औद्योगीकरण का युग – विस्तृत अध्ययन मॉड्यूल | Class 10 History
कक्षा 10 – इतिहास (NCERT)

औद्योगीकरण का युग The Age of Industrialisation

यह अध्याय हाथ के श्रम और वाष्प शक्ति (Steam Power), कुटीर उद्योगों और कारखानों, तथा औपनिवेशिक भारत में बुनकरों के संघर्ष की कहानी बयां करता है।

1 औद्योगिक प्रगति के दो चित्र

शताब्दी का उदय (Dawn of the Century) – 1900

ई.टी. पॉल (E.T. Paull) द्वारा प्रकाशित संगीत किताब के कवर पेज पर।

Dawn of the Century

यह चित्र तकनीकी बदलावों का गुणगान करता है। ‘प्रगति की देवी’ (Angel of Progress) नई सदी का झंडा लेकर पंख वाले पहिए पर खड़ी है, जो समय का प्रतीक है। वह भविष्य की ओर उड़ रही है।

दो जादूगर (Two Magicians) – 1901

‘इनलैंड प्रिंटर्स’ पत्रिका में प्रकाशित तुलनात्मक चित्र।

Two Magicians
ऊपर: अलादीन (पूरब/अतीत) जादुई चिराग से महल बनाता है।
नीचे: मैकेनिक (पश्चिम/आधुनिकता) यह आधुनिक जादूगर है जो अपने औजारों से पुल, जहाज और टावर बना रहा है।

2. आद्य-औद्योगीकरण

Proto-industrialisation

अक्सर हम ‘औद्योगीकरण’ का मतलब सिर्फ फैक्ट्रियों से समझते हैं। लेकिन फैक्ट्री युग से पहले भी इंग्लैंड और यूरोप में अंतर्राष्ट्रीय बाजार के लिए बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन हो रहा था। यह उत्पादन फैक्ट्रियों में नहीं, बल्कि गांवों के घरों में होता था। इतिहासकार इस चरण को आद्य-औद्योगीकरण (Proto-industrialisation) कहते हैं।

शहरों में मुश्किल क्यों?

व्यापारी शहरों में अपना उत्पादन नहीं बढ़ा सकते थे क्योंकि वहां व्यापारी गिल्ड्स (Trade Guilds) बहुत ताकतवर थे।

  • एकाधिकार (Monopoly): शासकों ने गिल्ड्स को खास चीजों के उत्पादन और व्यापार का एकाधिकार दिया हुआ था।
  • प्रतिबंध: वे नए लोगों को बाजार में घुसने नहीं देते थे और दामों पर नियंत्रण रखते थे।

गांवों की ओर रुख

शहरों में जगह न मिलने पर व्यापारी देहात (Countryside) की तरफ मुड़े। वहां गरीब किसान काम करने को राजी थे।

किसान क्यों माने? (आर्थिक कारण)

  • बाड़ाबंदी (Enclosure): ‘साझा जमीन’ खत्म हो रही थी, जिससे गरीब किसानों का गुजारा मुश्किल हो गया था।
  • अतिरिक्त आय: व्यापारियों की ‘पेशगी’ (Advance) से उन्हें घर बैठे कमाई का जरिया मिल गया।
  • खेती + उद्योग: अब वे अपने छोटे खेतों पर खेती भी कर सकते थे और साथ में उत्पादन भी।

उत्पादन की कड़ी (The Supply Chain)

🐑

स्टेपलर

रेशों के हिसाब से ऊन को छांटता है (Sorts wool).

