भारत में राष्ट्रवाद Nationalism in India
उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन से स्वतंत्रता संग्राम तक की यात्रा: गांधीजी का आगमन, सत्याग्रह और जन-आंदोलन।
राष्ट्रवाद: अवधारणा और भारतीय संदर्भ
Concept & Context of Nationalism in India
यूरोप में आधुनिक राष्ट्रवाद
यूरोप में आधुनिक राष्ट्रवाद के उदय के साथ ही राष्ट्र-राज्यों (Nation-States) का निर्माण हुआ। इस प्रक्रिया ने लोगों की सोच और पहचान को पूरी तरह बदल दिया:
- लोगों में यह समझ बदली कि वे कौन हैं और उनकी पहचान किस बात से परिभाषित होती है।
- उनमें अपने राष्ट्र के प्रति लगाव और निष्ठा का भाव पैदा हुआ।
- नए प्रतीकों, चिह्नों, और गीतों ने लोगों के बीच नए संपर्क सूत्र स्थापित किए।
- समुदायों की पुरानी सीमाओं को दोबारा परिभाषित किया गया।
यूरोप के ज़्यादातर देशों में यह नई राष्ट्रीय पहचान एक लंबी और क्रमिक प्रक्रिया के माध्यम से निर्मित हुई, जिसमें साझा संस्कृति और भाषा ने अहम भूमिका निभाई।
भारत (और वियतनाम जैसे अन्य उपनिवेशों) में स्थिति भिन्न थी। यहाँ आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय ‘उपनिवेशवाद विरोधी आंदोलन’ (Anti-colonial Movement) के साथ गहरे तौर पर जुड़ा हुआ था। विदेशी शासन के खिलाफ संघर्ष ही वह धुरी थी जिस पर राष्ट्रवाद टिका था।
औपनिवेशिक शासकों के खिलाफ संघर्ष के दौरान लोग आपसी एकता को पहचानने लगे थे।
- साझा शत्रु: ब्रिटिश शासन।
- साझा भावना: उत्पीड़न (Oppression) और दमन (Suppression) के भाव ने विभिन्न समूहों को एक-दूसरे से बाँध दिया था।
- हर वर्ग को लग रहा था कि विदेशी शासन उनके अधिकारों का हनन कर रहा है।
विविधता और कांग्रेस की भूमिका
हालांकि दुश्मन एक था, लेकिन औपनिवेशिक शासन का असर हर वर्ग और समूह पर एक जैसा नहीं था:
- किसानों के लिए समस्या भारी लगान थी, तो व्यापारियों के लिए आयात नियम।
- सभी के अनुभव अलग थे, इसलिए उनके लिए स्वतंत्रता के मायने भी भिन्न थे।
महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने इन बिखरे हुए समूहों और उनकी अलग-अलग माँगों को इकट्ठा करके एक विशाल जन-आंदोलन खड़ा किया। कांग्रेस ने कोशिश की कि एक समूह की माँगों से दूसरा समूह नाराज़ न हो, लेकिन इस एकता में अक्सर टकराव के बिंदु भी निहित होते थे।
चित्र: राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान सड़कों पर उमड़ा जनसैलाब, जो दर्शाता है कि कैसे विविध वर्ग साझा उद्देश्य के लिए एक साथ आए।
1. प्रथम विश्व युद्ध, खिलाफत और असहयोग
First World War, Khilafat & Non-Cooperation
1.1 प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव (1914-1918)
युद्ध ने एक नई आर्थिक और राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी थी। लोगों को उम्मीद थी कि युद्ध खत्म होने पर मुसीबतें कम होंगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
- रक्षा व्यय: भारी इज़ाफ़ा हुआ, जिसकी भरपाई के लिए युद्ध के नाम पर कर्ज़ लिए गए।
- कर वृद्धि: सीमा शुल्क (Custom Duties) बढ़ा दिया गया और आयकर (Income Tax) शुरू किया गया।
- महंगाई: 1913 से 1918 के बीच कीमतें दोगुनी हो गईं, जिससे आम आदमी का जीवन कष्टमय हो गया।
- जबरन भर्ती: गाँवों में सिपाहियों की आपूर्ति के लिए लोगों को ज़बरदस्ती सेना में भर्ती किया गया, जिससे ग्रामीण इलाकों में व्यापक गुस्सा था।
- अकाल और महामारी: 1918-19 और 1920-21 में फसलें खराब हो गईं। साथ ही ‘फ्लू’ की महामारी फैल गई।
- मृत्यु दर: 1921 की जनगणना के मुताबिक, अकाल और महामारी से 120-130 लाख (12-13 मिलियन) लोग मारे गए।
1.2 खिलाफत का मुद्दा (The Khilafat Issue)
प्रथम विश्व युद्ध में ऑटोमन तुर्की की हार हुई थी। अफवाह थी कि इस्लामिक विश्व के आध्यात्मिक नेता (खलीफ़ा – ऑटोमन सम्राट) पर एक सख्त शांति संधि थोपी जाएगी।
- गठन: मार्च 1919, बम्बई (Mumbai)।
- नेता: मोहम्मद अली और शौकत अली (अली बंधु)।
- उद्देश्य: खलीफ़ा की तात्कालिक शक्तियों की रक्षा करना।
- उन्हें लगा कि यह हिंदू-मुस्लिम एकता का स्वर्णिम अवसर है।
- कलकत्ता अधिवेशन (सितंबर 1920): गांधीजी ने कांग्रेस नेताओं को राजी किया कि खिलाफत और स्वराज के लिए असहयोग आंदोलन शुरू किया जाए।
1.3 असहयोग ही क्यों?
“भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ है और इसी सहयोग के कारण चल पा रहा है। अगर भारत के लोग अपना सहयोग वापस ले लें, तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।”
– महात्मा गांधी
3. सत्याग्रह का विचार (1915-1918)
The Idea of Satyagraha
महात्मा गांधी जनवरी 1915 में भारत लौटे। इससे पहले वे दक्षिण अफ्रीका में थे, जहाँ उन्होंने एक नई तरह के जनांदोलन के रास्ते पर चलते हुए नस्लभेदी सरकार से सफलतापूर्वक लोहा लिया था। इस पद्धति को वे सत्याग्रह कहते थे।
सत्याग्रह का दर्शन
- सत्य की शक्ति: सत्याग्रह के विचार में सत्य की शक्ति पर आग्रह और सत्य की खोज पर जोर दिया जाता था।
- अहिंसा (Non-violence): इसका अर्थ था कि अगर आपका उद्देश्य सच्चा है और संघर्ष अन्याय के खिलाफ है, तो उत्पीड़क से मुकाबले के लिए शारीरिक बल की आवश्यकता नहीं है।
- प्रतिशोध नहीं: बिना किसी प्रतिशोध की भावना या आक्रामकता के, सत्याग्रही केवल अहिंसा के सहारे संघर्ष में सफल हो सकता है।
- चेतना को झिंझोड़ना: इसका उद्देश्य शत्रु का विनाश करना नहीं, बल्कि उसकी चेतना (Conscience) को झिंझोड़ना था, ताकि वह हिंसा के दबाव के बिना सच्चाई को स्वीकार कर सके।
गांधीजी ने स्पष्ट किया कि सत्याग्रह ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ (Passive Resistance – जो दुर्बलों का हथियार माना जाता है) नहीं है।
“सत्याग्रह शारीरिक बल नहीं है… यह शुद्ध आत्मबल है। सत्य ही आत्मा का आधार होता है। इसमें प्यार की लौ जलती है… भारत में करोड़ों लोग हथियार लेकर नहीं चल सकते, लेकिन उन्होंने अहिंसा के धर्म को आत्मसात कर लिया है।”
3.1 भारत में शुरुआती सत्याग्रह (Early Experiments)
नील की खेती के विरुद्ध सत्याग्रह
गांधीजी ने राजकुमार शुक्ल के आग्रह पर यहाँ का दौरा किया। यहाँ यूरोपीय मालिक किसानों को अपनी ज़मीन के 3/20वें हिस्से (तीनकठिया पद्धति) पर नील की खेती करने के लिए बाध्य करते थे।
लगान वसूली के विरुद्ध
फसल खराब होने और प्लेग के कारण किसान लगान देने में असमर्थ थे। राजस्व संहिता के अनुसार यदि फसल सामान्य से 25% कम हो तो लगान माफ़ होना चाहिए। वल्लभ भाई पटेल ने इसमें गांधीजी का साथ दिया।
मिल मज़दूर आंदोलन
सूती कपड़ा मिल मालिकों और मज़दूरों के बीच प्लेग बोनस को लेकर विवाद था। मज़दूर 50% मांग रहे थे, जबकि मालिक 20% देना चाहते थे। गांधीजी ने 35% वृद्धि का सुझाव दिया और पहली बार भूख हड़ताल (Hunger Strike) का प्रयोग किया।
4. रॉलेट एक्ट (1919) और जलियाँवाला बाग
Rowlatt Act & Jallianwala Bagh Massacre
4.1 रॉलेट एक्ट: ‘काला कानून’
गांधीजी की शुरुआती सफलताओं से उत्साहित होकर, अंग्रेजों ने 1919 में रॉलेट एक्ट पारित किया।
- जल्दबाजी: इसे ‘इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल’ ने भारतीय सदस्यों के भारी विरोध के बावजूद बहुत जल्दबाजी में पारित किया था।
- असीमित अधिकार: सरकार को राजनीतिक गतिविधियों को कुचलने के लिए असीमित अधिकार मिल गए।
- बिना मुकदमा कैद: सबसे क्रूर प्रावधान यह था कि राजनीतिक कैदियों को दो साल तक बिना मुकदमा चलाए जेल में बंद रखा जा सकता था।
4.2 रॉलेट सत्याग्रह का घटनाक्रम
महात्मा गांधी ने ऐसे अन्यायपूर्ण कानूनों के खिलाफ अहिंसक ढंग से नागरिक अवज्ञा (Civil Disobedience) का आह्वान किया।
- 6 अप्रैल (हड़ताल): आंदोलन की शुरुआत एक राष्ट्रव्यापी हड़ताल (Hartal) से हुई। विभिन्न शहरों में रैली-जुलूस निकाले गए।
- विरोध: रेलवे वर्कशॉप्स में कामगार हड़ताल पर चले गए और दुकानें बंद हो गईं।
- 10 अप्रैल (गोलीबारी): पुलिस ने अमृतसर में एक शांतिपूर्ण जुलूस पर गोली चलाई। इसके बाद लोगों ने बैंकों, डाकखानों और रेलवे स्टेशनों पर हमले किए।
- मार्शल लॉ: स्थिति को काबू करने के लिए ‘मार्शल लॉ’ (सैनिक कानून) लागू कर दिया गया और कमान जनरल डायर ने संभाल ली।
4.3 जलियाँवाला बाग हत्याकांड (13 अप्रैल 1919)
उस दिन बैसाखी का पावन पर्व था। अमृतसर के जलियाँवाला बाग में एक बड़ी भीड़ जमा थी। इसमें से कुछ लोग सरकार के दमनकारी कानूनों (रॉलेट एक्ट) का विरोध करने आए थे, जबकि बहुत सारे लोग सालाना बैसाखी मेले में शिरकत करने आए थे।
- अनजान भीड़: बहुत सारे लोग शहर से बाहर के गाँवों से आए थे, इसलिए उन्हें यह पता नहीं था कि इलाके में मार्शल लॉ (सैनिक कानून) लागू कर दिया गया है।
- बंद रास्ता: जनरल डायर ने हथियारबंद सैनिकों के साथ बाग में प्रवेश किया और बाहर निकलने के संकरी रास्तों (Exit points) को बंद करवा दिया, जिससे लोग भाग न सकें।
