जाति, धर्म और लैंगिक मसले Gender, Religion and Caste
लोकतंत्र में सामाजिक विविधताओं और असमानताओं का अध्ययन
परिचय
लोकतंत्र में सामाजिक विविधता खतरा नहीं है। राजनीति में असमानताओं की अभिव्यक्ति कभी-कभी लाभकारी भी हो सकती है। यह अध्याय तीन प्रमुख असमानताओं पर केंद्रित है:
लैंगिक विषमताएँ
धार्मिक विषमताएँ
जातिगत विषमताएँ
लैंगिक मसले और राजनीति
Gender Issues and Politics
श्रम का लैंगिक विभाजन (Sexual Division of Labour)
निजी जीवन (Private)
औरतों की ज़िम्मेदारी घर की चारदीवारी तक सीमित: खाना बनाना, सफाई, बच्चों की देखभाल। उनके काम को मूल्यवान नहीं माना जाता।
सार्वजनिक जीवन (Public)
पुरुषों का कब्ज़ा। यद्यपि महिलाएँ बाहर भी काम करती हैं, पर राजनीति और सार्वजनिक जीवन में उनकी भूमिका नगण्य है।
आदर्श स्त्री की रूढ़िवादी छवि
समाज और मीडिया (जैसे टीवी सीरियल, विज्ञापन) में महिलाओं की रूढ़िवादी भूमिकाएँ दिखाई जाती हैं:
- फैशन उद्योग: ‘आदर्श सुंदरी’।
- समाज: ‘आदर्श गृहिणी’।
- नियोक्ता: ‘आदर्श कर्मचारी’ (पुरुषों के समान)।
समय का उपयोग सर्वेक्षण (दैनिक औसत – घंटे:मिनट)
| गतिविधियाँ | पुरुष (समय) | महिला (समय) |
|---|---|---|
| आमदनी वाले काम | 6:00 | 2:40 |
| घर के काम (अवेतनिक) | 0:30 | 5:00 |
| सोना, पढ़ना, साफ़-सफ़ाई | 12:25 | 11:10 |
| निष्कर्ष | महिलाएं पुरुषों से औसतन 1 घंटा अधिक काम करती हैं, लेकिन उनके अधिकांश काम के पैसे नहीं मिलते। | |
पितृ-प्रधान समाज (Patriarchal Society) – विस्तृत
इसका शाब्दिक अर्थ है ‘पिता का शासन’। यह वह सामाजिक व्यवस्था है जहाँ महिलाओं की तुलना में पुरुषों को अधिक महत्व, शक्ति और संसाधन दिए जाते हैं।
- नियंत्रण: इसमें महिलाओं के श्रम, प्रजनन और सार्वजनिक जीवन पर पुरुषों का नियंत्रण होता है।
- समाजीकरण: बचपन से ही लड़कों को ‘नेता’ और लड़कियों को ‘अनुयायी’ या ‘देखभाल करने वाली’ के रूप में पाला जाता है।
- उत्तराधिकार: संपत्ति और वंश आमतौर पर पिता से पुत्र को हस्तांतरित होते हैं।
नारीवादी आंदोलन (Feminist Movement)
वे आंदोलन जो महिलाओं के राजनीतिक और वैधानिक दर्जे को ऊँचा उठाने, शिक्षा और रोज़गार के अवसर बढ़ाने की मांग करते हैं। ये आंदोलन केवल महिलाओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि कोई भी पुरुष जो समानता में विश्वास करता है, नारीवादी हो सकता है।
प्रमुख उद्देश्य (Goals)
- वोट देने और चुनाव लड़ने का अधिकार।
- शिक्षा और रोजगार के समान अवसर।
- राजनीतिक और कानूनी दर्जे में सुधार।
- पारिवारिक और निजी जीवन में बराबरी।
प्रभाव (Impact)
- महिलाओं की सार्वजनिक जीवन में भागीदारी बढ़ी।
- अब वे वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक जैसे पदों पर हैं।
- स्कैंडिनेवियाई देशों (स्वीडन, नॉर्वे) में भागीदारी का स्तर बहुत ऊँचा है।
“नारीवादी वह महिला या पुरुष है जो औरत और मर्द के समान अधिकारों और अवसरों में विश्वास करता है।”
भारत में महिलाओं की स्थिति – एक नज़र
| क्षेत्र (Area) | तथ्य और आँकड़े (Facts & Stats) |
|---|---|
| साक्षरता दर |
महिलाएँ: 54% (NCERT) पुरुष: 76% (NCERT) |
| शिक्षा | लड़कियाँ स्कूल में बेहतर करती हैं, पर उच्च शिक्षा में कम हैं क्योंकि माता-पिता लड़कों पर संसाधन खर्च करना पसंद करते हैं। |
| बाल लिंगानुपात (Child Sex Ratio) |
प्रति 1000 लड़कों पर लड़कियां (0-6 वर्ष): 919 (2011 जनगणना)। कारण: कन्या भ्रूण हत्या। कई स्थानों पर यह 800-850 से भी नीचे है। |
| राजनीतिक प्रतिनिधित्व |