🧵

स्पिनर्स

ऊन से धागा (Yarn) कातते हैं।

🧶

बुनकर

धागे से कपड़ा (Fabric) बुनते हैं।

🛁

फुलर & रंगरेज

कपड़े को समेटते (Fulling) और रंगते हैं।

Imp
🇬🇧

लंदन

फिनिशिंग सेंटर

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में भेजने से पहले अंतिम फिनिशिंग।

एक सौदागर, सैकड़ों हाथ

यह व्यवस्था व्यापारियों और किसानों के बीच एक करीबी रिश्ता थी। एक व्यापारी (Merchant Clothier) उत्पादन के हर चरण पर 20 से 25 मजदूरों को काम देता था। इसका मतलब था कि एक कपड़ा व्यापारी सैकड़ों मजदूरों को नियंत्रित करता था।

महत्वपूर्ण शब्दावली (Glossary)

स्टेपलर (Stapler):

ऐसा व्यक्ति जो रेशों के हिसाब से ऊन को ‘स्टेपल’ करता है या छांटता है।

फुलर (Fuller):

ऐसा व्यक्ति जो ‘फुलिंग’ (Fulling) के जरिए कपड़े को समेटता है (चुन्नटें देता है)।

कार्डिंग (Carding):

वह प्रक्रिया जिसमें कपास या ऊन के रेशों को कताई के लिए तैयार किया जाता है (कंघी करना)।

सिपाही (Sepoy):

एक भारतीय सैनिक जो ब्रिटिश सेना में नौकरी करता था।

गिल्ड्स (Guilds):

उत्पादकों के संगठन जो कारीगरों को ट्रेनिंग देते थे, उत्पादन पर नियंत्रण रखते थे और दाम तय करते थे।

ओरिएंट (Orient):

भूमध्य सागर के पूर्व में स्थित देश (एशिया)। पश्चिम की नज़र में ये इलाके रहस्यमयी और परंपरावादी थे।

कारखानों का उदय (Coming Up of the Factory)

रिचर्ड आर्कराइट (Richard Arkwright)

रिचर्ड आर्कराइट ने कपास मिल (Cotton Mill) की रूपरेखा तैयार की। इससे पहले उत्पादन पूरे देहात में फैला था, लेकिन मिल ने इसे एक छत के नीचे ला दिया।

मिल के फायदे:

  • उत्पादन प्रक्रिया की निगरानी (Supervision) आसान हो गई।
  • गुणवत्ता (Quality) पर ध्यान दिया जा सकता था।
  • मजदूरों पर नियंत्रण रखना संभव हुआ।

पहला प्रतीक: कपास (Cotton)

3. ब्रिटेन में परिवर्तन की गति

चरण 1: कपास और धातु

1840 के दशक तक कपास (Cotton) सबसे बड़ा उद्योग था। उसके बाद रेलवे फैलने से (इंग्लैंड में 1840s, उपनिवेशों में 1860s) लोहा और इस्पात की मांग तेजी से बढ़ी। 1873 तक ब्रिटेन का लोहा-इस्पात निर्यात 7.7 करोड़ पौंड हो गया था, जो कपास निर्यात से दोगुना था।

चरण 2: पारंपरिक उद्योग

नए उद्योग पुराने उद्योगों को पूरी तरह खत्म नहीं कर पाए। 19वीं सदी के अंत तक भी 20% से कम मजदूर ही फैक्ट्रियों में थे। कपड़ा उद्योग का बड़ा हिस्सा कारखानों में नहीं, बल्कि घरेलू इकाइयों में बनता था।

क्या पारंपरिक उद्योग रुके हुए थे?

नहीं। वे भाप से नहीं चलते थे, लेकिन उनमें भी छोटे-छोटे सुधार हो रहे थे। जैसे: कांच का काम, मिट्टी के बर्तन, सड़क निर्माण, फर्नीचर, औजार निर्माण

केस स्टडी: भाप इंजन (Steam Engine)

जेम्स वॉट ने सुधार किया, मैथ्यू बोल्टन ने बनाया। फिर भी इसे अपनाने में सालों लग गए। उद्योगपतियों को लगता था कि मशीनें खराब हो जाएंगी और मरम्मत महंगी होगी।

19वीं सदी की शुरुआत में पूरे इंग्लैंड में कुल इंजन: 321
(80 कपास में, 9 ऊन में, बाकी खनन/नहर कार्यों में)

4. हाथ का श्रम और वाष्प शक्ति

विक्टोरियन ब्रिटेन में मानव श्रम की कोई कमी नहीं थी। गरीब किसान और बेरोजगार लोग काम की तलाश में बड़ी संख्या में शहरों की ओर आ रहे थे। जब मजदूर ज्यादा होते हैं, तो वेतन (Wages) गिर जाता है।

