कौन संगठित करता था?”

सत्ता का केंद्र: पुरातत्वविदों के विचार

प्रासाद (Palace)

मोहनजोदड़ो में मिले एक विशाल भवन को पुरातत्वविदों ने ‘प्रासाद’ की संज्ञा दी।
परंतु, इससे संबद्ध कोई भव्य वस्तुएँ (Spectacular finds) नहीं मिली हैं।

पुरोहित-राजा (Priest-King)

एक पत्थर की मूर्ति (घुटने पर हाथ रखे हुए) को ‘पुरोहित-राजा’ कहा गया।

नामकरण का कारण: पुरातत्वविद मेसोपोटामिया के इतिहास और वहाँ के ‘पुरोहित-राजाओं’ से परिचित थे और उन्होंने सिंधु क्षेत्र में भी वैसी ही समानताएँ ढूँढ़ीं।

शासक कौन था? (Three Theories)

मत 1: कोई शासक नहीं

हड़प्पाई समाज में सभी की सामाजिक स्थिति समान थी।

मत 2: कई शासक

मोहनजोदड़ो, हड़प्पा आदि के अपने अलग-अलग राजा होते थे।

मत 3: एक ही राज्य

पुरावस्तुओं में समानता, नियोजित बस्तियाँ और ईंटों के अनुपात के कारण यह मत प्रबल है।

निष्कर्ष (Conclusion): ऐसा प्रतीत होता है कि हड़प्पावासियों ने एक प्रकार की लोकतांत्रिक प्रणाली (Democratic System) को अपनाया था। क्योंकि उस समय में कुछ भवनों एवं सुविधाओं को लोगों के लिए और लोगों के द्वारा बनाया गया था।

सभ्यता का अंत (The End of Civilization)

Decline (c. 1800 BCE) & Theories

पतन का कालक्रम (Chronology)

  • 1800 ई.पू. तक चोलिस्तान (Cholistan) जैसे क्षेत्रों में अधिकांश विकसित हड़प्पा स्थलों को त्याग दिया गया था।
  • 1900 ई.पू. के बाद गुजरात, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की नई बस्तियों में आबादी बढ़ने लगी।
  • उत्तर हड़प्पा बाद की संस्कृतियों को ‘उत्तर हड़प्पा’ (Late Harappan) या ‘अनुवर्ती संस्कृतियाँ’ कहा गया, जो ग्रामीण जीवनशैली की ओर संकेत करती हैं।

भौतिक संस्कृति में बदलाव

  • विशिष्ट वस्तुओं का लोप: मुहरें, बाट (Weights), विशिष्ट मनके और लंबी दूरी का व्यापार समाप्त हो गया।
  • लेखन का अंत: लिपि का प्रयोग बंद हो गया।
  • निर्माण में ह्रास: आवास निर्माण की तकनीकें कमजोर हो गईं। बड़ी सार्वजनिक संरचनाओं (जैसे स्नानागार) का निर्माण बंद हो गया।
  • स्थानीय बाट: मानकीकृत बाट प्रणाली के स्थान पर स्थानीय बाटों का प्रयोग होने लगा।

पतन के संभावित कारण

ये कारण कुछ बस्तियों के लिए सही हो सकते हैं, परन्तु पूरी सभ्यता के पतन की व्याख्या नहीं करते।

  • जलवायु परिवर्तन (Climate Change)
  • वनों की कटाई (Deforestation)
  • अत्यधिक बाढ़ या नदियों का सूख जाना (जैसे सरस्वती नदी)।
  • एकीकरण का अंत: सबसे प्रबल तर्क यह है कि ‘हड़प्पाई राज्य’ जैसा सुदृढ़ एकीकरण तत्व समाप्त हो गया था।

आक्रमण का सिद्धांत: एक विवाद (The Invasion Debate)

क्या आर्यों ने हड़प्पा सभ्यता को नष्ट किया?

1. सिद्धांत का प्रतिपादन (R.E.M. Wheeler, 1947)

मोहनजोदड़ो की ‘डेडमेन लेन’ (Deadman Lane) में मिले नरकंकालों को आधार बनाकर व्हीलर ने तर्क दिया कि सभ्यता का अंत एक बाहरी आक्रमण से हुआ।

तर्क: ऋग्वेद में इंद्र को ‘पुरंदर’ (गढ़-विध्वंसक) कहा गया है। व्हीलर ने इंद्र को ‘अभियुक्त’ माना।
2. खंडन (George Dales, 1964)

डेल्स ने सिद्ध किया कि ये अस्थि-पंजर एक ही काल के नहीं थे।

  • विनाश का कोई स्तर (Layer of destruction) नहीं मिला।
  • व्यापक अग्निकांड के चिह्न नहीं हैं।
  • कवचधारी सैनिकों के शव नहीं मिले हैं।
3. नवीनतम साक्ष्य: राखीगढ़ी DNA (2013-2019)

राखीगढ़ी (हरियाणा) से प्राप्त कंकाल के DNA विश्लेषण से पता चला कि हड़प्पावासी इस क्षेत्र के मूल निवासी (Indigenous) थे।