- नरसंहार: उसने निहत्थी भीड़ पर बिना किसी चेतावनी के अंधाधुंध गोलियाँ चलवा दीं। यह गोलीबारी तब तक जारी रही जब तक गोलियाँ खत्म नहीं हो गईं। इस घटना में सैकड़ों निर्दोष लोग मारे गए।
4.4 प्रतिक्रिया और दमन (Reaction and Repression)
जनता का आक्रोश
जैसे ही जलियाँवाला बाग की खबर फैली, उत्तर भारत के शहरों में लोग सड़कों पर उतर आए। गुस्सा इतना तीव्र था कि:
- हड़तालें: जगह-जगह हड़तालें आयोजित की गईं।
- टकराव: लोग पुलिस से मोर्चा लेने लगे।
- हमले: सरकारी इमारतों (जो ब्रिटिश राज का प्रतीक थीं) पर हमले किए गए।
निर्मम दमन (Brutal Repression)
सरकार ने आंदोलन को कुचलने के लिए अपमानित और आतंकित करने का रास्ता अपनाया:
- नाक रगड़ना: सत्याग्रहियों को जमीन पर नाक रगड़ने के लिए मजबूर किया गया।
- रेंगना: सड़क पर घिसट कर (Crawling) चलने का हुक्म दिया गया।
- सलाम: सभी साहिबों (अंग्रेजों) को ‘सलाम’ मारने को कहा गया।
- बमबारी: गुजराँवाला (पंजाब) में गाँवों पर बम बरसाए गए और लोगों को कोड़े मारे गए।
जब महात्मा गांधी ने देखा कि आंदोलन हिंसक होता जा रहा है (लोग पत्थरबाजी और आगजनी कर रहे थे), तो उन्होंने रॉलेट सत्याग्रह वापस ले लिया।
खिलाफत आंदोलन: आंदोलन के विस्तार की आवश्यकता
रॉलेट सत्याग्रह मुख्य रूप से शहरों तक सीमित था। गांधीजी को लगा कि हिंदू-मुस्लिम एकता के बिना कोई भी व्यापक आंदोलन नहीं चलाया जा सकता।
- मुद्दा: ऑटोमन तुर्की की हार और खलीफ़ा (इस्लामिक गुरु) की शक्तियों की रक्षा।
- समिति: मार्च 1919 में बंबई में खिलाफत समिति का गठन (मोहम्मद अली और शौकत अली)।
- गठबंधन: सितंबर 1920 (कलकत्ता अधिवेशन) में गांधीजी ने खिलाफत और स्वराज के लिए असहयोग आंदोलन शुरू करने का प्रस्ताव रखा।
5. असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement)
Started: January 1921
असहयोग ही क्यों?
अपनी पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ (1909) में महात्मा गांधी ने कहा था:
“भारत में ब्रिटिश शासन भारतीयों के सहयोग से ही स्थापित हुआ है… यदि भारतीय अपना सहयोग वापस ले लें, तो साल भर के भीतर ब्रिटिश शासन ढह जाएगा और स्वराज की स्थापना हो जाएगी।”
- पदवियाँ त्यागना: सरकार द्वारा दी गई पदवियों को लौटाना।
- बहिष्कार (Boycott): सरकारी नौकरियों, सेना, पुलिस, अदालतों, विधायी परिषदों, स्कूलों और विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार।
- सविनय अवज्ञा: यदि सरकार दमन का रास्ता अपनाती है, तो व्यापक सविनय अवज्ञा अभियान शुरू करना।
- विरोध (Nov 1920): कांग्रेस के कुछ नेता परिषद चुनावों का बहिष्कार करने में हिचकिचा रहे थे। उन्हें हिंसा का भय था।
- खींचतान: सितंबर से दिसंबर तक कांग्रेस में भारी बहस चली।
- समझौता (Dec 1920): अंततः नागपुर अधिवेशन में समझौता हुआ और असहयोग कार्यक्रम को स्वीकृति मिली।
6. आंदोलन की विभिन्न धाराएँ
Different Strands: Cities, Villages, Tribes & Plantations
शहरों में आंदोलन
मध्य वर्ग की भागीदारी- बहिष्कार: हज़ारों विद्यार्थियों ने स्कूल-कॉलेज छोड़े, शिक्षकों ने इस्तीफ़े दिए और वकीलों ने मुक़दमे लड़ना बंद कर दिया।
- चुनाव: मद्रास (जहाँ जस्टिस पार्टी ने भाग लिया) को छोड़कर ज़्यादातर प्रांतों में परिषद चुनावों का बहिष्कार किया गया।
- आर्थिक असर: विदेशी कपड़ों की होली जलाई गई। 1921-1922 के बीच विदेशी कपड़ों का आयात आधा रह गया (₹102 करोड़ से ₹57 करोड़)।
- धीमापन: आंदोलन धीमा पड़ गया क्योंकि खादी महंगी थी और वैकल्पिक भारतीय संस्थानों की कमी थी, जिससे लोग वापस लौटने लगे।
ग्रामीण विद्रोह: अवध
किसानों का संघर्ष- नेता: बाबा रामचंद्र (संन्यासी, पूर्व गिरमिटिया मज़दूर)।
- विरोध: तालुकदारों और ज़मींदारों के खिलाफ।
- समस्याएँ: भारी लगान, बेगार (बिना वेतन काम), और पट्टों की अनिश्चितता।
- माँगें: लगान कम करना, बेगार खत्म करना, सामाजिक बहिष्कार।
- नाई-धोबी बंद: पंचायतों ने ज़मींदारों की सेवाएँ बंद करने का फैसला लिया।
- अवध किसान सभा: अक्टूबर 1920 में जवाहरलाल नेहरू और बाबा रामचंद्र द्वारा गठित।
- हिंसा (1921): आंदोलन फैलने पर तालुकदारों के घर लूटे गए और अनाज गोदामों पर कब्ज़ा कर लिया गया।
आदिवासी विद्रोह: गूडेम पहाड़ियाँ
गुरिल्ला युद्धखुद को ईश्वर का अवतार बताते थे। दावा था कि वे खगोलीय अनुमान लगा सकते हैं और गोलियाँ भी उन्हें नहीं मार सकतीं।
- कारण: औपनिवेशिक सरकार ने जंगलों में लोगों के दाखिल होने, मवेशी चराने और लकड़ी बीनने पर पाबंदी लगा दी थी।
- विरोधाभास: राजू महात्मा गांधी के प्रशंसक थे (खादी पहनना, शराब छोड़ना), लेकिन उनका मानना था कि भारत अहिंसा से नहीं, बल प्रयोग से आज़ाद होगा।