इसलिए, उद्योगपतियों को श्रम की कमी या उच्च वेतन की कोई समस्या नहीं थी। वे ऐसी मशीनें लगाने के इच्छुक नहीं थे जिनके लिए भारी पूंजी निवेश (Capital Investment) की जरूरत हो और जो मजदूरों को हटा दें।

मौसमी उद्योग (Seasonal Industries)

कई उद्योगों में मजदूरों की मांग मौसम के आधार पर घटती-बढ़ती थी। मशीनें साल भर बेकार नहीं छोड़ी जा सकती थीं, इसलिए उद्योगपति ‘हैंड लेबर’ पसंद करते थे:

  • गैस घर और शराबखाने (Breweries): जाड़े के दिनों में यहाँ काम बहुत ज्यादा होता था।
  • जहाजों की मरम्मत: बंदरगाहों पर जाड़ों में जहाजों की साफ-सफाई और सजावट का काम होता था।
  • बुक बाइंडर्स और प्रिंटर: क्रिसमस की मांग पूरी करने के लिए दिसंबर से पहले एक्स्ट्रा मजदूरों की जरूरत पड़ती थी।

कुलीन वर्ग की पसंद

ब्रिटेन के रईस (Aristocrats) और पूंजीपति वर्ग (Bourgeoisie) हाथ से बनी चीजों को ही तरजीह देते थे क्योंकि:

  • वे ‘रिफाइनमेंट’ (Refinement) और ‘क्लास’ का प्रतीक थीं।
  • उनकी फिनिशिंग (Finishing) मशीनों से बेहतर थी।
  • वे एक-एक करके (Individually) और खास डिजाइन में बनाई जाती थीं।
  • मशीनों का बना ‘एक जैसा’ (Standardized) माल उपनिवेशों (Colonies) को निर्यात करने के लिए था।

विशाल विविधता (Range of Products)

मशीनें एक ही तरह के उत्पाद बनाने के लिए अच्छी थीं (जैसे यूनिफॉर्म)। लेकिन बाजार में अक्सर बारीक डिजाइनों की मांग होती थी। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में 500 तरह के हथौड़े और 45 तरह की कुल्हाड़ियाँ बनाई जाती थीं। इन्हें बनाने के लिए मशीनी तकनीक नहीं, बल्कि इंसानी हुनर (Human Skill) की जरूरत थी।

* नोट: अमेरिका जैसे देशों में स्थिति अलग थी। वहां मजदूरों की कमी थी, इसलिए वहां मशीनीकरण (Mechanisation) का स्वागत हुआ। ब्रिटेन में ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी।

5. मजदूरों का जीवन

विक्टोरियन ब्रिटेन में श्रम की बहुतायत (Abundance of Labour) थी। गाँव के सैकड़ों लोग नौकरी की तलाश में शहरों की ओर आते थे। जिनके पास शहर में रिश्तेदार या दोस्त होते थे, उन्हें तो जल्दी नौकरी मिल जाती थी, लेकिन जिनके पास सामाजिक संपर्क नहीं थे, उन्हें हफ्तों इंतजार करना पड़ता था।

मौसमी काम (Seasonality)

कई उद्योगों में काम केवल खास महीनों में होता था, इसलिए उद्योगपति मशीनों की जगह मजदूरों को रखना पसंद करते थे:

  • गैस घर (Gas works) और शराबखाने (Breweries): जाड़े के दिनों में यहाँ काम बहुत ज्यादा होता था।
  • बुक बाइंडर्स और प्रिंटर: क्रिसमस की मांग पूरी करने के लिए दिसंबर से पहले एक्स्ट्रा मजदूरों की जरूरत पड़ती थी।
  • बंदरगाह: जाड़ों में जहाजों की मरम्मत और साफ-सफाई का काम होता था।

बाकी महीनों में ये मजदूर बेरोजगार हो जाते थे और सड़कों पर आ जाते थे।

वेतन और बेरोजगारी

19वीं सदी की शुरुआत में वेतन थोड़ा बढ़ा, लेकिन नेपोलियन युद्ध (Napoleonic War) के कारण कीमतें इतनी तेजी से बढ़ीं कि मजदूरों का ‘वास्तविक वेतन’ (Real Value) गिर गया। अब वे उसी वेतन में कम सामान खरीद पाते थे।