आर्यन आक्रमण खारिज 5000 वर्षों की निरंतरता

हड़प्पा सभ्यता की खोज (Discovery)

From Confusion to Clarity

जब हड़प्पा सभ्यता के शहर नष्ट हो गए, तो लोग धीरे-धीरे उनके विषय में सब कुछ भूल गए। बाद में जब लोगों ने यहाँ ईंटें चुराना या खेती करना शुरू किया, तो उन्हें अपरिचित वस्तुएँ मिलीं, जिनका अर्थ वे समझ नहीं पाए।

1 कनिंघम का भ्रम (Cunningham’s Confusion)

  • परिचय: अलेक्जेंडर कनिंघम, भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण (ASI) के पहले डायरेक्टर जनरल।
  • रुचि: उनकी मुख्य रुचि आरंभिक ऐतिहासिक काल (6ठी शताब्दी ई.पू. से 4थी शताब्दी ईस्वी) में थी।
  • मार्गदर्शन: वे लिखित स्रोतों (जैसे चीनी बौद्ध तीर्थयात्रियों के वृत्तांत) का प्रयोग करना पसंद करते थे।
  • गलती क्या हुई? हड़प्पा चीनी यात्रियों के यात्रा-कार्यक्रम (Itinerary) में नहीं था। जब एक अंग्रेज ने उन्हें हड़प्पाई मुहर दी, तो उन्होंने उसे उस काल-खंड (ऐतिहासिक काल) में दिनांकित करने का असफल प्रयास किया जिससे वे परिचित थे। वे हड़प्पा की प्राचीनता को समझ नहीं पाए।

“उन्होंने सोचा कि भारतीय इतिहास गंगा की घाटी के शहरों के साथ शुरू हुआ था।”

2 एक नवीन प्राचीन सभ्यता (1920s)

दया राम साहनी (1921)

हड़प्पा में मुहरें खोज निकालीं (जो ऐतिहासिक काल से बहुत पुरानी थीं)।

राखाल दास बनर्जी (1922)

मोहनजोदड़ो में मुहरें ढूँढ़ीं, जिससे यह सिद्ध हुआ कि दोनों स्थल एक ही संस्कृति के भाग हैं।

सर जॉन मार्शल (1924)

ASI के डायरेक्टर जनरल के रूप में, उन्होंने पूरे विश्व के सामने सिंधु घाटी में एक नवीन सभ्यता की खोज की घोषणा की।

“मार्शल ने भारत को जहाँ पाया था, उसे उससे तीन हज़ार वर्ष पीछे छोड़ा” – एस.एन. राव

कमी (Methodological Flaw): मार्शल ने टीले के स्तर-विन्यास (Stratigraphy) को अनदेखा कर पूरे टीले में समान परिमाण वाली नियमित क्षैतिज इकाइयों (Horizontal Excavation) में खुदाई की। इससे संदर्भ (Context) की जानकारी हमेशा के लिए नष्ट हो गई।

पुरातत्व तकनीक: स्तर-विन्यास (Stratigraphy)

पुरास्थल के टीले (Mounds) क्रमिक परतों (Layers) से बनते हैं।

  • सबसे निचले स्तर = प्राचीनतम (Oldest)
  • सबसे ऊपरी स्तर = नवीनतम (Newest)
  • बंजर स्तर: वह परत जहाँ किसी बसावट के सबूत नहीं मिलते (परित्याग का काल)।

3 नयी तकनीकें (Wheeler, 1944)

आर.ई.एम. व्हीलर (R.E.M. Wheeler)

इन्होंने मार्शल की गलती सुधारी। उन्होंने पहचाना कि एकसमान क्षैतिज इकाइयों के बजाय टीले के स्तर-विन्यास (Stratigraphy) का अनुसरण करना आवश्यक था।

सैनिक परिशुद्धता (Military Precision)

विभाजन का प्रभाव (Post-1947)

चूँकि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो पाकिस्तान में चले गए, भारतीय पुरातत्वविदों ने भारत में नए स्थलों को ढूँढा:

कच्छ (गुजरात) पंजाब हरियाणा (राखीगढ़ी)

आधुनिक अन्वेषण (1980s onwards)

अब अंतर्राष्ट्रीय सहयोग से सतह अन्वेषण (Surface Exploration) और वैज्ञानिक तकनीकों (मिट्टी/पत्थर/वनस्पति अवशेषों का सूक्ष्म विश्लेषण) पर जोर दिया जा रहा है।

अतीत को जोड़कर पूरा करने की समस्याएँ

Problems of Piecing Together the Past

1. क्या बचता है? (The Survival Issue)

पुरातत्व केवल भौतिक अवशेषों पर निर्भर है। समस्या यह है कि जैविक पदार्थ (कपड़ा, चमड़ा, लकड़ी, सरकंडे) उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में अक्सर सड़ जाते हैं।
जो बचता है: पत्थर, पकी मिट्टी (Terracotta), और धातु।

पुनर्चक्रण (Recycling): केवल टूटी हुई या अनुपयोगी वस्तुएँ ही फेंकी जाती थीं। अक्षत (Intact) वस्तुएँ या तो खो गई थीं या संचय (Hoard) थीं जो कभी वापस नहीं निकाली गईं।