- अंत: विद्रोहियों ने पुलिस थानों पर हमले किए। 1924 में राजू को पकड़कर फाँसी दे दी गई।
बागानों में स्वराज: असम
मज़दूरों का पलायनकानून: ‘इनलैंड इमिग्रेशन एक्ट’ (1859) के तहत बागान मज़दूरों को बिना इज़ाज़त बागान से बाहर जाने की छूट नहीं थी।
उनके लिए आज़ादी का मतलब था उस चारदीवारी से निकलना जिसमें वे बंद थे और अपने गाँव से संपर्क बनाए रखना।
असहयोग आंदोलन सुन हज़ारों मज़दूरों ने बागान छोड़ दिए। लेकिन रेलवे और स्टीमरों की हड़ताल के कारण वे रास्ते में ही फँस गए। पुलिस ने उन्हें पकड़ा और बुरी तरह पीटा।
1928 में, वल्लभ भाई पटेल ने गुजरात के बारदोली तालुका में भू-राजस्व (Land Revenue) में वृद्धि के खिलाफ किसान आंदोलन का सफल नेतृत्व किया।
यह आंदोलन अपनी संगठन क्षमता और सफलता के लिए जाना जाता है। इसी संघर्ष की सफलता के बाद वहां की महिलाओं ने वल्लभ भाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि दी।
गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) स्थित चौरी-चौरा में बाज़ार से गुज़र रहा एक शांतिपूर्ण जुलूस पुलिस के साथ हिंसक टकराव में बदल गया। आक्रोशित भीड़ ने पुलिस थाने में आग लगा दी, जिसमें 22 पुलिसकर्मी जिंदा जलकर मर गए।
परिणाम: इस हिंसा से दुखी होकर महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन तत्काल वापस ले लिया। उनका मानना था कि सत्याग्रहियों को जन-संघर्ष के लिए अभी और प्रशिक्षण की आवश्यकता है।
7. सविनय अवज्ञा की ओर (Towards Civil Disobedience)
From Withdrawal of NCM to Purna Swaraj (1922-1930)
1. असहयोग की वापसी और आंतरिक बहस
फरवरी 1922 में महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया। इसके बाद कांग्रेस के भीतर दो विचार उभरे:
कुछ नेता जन-संघर्षों से थक चुके थे और प्रांतीय परिषदों के चुनावों में हिस्सा लेना चाहते थे। उनका तर्क था कि परिषदों में रहकर ब्रिटिश नीतियों का विरोध करना अधिक प्रभावी होगा।
युवा नेता ज्यादा उग्र जन-आंदोलन और पूर्ण स्वतंत्रता (Full Independence) के लिए दबाव बनाए हुए थे। वे औपनिवेशिक शासन से कोई समझौता नहीं चाहते थे।
2. 1920 के दशक के अंत में राजनीति को बदलने वाले कारक
1926 से कृषि उत्पादों की कीमतें गिरने लगीं और 1930 के बाद पूरी तरह धराशायी हो गईं। निर्यात कम होने से किसानों के लिए उपज बेचना और लगान चुकाना भारी पड़ गया। 1930 तक ग्रामीण इलाके भारी उथल-पुथल से गुजर रहे थे।
साइमन कमीशन (1928)
वैधानिक आयोग- गठन: ब्रिटेन की टोरी सरकार द्वारा सर जॉन साइमन के नेतृत्व में।
- उद्देश्य: भारत में संवैधानिक व्यवस्था की कार्यशैली का अध्ययन करना और सुझाव देना।
- समस्या: आयोग में एक भी भारतीय सदस्य नहीं था, सारे अंग्रेज़ थे। यह भारतीयों का अपमान माना गया।
1928 में भारत पहुँचने पर “साइमन वापस जाओ” (Simon Go Back) के नारों से स्वागत हुआ। कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।
लाहौर में विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में उनकी मृत्यु हो गई।
3. पूर्ण स्वराज की माँग
लाहौर अधिवेशन (दिसंबर 1929)
रावी नदी के तट पर ऐतिहासिक क्षणजवाहरलाल नेहरू। इस अधिवेशन में कांग्रेस के नेतृत्व की बागडोर युवा पीढ़ी के हाथों में आ गई।
कांग्रेस ने ‘पूर्ण स्वराज’ (Complete Independence) की माँग को औपचारिक रूप से स्वीकार किया। अब ‘डोमिनियन स्टेटस’ का लक्ष्य त्याग दिया गया।
31 दिसंबर 1929 की मध्यरात्रि को ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारों के बीच रावी नदी के तट पर भारतीय स्वतंत्रता का तिरंगा झंडा फहराया गया।
“हमारा विश्वास है कि किसी भी समाज की तरह भारतीय जनता का भी यह अहरणीय अधिकार है कि उन्हें आज़ादी मिले… यदि कोई सरकार अधिकारों से वंचित रखती है, तो जनता को उसे बदलने या समाप्त करने का अधिकार है।”
क्रांतिकारी राष्ट्रवाद
HSRA (1928)बहुत से राष्ट्रवादियों को लगता था कि अहिंसा से आजादी नहीं मिलेगी। 1928 में दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ (HSRA) की स्थापना हुई।
भगत सिंह, जतिन दास, अजय घोष, चंद्रशेखर आजाद।
- 1929: असेंबली में बम (भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त)।
- 1929: लॉर्ड इरविन की ट्रेन उड़ाने का प्रयास।
“क्रांति मानवजाति का जन्मजात अधिकार है जिसका अपहरण नहीं किया जा सकता… श्रमिक वर्ग ही समाज का वास्तविक पोषक है।” (23 वर्ष की आयु में उन्हें फाँसी दी गई)।
8. नमक यात्रा और सविनय अवज्ञा आंदोलन
Dandi March & Civil Disobedience (1930-1934)
पृष्ठभूमि: 11 सूत्रीय माँगें
31 जनवरी 1930 को महात्मा गांधी ने वायसराय इरविन को एक खत लिखा जिसमें 11 माँगों का उल्लेख था। इनमें सबसे महत्वपूर्ण माँग ‘नमक कर’ (Salt Tax) को खत्म करने की थी, क्योंकि नमक भोजन का अभिन्न हिस्सा था और इसे अमीर-गरीब सभी इस्तेमाल करते थे।
गांधीजी ने अपने 78 विश्वस्त स्वयंसेवकों (Volunteers) के साथ यात्रा शुरू की।
240 मील (लगभग 385 किमी) का सफ़र। 24 दिन तक रोज़ाना लगभग 10 मील चले। जहाँ भी रुकते, हज़ारों लोग उन्हें सुनने आते।
समुद्र का पानी उबालकर नमक बनाया और सरकारी कानून का उल्लंघन किया। यहीं से सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हुआ।
असहयोग vs सविनय अवज्ञा
- असहयोग केवल अंग्रेजों का सहयोग न करना (1921-22)।
- सविनय अवज्ञा सहयोग न करने के साथ-साथ औपनिवेशिक कानूनों का उल्लंघन करना (जैसे नमक, वन कानून)।
आंदोलन का प्रसार
- देश भर में नमक कानून तोड़ा गया।
- विदेशी कपड़ों का बहिष्कार और शराब की दुकानों की पिकेटिंग।
- किसानों ने लगान और चौकीदारी कर चुकाने से मना कर दिया।
- गाँवों में तैनात कर्मचारियों ने इस्तीफ़े दे दिए।
- जंगलों में लोगों ने वन कानूनों का उल्लंघन किया (लकड़ी बीनना, मवेशी चराना)।
सरकारी दमन और जनता की प्रतिक्रिया
जब गांधीजी के समर्पित साथी अब्दुल गफ्फार खान (‘सीमांत गांधी’) को गिरफ्तार किया गया, तो गुस्साई भीड़ बख्तरबंद गाड़ियों और पुलिस की गोलियों के सामने निहत्थी डट गई। बहुत सारे लोग मारे गए।
महात्मा गांधी की गिरफ्तारी के बाद, शोलापुर के औद्योगिक मज़दूरों ने अंग्रेजी शासन के प्रतीकों (पुलिस चौकियों, नगरपालिका भवनों, अदालतों, रेलवे स्टेशनों) पर हमले किए।
गांधी-इरविन समझौता (5 मार्च 1931)
हिंसा को देखते हुए गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया। वे लंदन में दूसरे गोलमेज सम्मेलन में हिस्सा लेने पर राजी हुए (जिसका कांग्रेस पहले बहिष्कार कर चुकी थी)। बदले में सरकार ने राजनीतिक कैदियों को रिहा करने की बात मानी।
परिणाम: दिसंबर 1931 में वार्ता विफल रही। भारत लौटने पर उन्होंने पाया कि दमन जारी है। उन्होंने आंदोलन दोबारा शुरू किया, जो 1934 तक चला।
9. लोगों ने आंदोलन को कैसे लिया?
Perception of Participants & Swaraj
विभिन्न सामाजिक समूहों ने सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया, लेकिन उनके आदर्श और ‘स्वराज’ के मायने अलग-अलग थे।
किसान (Peasants)
- समस्या: वे व्यावसायिक फसलों (Commercial Crops) की खेती करते थे। आर्थिक मंदी के कारण कीमतें गिरीं और नकद आय खत्म हो गई, लेकिन सरकार ने लगान कम करने से मना कर दिया।
- भागीदारी: उन्होंने आंदोलन का बढ़-चढ़कर समर्थन किया और अपने समुदायों को एकजुट किया। उनके लिए स्वराज का अर्थ था भारी लगान के खिलाफ लड़ाई।
- निराशा: 1931 में जब लगान घटे बिना आंदोलन वापस ले लिया गया, तो उन्हें गहरा धक्का लगा। इसलिए 1932 में उन्होंने दोबारा हिस्सा लेने से इनकार कर दिया।
- समस्या: वे जमींदारों से पट्टे पर जमीन लेकर खेती करते थे। मंदी के कारण वे भाड़ा (Rent) चुकाने में असमर्थ थे।
- माँग: वे चाहते थे कि जमींदारों को चुकाया जाने वाला भाड़ा माफ़ कर दिया जाए।
- रेडिकल आंदोलन: उन्होंने समाजवादियों और कम्युनिस्टों के नेतृत्व वाले आंदोलनों में हिस्सा लिया।
- कांग्रेस का द्वंद्व: अमीर किसानों और जमींदारों के नाराज होने के डर से कांग्रेस ने ‘भाड़ा विरोधी’ अभियानों को खुलकर समर्थन नहीं दिया।
व्यावसायिक वर्ग (Business Class)
प्रथम विश्व युद्ध में मुनाफा कमाने के बाद, वे अपने कारोबार के विस्तार में औपनिवेशिक पाबंदियों को बाधा मानते थे।
- विदेशी वस्तुओं के आयात से सुरक्षा।
- रुपया-स्टर्लिंग विनिमय अनुपात में बदलाव।
- संगठन: 1920 में ‘इंडियन इंडस्ट्रियल एंड कमर्शियल कांग्रेस’ और 1927 में FICCI का गठन।
- नेता: पुरुषोत्तमदास ठाकुरदास, जी.डी. बिड़ला।
- आंदोलन को आर्थिक सहायता दी।
- उनके लिए स्वराज का अर्थ था – औपनिवेशिक पाबंदियों से मुक्त व्यापार।
- भय: गोलमेज सम्मेलन की विफलता के बाद वे उग्र गतिविधियों और कांग्रेस के युवा सदस्यों में समाजवाद के बढ़ते प्रभाव से डरे हुए थे।
औद्योगिक श्रमिक (Industrial Workers)
भागीदारी: कमनागपुर को छोड़कर कहीं भी मजदूरों ने बड़ी संख्या में हिस्सा नहीं लिया। जैसे-जैसे उद्योगपति कांग्रेस के करीब आ रहे थे, मजदूर छिटक रहे थे।
• 1930: रेलवे कामगारों की हड़ताल।
• 1932: गोदी (Dock) कामगारों की हड़ताल।