  • कमाई इस बात पर निर्भर करती थी कि कितने दिन काम मिला।
  • मंदी के दौर में (जैसे 1830 के दशक में) बेरोजगारी 35% से 75% तक पहुँच गई थी।
  • शहरी आबादी का 10% हिस्सा अत्यंत गरीब था।

आवास की भीषण समस्या

नौकरी के इंतजार में लोग हफ्तों तक भटकते थे। जिनके पास रहने का ठिकाना नहीं था, वे पुलों के नीचे (Arches) या रैन बसेरों (Night Refuges) में रात काटते थे। कुछ लोग ‘कैजुअल वार्ड्स’ (Casual Wards) में भी रहते थे जो पुअर लॉ (Poor Law) अधिकारियों द्वारा चलाए जाते थे।

मशीनों का विरोध

बेरोजगारी के डर से मजदूर नई तकनीक से नफरत करते थे। जब ऊनी उद्योग में स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny) आई, तो हाथ से कताई करने वाली महिलाओं ने मशीनों पर हमले शुरू कर दिए। यह संघर्ष लंबे समय तक चला।

Spinning Jenny

स्पिनिंग जेनी: संघर्ष का कारण

1840 के बाद राहत: निर्माण कार्य

1840 के दशक के बाद शहरों में निर्माण गतिविधियां (Building activity) तेज हुईं जिससे रोजगार के नए अवसर खुले:
• सड़कें चौड़ी की गईं और नए रेलवे स्टेशन बने।
• सुरंगें खोदी गईं, ड्रेनेज और सीवर लाइनें बिछाई गईं।
• नदियों के तटबंध (Embankments) बनाए गए।
परिणाम: परिवहन उद्योग में काम करने वालों की संख्या 1840 के दशक में दोगुनी हो गई और अगले 30 वर्षों में फिर दोगुनी हो गई।

6. भारत: बुनकरों का संघर्ष

औपनिवेशिक नियंत्रण से पहले

मशीन युग से पहले भारतीय रेशम और सूती कपड़े का दबदबा था।
व्यापार नेटवर्क: अर्मेनियाई और फारसी सौदागर पंजाब से अफगानिस्तान, पूर्वी फारस और मध्य एशिया तक माल ले जाते थे (पहाड़ी दर्रों और रेगिस्तानों से ऊंटों पर)।
बंदरगाह: सूरत (गुजरात), मसूलीपट्टम (कोरोमंडल) और हुगली (बंगाल)।

बदलाव (1750s): यूरोपीय कंपनियों की ताकत बढ़ी। सूरत और हुगली कमजोर हुए। सूरत का व्यापार 1.6 करोड़ (17वीं सदी अंत) से गिरकर 30 लाख (1740s) रह गया। बंबई और कलकत्ता का उदय हुआ।

गुमाश्ता (Gomastha) का आतंक

ईस्ट इंडिया कंपनी ने बुनकरों पर नियंत्रण करने के लिए ‘गुमाश्ता’ नामक वेतनभोगी कर्मचारी नियुक्त किए। उनका काम था:

1. निगरानी
बुनकरों को अन्य व्यापारियों से बात करने से रोकना।
2. पेशगी (Advance)
कर्ज देकर बुनकरों को कंपनी से बांध लेना।
3. सजा
देरी होने पर कोड़े मारना या अपमानित करना।
टकराव क्यों हुए? पुराने व्यापारी अक्सर उसी गांव के होते थे और बुनकरों की मदद करते थे। लेकिन गुमाश्ता बाहरी लोग थे। उनका गांव से कोई सामाजिक रिश्ता नहीं था। वे सिपाहियों के साथ आते थे और रौब जमाते थे। कई स्थानों पर (जैसे कर्नाटक और बंगाल) बुनकर गांव छोड़कर भाग गए।

7. मैनचेस्टर का आगमन

“भारतीय कपड़ों की मांग कभी कम नहीं हो सकती, क्योंकि दुनिया का कोई और देश इतना अच्छा माल नहीं बनाता।”
– हेनरी पटुलो (1772), ईस्ट इंडिया कंपनी अधिकारी

लेकिन यह भविष्यवाणी गलत साबित हुई। 19वीं सदी की शुरुआत में ही निर्यात में भारी गिरावट शुरू हो गई।

पतन के आंकड़े (Statistics of Decline)

भारतीय निर्यात (Export)

1811-12 में 33% → 1850-51 में गिरकर केवल 3% रह गया।

ब्रिटिश आयात (Import)

1850 तक भारतीय आयात में सूती कपड़े का हिस्सा 31% था → 1870 तक यह 50% से ऊपर चला गया।

समस्या 1: दोहरी मार (Double Blow)

बुनकरों को एक साथ दो समस्याओं का सामना करना पड़ा:
1. निर्यात बाजार ढह गया: ब्रिटिश सरकार ने भारी आयात शुल्क (Import Duties) लगाकर भारतीय माल को इंग्लैंड में घुसने से रोक दिया।
2. स्थानीय बाजार सिकुड़ गया: भारत में मैनचेस्टर के सस्ते मशीन-निर्मित कपड़े की बाढ़ आ गई। भारतीय हथकरघा उत्पाद, मशीनी माल की कम कीमत का मुकाबला नहीं कर सके।

समस्या 2: कपास का अकाल (1860s)

जब अमेरिकी गृहयुद्ध (American Civil War) शुरू हुआ, तो अमेरिका से ब्रिटेन को कपास की आपूर्ति बंद हो गई। ब्रिटेन ने भारत की ओर रुख किया।
परिणाम: भारत से कच्चे कपास का निर्यात इतना बढ़ा कि उसकी कीमत आसमान छू गई। भारतीय बुनकरों को कच्चा माल मिलना बंद हो गया या इतना महंगा मिला कि बुनाई करना लाभहीन हो गया।

समस्या 3: भारतीय कारखाने (19वीं सदी का अंत)

19वीं सदी के अंत तक भारत में भी कारखाने (बंबई, अहमदाबाद, कानपुर) खुलने लगे। अब बाजार में मशीनों से बना भारतीय धागा और कपड़ा भी आ गया। इससे हथकरघा उद्योग के अस्तित्व पर ही संकट आ गया।

8. भारत में फैक्ट्रियाँ और उद्यमी

प्रारंभिक मिलों का उदय (Timeline of First Mills)

1854 (बंबई)

पहली कपास मिल (Cotton Mill)। दो साल बाद उत्पादन शुरू। 1862 तक 4 मिलें चल रही थीं।

1855 (बंगाल)

रिशरा (Rishra) में पहली जूट मिल। दूसरी 1862 में खुली।

1860s (उत्तर भारत)

कानपुर में एल्गिन मिल (Elgin Mill) शुरू हुई।

1861 (अहमदाबाद)

अहमदाबाद की पहली कपास मिल शुरू।

1874 (मद्रास)

मद्रास की पहली कताई और बुनाई मिल (Spinning & Weaving Mill) ने उत्पादन शुरू किया।

प्रारंभिक भारतीय उद्यमी

ज्यादातर उद्यमियों ने चीन के साथ व्यापार (अफीम निर्यात और चाय आयात) करके पैसा कमाया था।

  • द्वारकानाथ टैगोर (बंगाल): चीन व्यापार से पैसा कमाया। 1830-40 के दशक में 6 संयुक्त उद्यम कंपनियाँ (Joint-stock companies) लगाईं (जो 1840 के दशक के संकट में डूब गईं)।
  • दिनशॉ पेटिट & जे.एन. टाटा (बंबई): चीन और इंग्लैंड (कपास) व्यापार से धन कमाया और विशाल औद्योगिक साम्राज्य खड़े किए।
  • सेठ हुकुमचंद: मारवाड़ी व्यवसायी, जिन्होंने 1917 में कलकत्ता में पहली भारतीय जूट मिल लगाई। उन्होंने भी चीन के साथ व्यापार किया था।
  • बिड़ला परिवार: प्रसिद्ध उद्योगपति जी.डी. बिड़ला (G.D. Birla) के पिता और दादा भी चीन के साथ व्यापार करते थे।
  • मद्रास के व्यापारी: बर्मा, मध्य पूर्व और पूर्वी अफ्रीका के साथ व्यापार करते थे।

मजदूर कहां से आए?