2. खोजों का वर्गीकरण (Classification of Finds)

A. पदार्थ के आधार पर

यह सरल है: पत्थर, मिट्टी, धातु, अस्थि, हाथीदाँत आदि।

B. उपयोगिता के आधार पर (जटिल)

क्या यह औजार है, आभूषण है, या आनुष्ठानिक वस्तु? यह तय करना कठिन होता है।

C. आधुनिक समानता

मनके, चक्कियाँ, पत्थर के फलक—इनका कार्य आज की वस्तुओं से समानता के आधार पर समझा जाता है।

D. संदर्भ (Context)

वस्तु कहाँ मिली? घर में, नाले में, कब्र में या भट्ठी में? इससे उसका उपयोग तय होता है।

अप्रत्यक्ष साक्ष्य: जैसे, कपास के कपड़े सड़ गए, लेकिन मूर्तियों के पहनावे से हमें कपड़ों के बारे में पता चलता है।

3. व्याख्या की समस्याएँ: धार्मिक प्रथाएँ

पुरातत्वविद अक्सर “असामान्य और अपरिचित” वस्तुओं को धार्मिक महत्व का मान लेते हैं।

मातृदेवियाँ (Mother Goddesses)

आभूषणों से लदी हुई नारी मृण्मूर्तियाँ, जिनके शीर्ष पर विस्तृत प्रसाधन थे।

आद्य शिव (Proto-Shiva)

मुहरों पर एक पुरुष जिसे ‘योगी’ की मुद्रा में बैठे और जानवरों से घिरा (पशुपति) दिखाया गया है।

लिंग और प्रकृति पूजा

पत्थर की शंक्वाकार वस्तुओं को लिंग माना गया। पेड़-पौधे (पीपल) और एकश्रृंगी जानवर (Unicorn) भी धार्मिक संकेत माने गए।

व्याख्या का संकट: शिव या शमन? (The Rudra Conundrum)

पुरातत्वविदों का तर्क: ‘आद्य शिव’ हिंदू देवता शिव का प्रारंभिक रूप है।
ऋग्वेद (1500-1000 ई.पू.) का साक्ष्य: ऋग्वेद में रुद्र नामक देवता हैं (जो बाद में शिव कहलाए)।
विसंगति (Contradiction): ऋग्वेद में रुद्र को न तो ‘पशुपति’ (जानवरों के स्वामी) और न ही ‘योगी’ के रूप में दिखाया गया है।
अतः यह चित्रण वैदिक रुद्र से मेल नहीं खाता। कुछ विद्वान इसे शमन (Shaman) मानते हैं।

महत्वपूर्ण कालरेखा (Timelines)

1. आरंभिक भारतीय पुरातत्व के प्रमुख कालखंड (Major Periods)

STONE AGE
पुरापाषाण (Paleolithic) 20 लाख – 12,000 वर्ष पूर्व
निम्न: 20 लाख BP
मध्य: 80,000 BP
उच्च: 35,000 BP
मध्य पाषाण (Mesolithic) 12,000 वर्ष पूर्व
नवपाषाण (Neolithic) 10,000 वर्ष पूर्व

आरंभिक कृषक तथा पशुपालक।

ताम्रपाषाण (Chalcolithic) 6,000 वर्ष पूर्व

ताँबे का पहली बार प्रयोग।

हड़प्पा सभ्यता 2600 ई.पू. (BCE)

नगरीय सभ्यता का विकास (परिपक्व चरण)।

आरंभिक लौहकाल (महापाषाण) 1000 ई.पू.
आरंभिक ऐतिहासिक काल 600 ई.पू. – 400 ई.

2. हड़प्पा पुरातत्व के विकास के चरण (Key Milestones)

उन्नीसवीं शताब्दी
1875
अलेक्जेंडर कनिंघम: हड़प्पाई मुहर पर पहली रिपोर्ट। महत्व समझने में चूक गए
1920s: महान खोज
1921
दया राम साहनी (हड़प्पा)
1922
राखाल दास बनर्जी (मोहनजोदड़ो)
1924: जॉन मार्शल द्वारा नई सभ्यता की घोषणा
1940s – 1960s: तकनीक & विस्तार
1944
आर.ई.एम. व्हीलर (Stratigraphy पर जोर)
1955
एस.आर. राव (लोथल खुदाई)
1960
बी.बी. लाल & थापर (कालीबंगन)
1970s – वर्तमान: आधुनिक युग
1974: बहावलपुर (मुगल)
1980: जर्मन-इतावली दल
1986: अमरीकी दल
1990: धौलावीरा (बिष्ट)
1997
राखीगढ़ी खुदाई (अमरेंद्र नाथ)
2013
राखीगढ़ी DNA शोध (वसंत शिंदे)

कक्षा 12 इतिहास – थीम 1: ईंटें, मनके और अस्थियाँ

Bharat Choudhary | Lecturer, GSSS Jethantri 🌱

Explore us → gsssjethantri.in

Content, design & craft ✨ by Bharat Choudhary

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *