लोकतंत्र के परिणाम – विस्तृत अध्ययन मॉड्यूल
कक्षा 10 – राजनीति विज्ञान

लोकतंत्र के परिणाम Outcomes of Democracy

लोकतंत्र से क्या उम्मीदें हैं और वास्तविक जीवन में यह कैसा प्रदर्शन करता है? एक गहन विश्लेषण।

लोकतंत्र: एक परिचय

Democracy: An Introduction

लोकतंत्र क्या है? (What is Democracy?)

लोकतंत्र (Democracy) शासन की वह प्रणाली है जिसमें शासकों का चुनाव जनता स्वयं करती है। यह दो ग्रीक शब्दों ‘डेमोस’ (Demos – जनता) और ‘क्रेटिया’ (Kratos – शासन) से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है “जनता का शासन”

“लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन है।” — अब्राहम लिंकन

लोकतंत्र की 4 मुख्य विशेषताएँ (कक्षा 9 की पुनरावृत्ति):

1
प्रमुख फैसले निर्वाचित नेताओं द्वारा

अंतिम निर्णय लेने की शक्ति लोगों द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास होनी चाहिए।

2
स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव

चुनाव में वर्तमान शासकों को बदलने का निष्पक्ष अवसर होना चाहिए।

3
एक व्यक्ति, एक वोट, एक मोल

हर वयस्क नागरिक का एक वोट होना चाहिए और हर वोट का समान महत्व होना चाहिए।

4
कानून का राज और अधिकारों का सम्मान

सरकार संविधान द्वारा तय बुनियादी कानूनों और नागरिक अधिकारों के दायरे में रह कर काम करे।

इस अध्याय (कक्षा 10) में हम क्या पढ़ेंगे?

अभी तक हमने जाना कि “लोकतंत्र क्या है?” (What is democracy)।
अब इस अध्याय में हम यह जानेंगे कि “लोकतंत्र क्या करता है?” (What does democracy do)।

हम यह मूल्यांकन करेंगे कि क्या लोकतंत्र उन उम्मीदों (समानता, आजादी, विकास) को पूरा करता है जिनके लिए हमने इसे चुना था। क्या नैतिक रूप से अच्छा होना, परिणामों (Outcomes) में भी अच्छा साबित होता है?

लोकतंत्र के परिणामों का मूल्यांकन कैसे करें?

How to Assess Democracy’s Outcomes?

दुविधा की स्थिति (The Dilemma):

हम एक दुविधा में हैं। सैद्धांतिक रूप में तो लोकतंत्र को अच्छा माना जाता है, पर व्यवहार में इसे इतना अच्छा नहीं माना जाता। इसी दुविधा के चलते लोकतंत्र के नतीजों पर गहराई से विचार करना ज़रूरी है। क्या हम इसे सिर्फ नैतिक कारणों से पसंद करते हैं, या इसके समर्थन के पीछे कोई ‘युक्तिपरक’ (Prudential) कारण भी हैं?

लोकतंत्र को बेहतर मानने के 5 प्रमुख कारण (सैद्धांतिक):

1. नागरिकों में समानता (Equality)

लोकतंत्र इस सिद्धांत पर आधारित है कि सभी नागरिक बराबर हैं। चाहे वह अमीर हो या गरीब, शिक्षित हो या अशिक्षित, सभी के वोट का मूल्य एक समान है (एक व्यक्ति, एक वोट, एक मोल)। यह किसी भी तरह के भेदभाव (जाति, धर्म, लिंग) को खारिज करता है।

2. व्यक्ति की गरिमा (Dignity)

लोकतंत्र मानता है कि सबसे गरीब और अनपढ़ नागरिक को भी वही दर्जा प्राप्त है जो अमीर और पढ़े-लिखे को है। यह लोगों को ‘प्रजा’ (Subjects) नहीं बल्कि ‘नागरिक’ (Citizens) मानता है, जिससे उनका आत्म-सम्मान और गरिमा बढ़ती है।

3. फैसलों में बेहतरी (Quality of Decisions)