1901 में भारतीय फैक्ट्रियों में 5,84,000 मजदूर थे, जो 1946 तक बढ़कर 2,436,000 हो गए।

बंबई (1911)

50% से ज्यादा मजदूर पास के रत्नागिरी (Ratnagiri) जिले से आए थे।

कानपुर

ज्यादातर मजदूर कानपुर जिले के गांवों से ही आते थे। वे गांव और शहर के बीच आते-जाते रहते थे।

औपनिवेशिक शिकंजा (Colonial Control)

भारतीय व्यापारियों को यूरोप को निर्मित माल बेचने से रोका गया (वे सिर्फ कच्चा माल और अनाज बेच सकते थे)। शिपिंग (Shipping) पर भी यूरोपीय कंपनियों का कब्जा था।

यूरोपीय मैनेजिंग एजेंसियां (European Managing Agencies):

ये एजेंसियां चाय, कॉफी, खनन, नील और जूट में निवेश करती थीं (मुख्यतः निर्यात के लिए)। भारतीय केवल पूंजी लगाते थे, फैसले ये एजेंसियां लेती थीं।

  • बर्ड हीगलर्स एंड कंपनी (Bird Heiglers & Co.)
  • एंड्रयू यूल (Andrew Yule)
  • जार्डिन स्किनर एंड कंपनी (Jardine Skinner & Co.)

जॉबर (The Jobber)

मिलों में भर्ती कराने वाला ताकतवर व्यक्ति (मिस्त्री)

कौन था जॉबर?

उद्योगपति नए मजदूरों की भर्ती के लिए एक पुराने और विश्वसनीय कर्मचारी को रखते थे। उसे ‘जॉबर’ कहा जाता था।

कार्य और शक्ति:

  • गांव से लोगों को लाता था।
  • काम का भरोसा दिलाता था।
  • शहर में बसने में मदद करता था।
  • भ्रष्टाचार: समय के साथ वह पैसे और तोहफे मांगने लगा और मजदूरों की जिंदगी कंट्रोल करने लगा।

“जॉबर अक्सर एक प्रभावशाली व्यक्ति बन जाता था। उसका अधिकार और शक्ति असीमित थी।”

9. औद्योगिक विकास का अनूठापन

शुरुआत में धागा, कपड़ा नहीं

भारत में शुरुआती कपास मिलों ने मैनचेस्टर से सीधा मुकाबला नहीं किया। उन्होंने मोटा सूती धागा (Yarn) बनाया, जिसका आयात मैनचेस्टर नहीं करता था। यह धागा चीन को निर्यात किया जाता था।

बदलाव (20वीं सदी)

  • स्वदेशी आंदोलन (1906): लोगों ने विदेशी कपड़े का बहिष्कार किया।
  • चीन बाजार का नुकसान: जापानी और चीनी मिलों के कारण भारतीय धागे का निर्यात गिर गया। इसलिए भारतीय मिलों ने धागे की जगह कपड़ा बनाना शुरू किया। (1900-1912 के बीच कपड़ा उत्पादन दोगुना हो गया)।

प्रथम विश्व युद्ध (WWI) – एक वरदान

जब युद्ध शुरू हुआ, तो ब्रिटिश मिलें सेना के लिए सामान बनाने में व्यस्त हो गईं। भारत में मैनचेस्टर का आयात भारी मात्रा में गिर गया। भारतीय कारखानों को रातों-रात विशाल घरेलू बाजार मिल गया। उन्होंने जूट की बोरियां, फौजियों की वर्दी और टेंट बनाए।

10. लघु उद्योगों का बचना (Comparison)

फैक्ट्रियों के बढ़ने के बावजूद हथकरघा उद्योग खत्म नहीं हुआ। 1900 से 1940 के बीच हथकरघा उत्पादन तीन गुना हो गया।
कारण? तकनीक, जैसे फ्लाई शटल (Fly Shuttle)

