राव चन्द्रसेन: मारवाड़ का प्रताप – विस्तृत अध्ययन

राव चन्द्रसेन

1562 – 1581 ई. | मारवाड़ का प्रथम विद्रोही

राव चन्द्रसेन

राठौड़ वंश

मारवाड़ का प्रताप भूला-बिसरा नायक पथ-प्रदर्शक

शासक परिचय (Profile)

शासन काल 1562 – 1581 ई.
जन्म जुलाई, 1541 ई.
पिता / माता राव मालदेव / स्वरूपदे (झाला रानी)
राजधानी जोधपुर (प्रारंभिक), सिवाना, भाद्राजूण (निर्वासन)
प्रमुख शत्रु मुगल सम्राट अकबर
मृत्यु / समाधि 11 जनवरी 1581 / सचियाय (सारण की पहाड़ियाँ)

⚔️ राज्यारोहण और गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि

राव चन्द्रसेन राव मालदेव के सबसे बड़े पुत्र नहीं थे। मालदेव के बड़े पुत्र राम और उदयसिंह (मोटा राजा) थे। परन्तु, रानी स्वरूपदे के प्रभाव और चन्द्रसेन की योग्यता को देखते हुए मालदेव ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी चुना।

💡 अवधारणात्मक समझ (Concept Link)

राजपूत परंपरा में अक्सर ज्येष्ठ पुत्र ही राजा बनता था, लेकिन जब राजा किसी कनिष्ठ पुत्र को अपनी योग्यता या रानी के प्रभाव में चुनता था, तो उत्तराधिकार संघर्ष (War of Succession) अपरिहार्य हो जाता था। मुगलों ने इसी आपसी फूट का फायदा उठाकर राजस्थान में अपनी पैठ जमाई।

मालदेव की मृत्यु के बाद 31 दिसम्बर 1562 ई. को चन्द्रसेन गद्दी पर बैठे। उन्हें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ा:

  1. बाहरी: मुगल आक्रांता।
  2. आंतरिक: अपने सगे भाई (राम और उदयसिंह) जो अकबर से जा मिले।
लोहावट का संघर्ष: चंद्रसेन के भाई उदयसिंह ने विद्रोह किया। दोनों के मध्य लोहावट में भीषण संघर्ष हुआ, जिसमें चन्द्रसेन ने उदयसिंह पर बरछी से प्रहार किया। उदयसिंह घायल होकर घोड़े से गिर गए और उनके साथी उन्हें बचाकर ले गए।

1564 में राम की सहायता के लिए अकबर ने हुसैन कुली खाँ को भेजा, जिसने जोधपुर पर अधिकार (1564 ई.) कर लिया। यहीं से चन्द्रसेन का निर्वासन जीवन शुरू हुआ।

👑 नागौर दरबार (1570): इतिहास का मोड़

1570 का नागौर दरबार राजस्थान के इतिहास में एक जल-विभाजक (Watershed) क्षण था। अकबर ने ‘अकाल राहत’ के बहाने नागौर दुर्ग में ‘शुक्र तालाब’ का निर्माण करवाया, ताकि वह राजपूत शासकों की निष्ठा परख सके।

इस दरबार में राजपूताने के कई प्रमुख शासक शामिल हुए:

  • जैसलमेर से हरराय भाटी
  • बीकानेर से कल्याणमल और उनके पुत्र रायसिंह
  • कोटा से दुर्जनशाल हाड़ा
  • फलौदी से चन्द्रसेन के भाई उदयसिंह
  • भाद्राजूण से स्वयं चन्द्रसेन

चन्द्रसेन जोधपुर प्राप्ति की आशा से नागौर पहुंचे थे, लेकिन अकबर का झुकाव उनके विरोधी भाइयों (राम और उदयसिंह) की तरफ देखकर और स्वाभिमान से समझौता न करने की ठानकर, वे बिना मिले ही वापस लौट आए।

अकबर ने इसे अपना अपमान समझा और 1572 से 1574 ई. के बीच बीकानेर के रायसिंह को जोधपुर का प्रशासक नियुक्त कर दिया।

🔥 ‘मारवाड़ का प्रताप’: संघर्ष और छापामार युद्ध

जोधपुर हाथ से निकलने के बाद चन्द्रसेन ने मुगलों के खिलाफ छापामार (Guerrilla) युद्ध नीति अपनाई। वे राजस्थान के पहले शासक थे जिन्होंने मुगलों के खिलाफ इस रणनीति का प्रभावी उपयोग किया।

1573 ई. – सोजत और सिवाना अभियान

अकबर ने शाहकुली खाँ के नेतृत्व में सेना भेजी, जिसमें जगतसिंह, केशवदास मेड़तिया और बीकानेर का रायसिंह शामिल थे।

यह सेना सोजत में कल्ला राठौड़ को परास्त कर आगे बढ़ी। सिवाना आने पर चन्द्रसेन किले की रक्षा का भार फत्ता राठौड़ को सौंपकर पहाड़ों में चले गए, जिससे मुगल सेना खाली हाथ रह गई।
1575 ई. – जलाल खाँ का अंत

अकबर ने जलाल खाँ के नेतृत्व में पुनः सेना सिवाना भेजी। इस संघर्ष में जलाल खाँ, चन्द्रसेन और उनके सहयोगी देवीदास के हाथों मारा गया।

सिवाना का पतन

बाद में अकबर ने शाहबाज खाँ को भेजा। इस बार मुगल सेना सिवाना (मारवाड़ की संकटकालीन राजधानी) को जीतने में सफल रही। इसके बाद चन्द्रसेन पीपलूद और काणुजा की पहाड़ियों में चले गए।

1575-76 ई. – पोकरण का त्याग (आर्थिक बलिदान)

अक्टूबर 1575 में जैसलमेर के हरराय भाटी ने पोकरण को घेर लिया। उस समय पोकरण का प्रशासन पंचोल आनन्द के पास था।

चार माह की घेराबंदी के बाद, आर्थिक संकट के चलते चन्द्रसेन ने मांगलिया भोज के माध्यम से समझौता किया। उन्होंने एक लाख फदिये (मुद्रा) के बदले पोकरण दुर्ग भाटियों को सौंप दिया। शर्त यह थी कि जब जोधपुर वापस मिलेगा, तब पैसा लौटाकर पोकरण वापस ले लिया जाएगा। 19 जनवरी 1576 को यह दुर्ग हरराय को सौंप दिया गया।

⚖️ तुलनात्मक अध्ययन: चन्द्रसेन बनाम प्रताप

इतिहासकार विश्वेश्वरनाथ रेऊ ने चन्द्रसेन की तुलना महाराणा प्रताप से की है, क्योंकि दोनों ने समान मुगल शक्ति का सामना किया और तमाम कठिनाइयों के बावजूद अधीनता स्वीकार नहीं की।

आधार राव चन्द्रसेन महाराणा प्रताप
संघर्ष का समय अकबर से संघर्ष पहले शुरू किया (1562 से)। अकबर से संघर्ष बाद में शुरू हुआ (1572 से)।
भौगोलिक स्थिति मारवाड़ (रेगिस्तानी और खुले क्षेत्र), जहाँ छुपना कठिन था। मेवाड़ (अरावली की घनी पहाड़ियाँ), जो सुरक्षा के लिए अनुकूल थीं।
सहयोगी भाई विरोधी थे, सामंतों का पूर्ण सहयोग नहीं मिला। भील जनजाति और निष्ठावान सामंतों का साथ मिला।
उपाधि मारवाड़ का भूला-बिसरा राजा। मेवाड़ केसरी, हल्दीघाटी का शेर।
विशेष नोट: चन्द्रसेन की कठिनाइयाँ प्रताप से अधिक मानी जाती हैं क्योंकि उनके पास अरावली जैसी सुरक्षित प्राकृतिक दीवारें नहीं थीं और उन्हें अपने ही भाइयों के विश्वासघात का सामना करना पड़ा।

🕊️ अंतिम समय और मृत्यु

अपने अंतिम दिनों में, 1580 ई. में चन्द्रसेन ने सोजत को पुनः जीत लिया। वे पाली जिले के सारण की पहाड़ियों में ‘सचियाय’ नामक स्थान पर रहने लगे।

मृत्यु (11 जनवरी 1581): जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार, उनके एक सामंत वैरसल ने विश्वासघात कर भोजन में विष दे दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।

सारण में समाधि: उनकी स्मृति में सारण की पहाड़ियों में एक स्मारक बना है, जहाँ उनकी मूर्ति के साथ पाँच सती होने वाली रानियों की मूर्तियाँ भी उत्कीर्ण हैं।

विरासत: राव चन्द्रसेन अकबरकालीन राजस्थान के प्रथम स्वतंत्र प्रकृति के शासक थे। इतिहास में समुचित महत्व न मिलने के कारण उन्हें ‘मारवाड़ का भूला बिसरा नायक’ कहा जाता है। उनकी मृत्यु के बाद अकबर ने उनके भाई उदयसिंह (मोटा राजा) को मारवाड़ का शासक बनाया।

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