लोकसभा (2019): 14.36%। राज्य विधानसभाएँ: 5% से कम। विश्व तुलना: स्कैंडिनेवियाई देशों (स्वीडन, नॉर्वे) में यह 40% से ऊपर है। |
NFHS-5 (2019-21) और 2024 चुनाव के नए आँकड़े
-
कुल लिंगानुपात (Total Sex Ratio): 1020 महिलाएँ प्रति 1000 पुरुष (पहली बार महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक)।
-
साक्षरता दर (NFHS-5): महिलाएँ 71.5%, पुरुष 84.4%। (सुधार हुआ है, अंतर कम हुआ है)।
-
18वीं लोकसभा (2024): महिला सांसदों की संख्या 74 है (लगभग 13.6%), जो 2019 की तुलना में मामूली रूप से कम है।
धर्म, सांप्रदायिकता और राजनीति
Religion, Communalism and Politics
गांधी जी के विचार
धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जा सकता। धर्म से उनका मतलब किसी विशेष पूजा-पद्धति से नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों से था। राजनीति को धर्म के मूल्यों से निर्देशित होना चाहिए।
सांप्रदायिकता (Communalism)
जब राजनीति में धर्म का इस्तेमाल विभाजनकारी तरीके से हो। यह मान्यता कि एक धर्म के लोगों के हित एक जैसे होते हैं और दूसरे धर्म के लोगों से अलग होते हैं। यह सोच मौलिक रूप से गलत है।
सांप्रदायिकता के विभिन्न रूप
- दैनिक जीवन धार्मिक पूर्वाग्रह और एक धर्म को दूसरे से श्रेष्ठ मानना।
- राजनीतिक प्रभुत्व बहुसंख्यक समुदाय ‘बहुसंख्यकवाद’ अपनाता है; अल्पसंख्यक ‘अलग इकाई’ की मांग करते हैं।
- राजनीतिक गोलबंदी धर्मगुरुओं, पवित्र प्रतीकों और डर का उपयोग करके वोट मांगना।
- हिंसा दंगे और नरसंहार (जैसे विभाजन के समय)।
भारत की धार्मिक विविधता (जनगणना 2011)
| धर्म (Religion) | आबादी का प्रतिशत (%) |
|---|---|
| हिंदू | 79.8% |
| मुसलमान | 14.2% |
| ईसाई | 2.3% |
| सिख | 1.7% |
| बौद्ध | 0.7% |
| जैन | 0.4% |
| अन्य/कोई धर्म नहीं | 0.9% |
सच्चर समिति और अन्य रिपोर्ट (Sachar Committee & Other Reports)
एक आम भ्रांत धारणा है कि मुस्लिम आबादी का अनुपात इतना बढ़ जाएगा कि दूसरे समुदाय पीछे छूट जाएंगे।
- सच्चर समिति (2005): इसके आकलन के अनुसार, मुस्लिम आबादी का अनुपात थोड़ा बढ़ेगा लेकिन अगले 50 सालों में भी यह वृद्धि 3-4% तक ही रहेगी। व्यापक स्तर पर कोई बड़ा उलट-फेर नहीं होने वाला।
- NFHS-5 (2019-21) डेटा: सभी समुदायों की प्रजनन दर (Fertility Rate) में गिरावट आई है। मुसलमानों की प्रजनन दर 2.3 पर आ गई है (जो पहले काफी अधिक थी), जिससे हिंदुओं (1.94) के साथ अंतर तेजी से कम हो रहा है।
- प्यू रिसर्च सेंटर (2021): अध्ययन पुष्टि करता है कि भारत में धार्मिक समूहों के बीच प्रजनन दर में “अभिसरण” (convergence) हो रहा है, जिसका अर्थ है कि जनसंख्या संतुलन बना रहेगा।
धर्मनिरपेक्ष शासन (Secular State)
Constitutional Provisions
-
कोई राजकीय धर्म नहीं: भारत का कोई अपना धर्म नहीं है (जैसे पाकिस्तान में इस्लाम या श्रीलंका में बौद्ध धर्म है)।
-
धार्मिक स्वतंत्रता: सभी को अपने धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार करने की आज़ादी है।
-
भेदभाव पर रोक: धर्म के आधार पर भेदभाव करना असंवैधानिक है।
-
राज्य का हस्तक्षेप: समानता सुनिश्चित करने के लिए राज्य धर्म में हस्तक्षेप कर सकता है (जैसे छुआछूत को समाप्त करना)।
संवैधानिक प्रावधान (Constitutional Provisions)
| अनुच्छेद | प्रावधान |
|---|---|
| प्रस्तावना | भारत को एक ‘धर्मनिरपेक्ष’ (Secular) राष्ट्र घोषित करती है (42वें संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया)। |