बुनकर कैसे बचे? (मोटा vs महीन कपड़ा)

  • मोटा कपड़ा: गरीब लोग खरीदते थे। अकाल या खराब फसल के समय इसकी मांग गिर जाती थी।
  • महीन कपड़ा (जैसे बनारसी/बालूचरी): अमीर लोग खरीदते थे। अकाल का अमीरों पर असर नहीं पड़ता था, इसलिए इसकी मांग स्थिर रहती थी। मिलें इन विशेष डिजाइनों (जैसे साड़ी के बॉर्डर) की नकल नहीं कर सकती थीं।

आंकड़ा: 1941 तक भारत के 35% से अधिक हथकरघों में फ्लाई शटल लगा था (ट्रावणकोर, मद्रास, मैसूर में यह 70-80% था)।

11. वस्तुओं के लिए बाजार (विज्ञापन)

नए उपभोक्ता बनाने के लिए विज्ञापन जरूरी था।


Made in Manchester (गुणवत्ता का प्रतीक)

देवताओं के चित्र (कृष्ण, सरस्वती, लक्ष्मी)

कैलेंडर (अनपढ़ लोगों के लिए – ग्राइप वॉटर/बाल कृष्ण)

नवाबों की तस्वीरें (शाही सम्मान – रंजीत सिंह)

राष्ट्रवादी संदेश

भारतीय निर्माताओं ने विज्ञापनों का इस्तेमाल राष्ट्रवाद फैलाने के लिए किया:
“यदि आप अपने देश से प्यार करते हैं, तो भारतीयों द्वारा बनाई गई चीजें खरीदें।”

महत्वपूर्ण आविष्कार और तथ्य

1

स्पिनिंग जेनी (Spinning Jenny)

1764 • जेम्स हरग्रीव्स

जेम्स हरग्रीव्स (James Hargreaves) द्वारा आविष्कृत, यह मशीन एक साथ कई तकलियों (spindles) को घुमा सकती थी, जिससे एक ही समय में कई धागे बन सकते थे।

प्रभाव: इसने कताई की प्रक्रिया को नाटकीय रूप से तेज कर दिया, लेकिन इससे बना धागा कमजोर था और केवल बाने (weft) के लिए उपयुक्त था।
2

वाटर फ्रेम (Water Frame)

1769 • रिचर्ड आर्कराइट

रिचर्ड आर्कराइट द्वारा विकसित, यह पानी की शक्ति से चलती थी।

प्रभाव: यह बहुत मजबूत धागा बनाती थी जो ताने (warp) के लिए उपयुक्त था। इसने पहली बार 100% सूती कपड़ा बनाना संभव बनाया। इसका आकार बड़ा होने के कारण इसे घरों में नहीं रखा जा सकता था, जिससे कारखानों (मिल्स) की स्थापना हुई।
3

स्पिनिंग म्यूल (Spinning Mule)

1779 • सैमुअल क्रॉम्पटन

सैमुअल क्रॉम्पटन (Samuel Crompton) ने जेनी की गति और वाटर फ्रेम की मजबूती को मिलाकर इस मशीन का निर्माण किया।

प्रभाव: यह किसी भी प्रकार का महीन और मजबूत धागा बना सकती थी, जिससे ब्रिटिश कपड़ा उद्योग भारतीय मलमल जैसे उच्च गुणवत्ता वाले कपड़ों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम हो गया।
4

पावर लूम (Power Loom)

1785 • एडमंड कार्टराइट

एडमंड कार्टराइट (Edmund Cartwright) ने बुनाई को स्वचालित करने के लिए इसका आविष्कार किया।

प्रभाव: इसने कताई और बुनाई के बीच की खाई को पाट दिया, जिससे कपड़ा उत्पादन की गति और बढ़ गई। हालांकि, शुरुआती मॉडल अक्षम थे और 19वीं सदी के मध्य तक हथकरघा बुनकर प्रतिस्पर्धा में बने रहे।

एनसीईआरटी (NCERT) पाठ्यक्रम पर आधारित विस्तृत अध्ययन सामग्री

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