लोकतंत्र में फैसले विचार-विमर्श और चर्चा के बाद लिए जाते हैं। इसमें कई लोगों की राय शामिल होती है। इससे गलतियों की गुंजाइश कम हो जाती है और जल्दबाजी या गैर-जिम्मेदार फैसले लेने से बचा जा सकता है।

4. टकरावों को टालना (Conflict Resolution)

विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच हितों का टकराव होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र हिंसक तरीके के बजाय बातचीत, समझौते और संवैधानिक तरीकों से इन विवादों को सुलझाने का एक शांतिपूर्ण मंच प्रदान करता है।

5. गलतियों को सुधारने की गुंजाइश (Correcting Mistakes)

लोकतंत्र में यह गारंटी नहीं है कि गलतियाँ नहीं होंगी। लेकिन इसमें यह खूबी है कि गलतियों को छुपाया नहीं जा सकता। उन पर सार्वजनिक चर्चा होती है। या तो शासक अपने फैसले बदलते हैं, या जनता शासकों को ही बदल देती है।

लोकतंत्र का वैश्विक परिदृश्य:

आज दुनिया के सौ से अधिक देश किसी न किसी तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था चलाने का दावा करते हैं। उनके पास:

  • औपचारिक संविधान है।
  • चुनाव होते हैं।
  • राजनीतिक दल हैं।
  • नागरिकों को बुनियादी अधिकारों की गारंटी है।

हालाँकि, ये तत्व समान हैं, पर सामाजिक स्थिति, आर्थिक उपलब्धि और संस्कृति के मामले में ये देश अलग हैं, इसलिए उनके परिणाम भी अलग हो सकते हैं।

[महत्वपूर्ण] केवल स्थितियाँ, गारंटी नहीं

पहला कदम यह मानना है कि लोकतंत्र शासन का एक स्वरूप भर है। यह हमारी सभी सामाजिक बुराइयों को मिटा देने वाली जादू की छड़ी नहीं है। यह केवल चीजों को हासिल करने की स्थितियाँ बना सकता है। नागरिकों को उन स्थितियों का लाभ उठाकर अपने लक्ष्यों को हासिल करना होता है।

उत्तरदायी, जिम्मेवार और वैध शासन

Accountable, Responsive and Legitimate Government

लोकतंत्र में सबसे बड़ी चिंता यह सुनिश्चित करना है कि लोगों का अपना शासक चुनने का अधिकार और शासकों पर नियंत्रण बरकरार रहे।

1 उत्तरदायी (Accountable)

सरकार लोगों के प्रति जवाबदेह होती है। लोकतंत्र यह सुनिश्चित करता है कि लोग निर्णय प्रक्रिया में भागीदार बनें और सरकार उनके प्रति उत्तरदायी हो।

उदाहरण: संसद में विपक्षी दल सरकार से सवाल पूछते हैं और मंत्रियों को जवाब देना पड़ता है। अगर सरकार जवाब नहीं देती, तो उसे अविश्वास का सामना करना पड़ सकता है।

2 जिम्मेवार (Responsive)

सरकार को लोगों की जरूरतों और मांगों के प्रति सजग होना चाहिए और समय पर कार्रवाई करनी चाहिए। यह जनमत की अनदेखी नहीं कर सकती।

उदाहरण: जब जनता किसी नीति का विरोध करती है (जैसे आंदोलन या प्रदर्शन द्वारा), तो लोकतांत्रिक सरकार को उस पर पुनर्विचार करना पड़ता है या उसे बदलना पड़ता है।

3 वैध (Legitimate)

यह वैध शासन व्यवस्था है। यह सुस्त या कम कार्यकुशल हो सकती है, लेकिन यह लोगों की अपनी शासन व्यवस्था है क्योंकि इसे जनादेश (Mandate) मिला है।

उदाहरण: स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जीतने के बाद ही कोई पार्टी सत्ता में आती है। यह ‘वैधता’ उसे संविधान और जनता के वोट से मिलती है, न कि सेना या बाहुबल से।

निर्णय लेने में देरी: क्या लोकतांत्रिक सरकार अक्षम है?