| अनुच्छेद 15 | धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध। |
| अनुच्छेद 25 | अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता। |
| अनुच्छेद 26-28 | धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता और धार्मिक शिक्षा की स्वतंत्रता। |
| अनुच्छेद 29-30 | अल्पसंख्यकों (धार्मिक और भाषाई) के हितों का संरक्षण और शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का अधिकार। |
जाति और राजनीति
Caste and Politics
जाति व्यवस्था श्रम विभाजन का एक अतिवादी और स्थायी रूप है, जहाँ पेशा वंशानुगत होता है। यह केवल भारतीय समाज में है।
जातिगत असमानताएँ
- • ‘अंत्यज’ जातियों के साथ छुआछूत।
- • वर्ण व्यवस्था पर आधारित पदानुक्रम।
- • समाज सुधारक: ज्योतिबा फुले, गांधीजी, अंबेडकर, पेरियार।
आधुनिक बदलाव
- • शहरीकरण और शिक्षा से पुरानी मानसिकता कमजोर पड़ी।
- • संविधान द्वारा भेदभाव निषिद्ध।
- • किंतु: अभी भी लोग अपनी जाति में शादी करते हैं और आर्थिक हैसियत जाति से जुड़ी है।
जातिगत असमानता और गरीबी (1999-2000 आँकड़े)
औसत आर्थिक हैसियत अभी भी वर्ण-व्यवस्था के साथ गहरा संबंध दर्शाती है। ‘ऊँची’ जाति के लोगों की आर्थिक स्थिति सबसे अच्छी है, जबकि दलित और आदिवासियों की सबसे खराब।
| जाति और समुदाय | गरीबी रेखा के नीचे प्रतिशत (%) | |
|---|---|---|
| ग्रामीण | शहरी | |
| अनुसूचित जनजातियाँ (ST) | 45.8 | 35.6 |
| अनुसूचित जातियाँ (SC) | 35.9 | 38.3 |
| अन्य पिछड़ी जातियाँ (OBC) | 27.0 | 29.5 |
| मुसलमान अगड़ी जातियाँ | 26.8 | 34.2 |
| हिंदू अगड़ी जातियाँ | 11.7 | 9.9 |
| ईसाई अगड़ी जातियाँ | 9.6 | 5.4 |
| ऊँची जाति के सिख | 0.0 | 4.9 |
| अन्य अगड़ी जातियाँ | 16.0 | 2.7 |
| सभी समूह (राष्ट्रीय औसत) | 27.0 | 23.4 |
नीति आयोग बहुआयामी गरीबी सूचकांक (MPI) – 2023 अपडेट
हालिया रिपोर्टों के अनुसार, भारत में गरीबी में भारी कमी आई है। फिर भी, जातिगत असमानताएँ बनी हुई हैं। ST और SC समूहों में गरीबी की तीव्रता अभी भी अन्य समूहों की तुलना में अधिक है, यद्यपि पूर्ण संख्या में सुधार हुआ है।
राजनीति में जाति (Caste in Politics)
How Caste influences Politics
जातिवाद (Casteism) यह मान्यता है कि जाति ही सामाजिक समुदाय का एकमात्र आधार है। राजनीति में यह कई रूप लेती है:
उम्मीदवार चयन
पार्टियाँ टिकट देते समय क्षेत्र की जातिगत संरचना का ध्यान रखती हैं ताकि चुनाव जीत सकें।
सरकार गठन
मंत्रिमंडल में विभिन्न जातियों और कबीलों के लोगों को उचित जगह दी जाती है।
गोलबंदी
पार्टियाँ जातिगत भावनाओं को उकसाती हैं। कुछ दलों को विशेष जातियों के मददगार के रूप में देखा जाता है।
मिथक बनाम हकीकत (चुनावी नतीजे)
मिथक: “चुनाव सिर्फ जातियों का खेल है।” / “वोट बैंक की राजनीति”
हकीकत:
- देश के किसी भी संसदीय क्षेत्र में एक जाति का बहुमत नहीं है। हर पार्टी को एक से ज्यादा जातियों का भरोसा जीतना पड़ता है।
- कोई भी पार्टी किसी एक जाति के सभी वोट हासिल नहीं कर सकती।
- जब लोग ‘वोट बैंक’ कहते हैं, तो इसका मतलब है कि उस जाति का एक बड़ा हिस्सा (सभी नहीं) उस पार्टी को वोट देता है।
- सत्तारूढ़ दल अक्सर चुनाव हारते हैं, जो यह साबित करता है कि जातियों की पसंद बदलती रहती है।
जाति के अंदर राजनीति (Politics in Caste)
How Politics influences Caste
सिर्फ राजनीति ही जातिग्रस्त नहीं होती, बल्कि राजनीति भी जातियों को प्रभावित करती है। राजनीति जातियों को अपने घेरे में ले आती है जिससे जातिगत पहचान और व्यवस्था का स्वरूप बदल जाता है।