• छोटा नागपुर की टिन खानों के मजदूरों ने गांधी टोपी पहनकर रैलियां कीं।
कांग्रेस का रुख: उद्योगपतियों से दूर होने के डर से कांग्रेस ने मजदूरों की माँगों को अपने कार्यक्रम में शामिल करने से हिचकिचाहट दिखाई।
महिलाओं की भागीदारी (Women’s Participation)
सविनय अवज्ञा की विशेषतागांधीजी के नमक सत्याग्रह के दौरान हजारों औरतें उनकी बात सुनने के लिए घर से बाहर आ जाती थीं। यह भारतीय महिलाओं के सार्वजनिक जीवन में प्रवेश का एक महत्वपूर्ण मोड़ था।
- जुलूस: विरोध प्रदर्शनों और जुलूसों में सक्रिय भागीदारी।
- नमक निर्माण: नमक कानून तोड़ा और नमक बनाया।
- पिकेटिंग: विदेशी कपड़ों और शराब की दुकानों के सामने धरना दिया।
- जेल यात्रा: बहुत सारी महिलाएँ जेल भी गईं।
“गांधीजी के आह्वान के बाद, उन्होंने राष्ट्र की सेवा को अपना पवित्र दायित्व (Sacred Duty) माना।”
भागीदारी की सीमाएँ (Limitations)
सार्वजनिक भूमिका में इस इजाफ़े का मतलब यह नहीं था कि औरतों की स्थिति में भारी बदलाव आया था। कांग्रेस को लंबे समय तक उन्हें संगठन में महत्वपूर्ण पद देने में हिचकिचाहट रही। कांग्रेस उनकी प्रतीकात्मक उपस्थिति (Symbolic Presence) में ही दिलचस्पी रखती थी।
“गांधीजी का मानना था कि सार्वजनिक जीवन में आने के बावजूद, महिलाओं का मुख्य दायित्व घर-परिवार की देखभाल करना और अच्छी माँ व पत्नी बनना है।”
10. सविनय अवज्ञा की सीमाएँ (Limits of Civil Disobedience)
Dalits & Muslim Participation
दलितों की भागीदारी
अछूत / उत्पीड़ित वर्गकांग्रेस ने लंबे समय तक दलितों पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि वह रूढ़िवादी सवर्ण हिंदू सनातनपंथियों से डरी हुई थी। लेकिन 1930 के बाद दलितों ने खुद को संगठित करना शुरू किया।
- ‘अछूतों’ को हरिजन (ईश्वर की संतान) कहा।
- सत्याग्रह किया: मंदिरों, तालाबों और कुओं पर प्रवेश दिलाने के लिए।
- स्वयं शौचालय साफ कर श्रम की प्रतिष्ठा स्थापित की।
- चेतावनी: “अस्पृश्यता को खत्म किए बिना 100 साल तक भी स्वराज नहीं मिल सकता।”
- वे अपनी समस्याओं का राजनीतिक हल चाहते थे।
- शिक्षा संस्थानों में आरक्षण।
- विधायी परिषदों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र (Separate Electorates)।
- भागीदारी: महाराष्ट्र और नागपुर (जहाँ संगठन मजबूत था) को छोड़कर भागीदारी सीमित रही।
पूना पैक्ट (Poona Pact) – सितंबर 1932
- विवाद: दूसरे गोलमेज सम्मेलन में डॉ. अंबेडकर ने दलितों के लिए पृथक निर्वाचन की माँग की। ब्रिटिश सरकार मान गई, लेकिन गांधीजी आमरण अनशन पर बैठ गए (क्योंकि इससे समाज में एकीकरण रुक जाता)।
- समझौता: अंततः अंबेडकर ने गांधीजी की राय मानी।
- परिणाम: दलितों (दमित वर्गों) को प्रांतीय और केंद्रीय विधायी परिषदों में आरक्षित सीटें मिलीं, लेकिन मतदान सामान्य निर्वाचन क्षेत्रों में ही होना तय हुआ।
मुस्लिम संगठनों की उदासीनता
अविश्वास का माहौलअसहयोग-खिलाफत आंदोलन के शांत पड़ने के बाद मुसलमानों का एक बड़ा तबका कांग्रेस से कटा हुआ महसूस करने लगा।
1920 के दशक के मध्य से कांग्रेस ‘हिंदू महासभा’ जैसे हिंदू धार्मिक राष्ट्रवादी संगठनों के करीब दिखने लगी थी, जिससे मुस्लिम दूर हो गए।
कई शहरों में हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक टकराव और दंगे हुए। हर दंगे के साथ दोनों समुदायों के बीच फासला बढ़ता गया।
समझौते की विफलता (1928)
वे पृथक निर्वाचिका की माँग छोड़ने को तैयार थे यदि मुसलमानों को केंद्रीय सभा में आरक्षित सीटें मिलें और मुस्लिम बहुल प्रांतों (बंगाल, पंजाब) में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व मिले।
1928 के सर्वदलीय सम्मेलन में उन्होंने इस समझौते का खुलेआम विरोध किया, जिससे समाधान की सारी संभावनाएँ समाप्त हो गईं।
11. सामूहिक अपनेपन का भाव
Sense of Collective Belonging through Culture
राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था। यह लोगों के मस्तिष्क में एक यथार्थ का रूप तब लेता है जब वे महसूस करते हैं कि वे एक ही राष्ट्र के अंग हैं। इतिहास, साहित्य, लोक कथाएँ, गीत, चित्र और प्रतीक सभी ने इस भाव को जगाने में योगदान दिया।
राष्ट्र की पहचान को एक नारी छवि (Allegory) का रूप दिया गया।
- बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय: भारत माता के विचार का उल्लेख सबसे पहले 1875 में रचित उनके गीत ‘वंदे मातरम्’ में मिलता है। इसे 1882 में उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया और यह बंगाल के स्वदेशी आंदोलन का मुख्य गीत बना।