1. विस्तार (Widening Base)
हर जाति खुद को बड़ा बनाना चाहती है। इसलिए वह अपने समूह की जिन उप-जातियों (Sub-castes) को पहले छोटा बताकर बाहर रखती थी, अब उन्हें अपने साथ जोड़ने की कोशिश करती है।
2. गठबंधन (Coalition)
चूँकि एक जाति अपने दम पर सत्ता नहीं पा सकती, इसलिए वह अन्य जातियों या समुदायों के साथ गठजोड़ करती है। इससे उनके बीच संवाद और मोल-तोल होता है।
3. नए समूह (New Groups)
राजनीति में नए किस्म के जातिगत समूह उभरे हैं। जैसे: ‘अगड़ा’ (Forward) और ‘पिछड़ा’ (Backward) जाति समूह।
आरक्षण: संवैधानिक प्रावधान और स्थिति
Reservation: Constitutional Provisions & Status
महत्वपूर्ण संवैधानिक अनुच्छेद (Articles)
| अनुच्छेद (Article) | विवरण (Description) |
|---|---|
| 15(4) और 16(4) | सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC) और SC/ST के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में आरक्षण का आधार। |
| 330 और 332 | लोकसभा (330) और राज्य विधानसभाओं (332) में SC और ST के लिए सीटों का आरक्षण। |
| 243D और 243T | पंचायतों और नगरपालिकाओं में SC/ST और महिलाओं (कम से कम 33%) के लिए आरक्षण। |
| 330A और 332A* | (नया) नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 के तहत लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण (भविष्य में लागू)। |
वर्तमान आरक्षण कोटा और संसदीय सीटें
| श्रेणी (Category) | कोटा (नौकरी/शिक्षा) | आरक्षित सीटें (लोकसभा) |
|---|---|---|
| अनुसूचित जाति (SC) | 15% | 84 |
| अनुसूचित जनजाति (ST) | 7.5% | 47 |
| अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) | 27% | – |
| आर्थिक रूप से कमजोर (EWS) | 10% | – |
| कुल (Total) | 59.5% | 131 |
नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 (106वां संशोधन)
- विधेयक बनाम अधिनियम: यह 128वां संविधान संशोधन विधेयक था जो 106वें संविधान संशोधन अधिनियम के रूप में पारित हुआ।
- प्रावधान: लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (NCT) में महिलाओं के लिए 33% (एक तिहाई) सीटें आरक्षित होंगी।
- आरक्षण के भीतर आरक्षण: यह 33% कोटा अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों पर भी लागू होगा।
- अवधि: यह आरक्षण 15 वर्षों के लिए लागू होगा, जिसे बाद में संसद द्वारा बढ़ाया जा सकता है।
- लागू होना: यह अगली जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन (Delimitation) के बाद ही प्रभाव में आएगा।
- रोटेशन: आरक्षित सीटों को परिसीमन के बाद रोटेट (चक्रीय रूप से बदला) किया जाएगा।
एक अपील: विविधता में एकता की ओर
प्रिय साथियों,
आज जब हम अपने समाज और लोकतंत्र को देखते हैं, तो हमें जाति, धर्म और लिंग की दीवारों से ऊपर उठकर सोचने की ज़रूरत है। हमारा संविधान हमें समानता और बंधुत्व का अधिकार देता है, लेकिन यह केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ हर व्यक्ति को उसकी पहचान से नहीं, बल्कि उसकी क्षमता और मानवता से आँका जाए। आइए, हम एक ऐसे भारत का निर्माण करें जहाँ कोई भेदभाव न हो, जहाँ हर आवाज़ सुनी जाए और जहाँ हर कोई बिना डर के अपनी बात कह सके।
हमें अपनी विविधता को अपनी कमज़ोरी नहीं, बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बनानी होगी। जाति, धर्म और लिंग के बंधनों को तोड़कर, आइए हम सब मिलकर एक समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की ओर कदम बढ़ाएँ।
— एक जागरूक नागरिक