- अवनींद्रनाथ टैगोर (1905): उन्होंने भारत माता को एक संन्यासिनी के रूप में चित्रित किया—शांत, गंभीर, दैवी और आध्यात्मिक। वह अन्न, वस्त्र और ज्ञान दान कर रही हैं।
- विकास: बाद के वर्षों में भारत माता की छवि ने विविध रूप लिए। अब उन्हें एक शांत संन्यासिनी के बजाय, हाथी और शेर (शक्ति व सत्ता के प्रतीक) के बीच खड़े होकर त्रिशूल थामे हुए, एक अधिक शक्तिशाली और रक्षक देवी के रूप में चित्रित किया जाने लगा।
जैसे-जैसे राष्ट्रीय आंदोलन आगे बढ़ा, नेताओं ने लोगों को एकजुट करने के लिए प्रतीकों का प्रयोग किया। झंडा थामना शासन के प्रति अवज्ञा का संकेत बन गया।
- रंग: यह एक तिरंगा झंडा था जिसमें हरा, पीला और लाल रंग थे।
- कमल: इसमें 8 कमल के फूल बने थे, जो उस समय के ब्रिटिश भारत के 8 प्रांतों का प्रतिनिधित्व करते थे।
- अर्धचंद्र: इसमें एक अर्धचंद्र (Crescent Moon) भी दर्शाया गया था, जो हिंदुओं और मुसलमानों की एकता का प्रतीक था।
- डिजाइन: 1921 तक गांधीजी ने स्वराज का झंडा तैयार कर लिया था।
- रंग: यह भी तिरंगा था (सफ़ेद, हरा और लाल)।
- चरखा: इसके मध्य में गांधीवादी प्रतीक ‘चरखा’ को जगह दी गई थी, जो स्वावलंबन (Self-help) का प्रतीक था।
3 लोक कथाओं का पुनर्जीवन (Revival of Folklore)
राष्ट्रवादियों का मानना था कि विदेशी ताकतों के प्रभाव से हमारी परंपरागत संस्कृति दूषित हो गई है। अपनी राष्ट्रीय पहचान (National Identity) को ढूँढ़ने और अतीत में गौरव का भाव पैदा करने के लिए लोक परंपरा को बचाकर रखना अनिवार्य था।
वे स्वयं लोक-गाथा गीत, बाल गीत और मिथकों को इकट्ठा करने के लिए गाँव-गाँव घूमे। उन्होंने लोक उत्सवों और संस्कृति को राष्ट्रवाद का आधार बनाया।
उन्होंने तमिल लोक कथाओं का विशाल संकलन 4 खंडों में प्रकाशित किया। उनका मानना था कि:
4 इतिहास की पुनर्व्याख्या (Reinterpretation of History)
वे भारतीयों को पिछड़ा और आदिम (Primitive) मानते थे, जो अपना शासन खुद संभालने के काबिल नहीं हैं।
उन्होंने अतीत की महान उपलब्धियों की खोज की। उन्होंने लिखा कि प्राचीन काल में कला, वास्तुशिल्प, विज्ञान, गणित, धर्म, कानून और दर्शन अपनी चरम सीमा पर थे।
“इस महान युग के बाद पतन का समय आया और भारत गुलाम बन गया।”
उद्देश्य: पाठकों को अपने अतीत पर गर्व करने और ब्रिटिश शासन से मुक्ति के लिए संघर्ष करने के लिए प्रेरित करना।
समस्या/सीमा
लोगों को एकजुट करने की इन कोशिशों की अपनी समस्याएँ थीं। जिस अतीत का गौरवगान किया जा रहा था, वह अक्सर हिंदू अतीत होता था और जिन छवियों का सहारा लिया गया वे हिंदू प्रतीक थे।
“परिणामस्वरूप, अन्य समुदायों (विशेषकर मुसलमानों) के लोग खुद को अलग-थलग महसूस करने लगे।”
“पुराने जमाने में भारत आने वाले विदेशी यात्री आर्य वंश के लोगों के साहस, सच्चाई और विनम्रता पर चकित रह जाते थे; अब वे बस इन गुणों के अभाव की बात करते हैं… अब एक क्षुद्र से द्वीप के चन्द सिपाही भारत भूमि पर कब्जा किए हुए हैं।”
12. भारत छोड़ो आंदोलन (Quit India Movement)
August 1942: The Final Mass Struggle
पृष्ठभूमि (Background)
क्रिप्स मिशन (Cripps Mission) की विफलता और द्वितीय विश्व युद्ध के प्रभावों से भारतीय जनता में व्यापक असंतोष था। इसके फलस्वरूप गांधीजी ने अंग्रेजों के पूरी तरह से भारत छोड़ने पर जोर देते हुए अंतिम बड़ा आंदोलन छेड़ा।
ऐतिहासिक घटनाक्रम
वर्धा में कांग्रेस कार्य समिति ने ऐतिहासिक ‘भारत छोड़ो’ प्रस्ताव पारित किया। इसमें सत्ता का भारतीयों को तत्काल हस्तांतरण और भारत छोड़ने की माँग की गई।
ग्वालिया टैंक मैदान (बम्बई) में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया और एक अहिंसक जन संघर्ष का आह्वान किया।
“मैं आपको एक मंत्र देता हूँ… इसे आप अपने दिलों में अंकित कर लें… वह मंत्र है: ‘करो या मरो’। हम या तो भारत को आज़ाद करेंगे या इस कोशिश में अपनी जान दे देंगे।”
– महात्मा गांधी
जन-आंदोलन का स्वरूप
शीर्ष नेताओं (गांधीजी, नेहरू आदि) की सुबह-सुबह गिरफ्तारी के बाद आंदोलन नेतृत्वहीन हो गया, लेकिन जनता ने इसे खुद संभाला:
- स्वतः स्फूर्त विद्रोह: लोग स्वतः ही आंदोलन में कूद पड़े। यह एक जन-सैलाब बन गया।
- प्रतीकों पर हमला: लोगों ने सरकारी इमारतों, पुलिस थानों, डाकखानों और रेलवे स्टेशनों (ब्रिटिश सत्ता के प्रतीक) पर हमले किए।
- व्यवस्था ठप: देश के कई हिस्सों में संचार और परिवहन व्यवस्था पूरी तरह भंग हो गई और सरकारी मशीनरी ठप पड़ गई।
- भागीदारी: छात्र, मज़दूर और किसान हज़ारों की तादाद में शामिल हुए।
भूमिगत आंदोलन (Underground Movement)
पुलिस दमन से बचने के लिए कई नेताओं ने भूमिगत होकर (छिपकर) आंदोलन का संचालन जारी रखा:
- जयप्रकाश नारायण (JP)
- अरुणा आसफ़ अली (बम्बई में तिरंगा फहराया)
- राम मनोहर लोहिया
इन्होंने रेडियो (जैसे उषा मेहता का गुप्त रेडियो) और पर्चों के माध्यम से लोगों का मनोबल बनाए रखा।
वीरांगनाएँ (Women Martyrs)
इस आंदोलन में महिलाओं की सक्रिय और साहसी भागीदारी देखी गई:
- मातंगिनी हाजरा (बंगाल) – गोली लगने के बाद भी तिरंगा नहीं छोड़ा।
- कनकलता बरुआ (असम)
- रमा देवी (ओडिशा)
दमन और परिणाम
अंग्रेजों ने आंदोलन को कुचलने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग किया। लाठीचार्ज, आंसू गैस और हवाई जहाज से बमबारी तक की गई।
13. स्वतंत्रता की ओर (Towards Independence: 1942-1947)
The Final Phase
नोट: यद्यपि NCERT की पाठ्यपुस्तक 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक सीमित है, लेकिन छात्रों को यह जानना आवश्यक है कि इसके बाद स्वतंत्रता कैसे प्राप्त हुई।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने देश के बाहर से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। उन्होंने ‘दिल्ली चलो’ और ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा’ का नारा दिया।
हालांकि INA को सैन्य हार का सामना करना पड़ा, लेकिन लाल किले में उनके अधिकारियों पर चले मुकदमे ने पूरे देश में राष्ट्रवाद की एक नई लहर पैदा कर दी।
- सदस्य: पैथिक लॉरेंस, स्टैफोर्ड क्रिप्स, और ए.वी. अलेक्जेंडर।
- उद्देश्य: सत्ता हस्तांतरण के तरीकों पर चर्चा करना और संविधान निर्माण की रूपरेखा तैयार करना।
- प्रस्ताव: इसने पृथक पाकिस्तान की माँग को अस्वीकार करते हुए एक ‘ढीले-ढाले संघ’ (Loose Federation) का सुझाव दिया, जिसमें रक्षा और विदेश मामले केंद्र के पास हों।
- विफलता: प्रांतों के समूहीकरण (Grouping) पर कांग्रेस और मुस्लिम लीग में सहमति नहीं बनी। इसके बाद जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को ‘प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस’ (Direct Action Day) का आह्वान किया, जिससे दंगे भड़क उठे।
- माउंटबेटन योजना (3 जून 1947): नए वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन की योजना पेश की, जिसे कांग्रेस और मुस्लिम लीग दोनों ने भारी मन से स्वीकार कर लिया।
- भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947: ब्रिटिश संसद ने भारत और पाकिस्तान नामक दो स्वतंत्र डोमिनियन बनाने का कानून पारित किया।
- 14-15 अगस्त की मध्यरात्रि: भारत स्वतंत्र हुआ। जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में अपना ऐतिहासिक भाषण ‘ट्रिस्ट विद डेस्टिनी’ (नियति से साक्षात्कार) दिया।
- त्रासदी: स्वतंत्रता के साथ पंजाब और बंगाल में भीषण सांप्रदायिक हिंसा और मानव इतिहास का सबसे बड़ा विस्थापन हुआ।
14. महत्वपूर्ण शब्दावली (Key Terms)
Definitions for Board Exams
इस प्रक्रिया में अंग्रेज भारत के लोगों को (विशेषकर ग्रामीणों को) उनकी इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती सेना में भर्ती कर लेते थे।
किसी के साथ संपर्क रखने और जुड़ने से इनकार करना या गतिविधियों में हिस्सेदारी, चीजों की खरीद व इस्तेमाल से इनकार करना। यह विरोध का एक रूप है।
प्रदर्शन या विरोध का एक ऐसा स्वरूप जिसमें लोग किसी दुकान, फैक्ट्री या दफ्तर के भीतर जाने का रास्ता रोक लेते हैं।
बिना किसी पारिश्रमिक (वेतन) के काम करवाना। अवध के किसानों को ज़मींदारों के लिए बेगार करनी पड़ती थी।
औपनिवेशिक शासन के दौरान लोगों को काम करने के लिए फिजी, गयाना, वेस्टइंडीज आदि ले जाया जाता था। उन्हें एक ‘एग्रीमेंट’ (जिसे मजदूर ‘गिरमिट’ कहते थे) के तहत ले जाया जाता था।
महात्मा गांधी द्वारा ‘अछूतों’ को दिया गया नाम, जिसका अर्थ है- “ईश्वर की संतान”।
15. निष्कर्ष (Conclusion)
अंग्रेज सरकार के खिलाफ बढ़ता गुस्सा विभिन्न भारतीय समूहों और वर्गों को स्वतंत्रता के साझा संघर्ष में खींच रहा था। महात्मा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने लोगों के असंतोष और परेशानियों को स्वतंत्रता के संगठित आंदोलन में समाहित करने का प्रयास किया।
चूंकि विभिन्न समूह अलग-अलग आकांक्षाओं के साथ आंदोलन में हिस्सा ले रहे थे, इसलिए कांग्रेस को हमेशा यह सुनिश्चित करना पड़ा कि एक समूह की माँगों के कारण कोई दूसरा समूह दूर न चला जाए। यही वजह है कि आंदोलन के भीतर अक्सर बिखराव (Disunity) आ जाता था।
“संक्षेप में, जो राष्ट्र उभर रहा था वह औपनिवेशिक शासन से मुक्ति की चाह रखने वाली बहुत सारी आवाज़ों का पुंज था।”