गैर-लोकतांत्रिक सरकार (Non-Democracy)
  • उन्हें विधायिका का सामना नहीं करना पड़ता।
  • बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक नज़रिए का ख्याल नहीं रखना पड़ता।
  • इसलिए, वे बहुत तेज़ फैसले ले सकती हैं।
  • नुकसान: ऐसे फैसले ले सकती हैं जो लोगों को मंजूर न हों, जिससे परेशानी हो सकती है।
लोकतांत्रिक सरकार (Democracy)
  • बातचीत और मोलतोल के आधार पर काम करती है।
  • प्रक्रिया पूरी करने में ज़्यादा समय लगता है।
  • फायदा: चूंकि इसने प्रक्रिया का पालन किया है, लोग इसके फैसलों को मानेंगे और वे ज़्यादा प्रभावी होंगे।
  • निष्कर्ष: लोकतंत्र में फैसला लेने में लगने वाला वक्त बेकार नहीं जाता।

पारदर्शिता (Transparency):

लोकतंत्र में यह व्यवस्था होती है कि फैसले कुछ कायदे-कानून के अनुसार होंगे। अगर कोई नागरिक यह जानना चाहे कि फैसले लेने में नियमों का पालन हुआ है या नहीं, तो वह इसका पता कर सकता है। उसके पास इसके साधन उपलब्ध हैं (जैसे RTI)। इसे पारदर्शिता कहते हैं। (यह अक्सर गैर-लोकतांत्रिक सरकारों में नहीं होता)।

लोकतांत्रिक शासनों का रिकॉर्ड (वास्तविक धरातल पर)

सफलता के क्षेत्र (Successes)
  • नियमित और निष्पक्ष चुनाव: लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ दुनिया भर में नियमित चुनाव कराने में काफी सफल रही हैं।

    उदाहरण: भारत में 1952 से अब तक नियमित अंतराल पर चुनाव होते आ रहे हैं और सत्ता हस्तांतरण शांतिपूर्ण होता है।

  • खुली चर्चा: ये खुली सार्वजनिक चर्चा के लिए उपयुक्त स्थितियाँ बनाने में सफल हैं। मीडिया और संसद में बहस इसका प्रमाण है।
विफलता/कमियाँ (Shortcomings)
  • सूचना साझा करना: नागरिकों के साथ सूचनाओं का साझा करने में इनका रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है। पारदर्शिता अभी भी एक चुनौती है (हालांकि RTI जैसे कानूनों से सुधार हुआ है)।
  • सबकी सुनवाई: ये अक्सर बहुसंख्यक आबादी या प्रभावशाली लोगों की ही सुनती हैं और गरीबों/अल्पसंख्यकों की अनदेखी करती हैं। निष्पक्ष चुनाव (Fair Elections) का भी रिकॉर्ड हर जगह बेदाग नहीं है।
भ्रष्टाचार और संवेदनशीलता (Corruption & Responsiveness)

भ्रष्टाचार (Corruption): लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ भ्रष्टाचार से मुक्त शासन देने में प्रभावशाली नहीं रही हैं। आए दिन होने वाले घोटाले (Scams) इसकी गवाही देते हैं कि यह बुराई यहाँ भी मौजूद है।

तर्क: हालांकि, गैर-लोकतांत्रिक सरकारों के बारे में भी यह नहीं कहा जा सकता कि वे कम भ्रष्ट हैं, बस वहाँ घोटाले छुप जाते हैं क्योंकि मीडिया स्वतंत्र नहीं होता।

संवेदनशीलता (Responsiveness): लोगों की जरूरतों के प्रति संवेदनशील होने के मामले में भी रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं है। लोग अपनी मांगों के लिए तरसते रहते हैं और सरकारें अक्सर बहरी हो जाती हैं।

निष्कर्ष: इन कमियों के बावजूद, वैधता (Legitimacy) के कारण लोकतंत्र अन्य विकल्पों से बेहतर है क्योंकि यह जनता का अपना शासन है।

आर्थिक संवृद्धि और विकास

Economic Growth and Development

आर्थिक विकास के रुझान (Economic Growth Trends)

वैश्विक तुलना (Global Comparison)

पिछले 50 वर्षों के आंकड़ों से पता चलता है कि तानाशाही वाले देशों ने आर्थिक विकास में मामूली बढ़त हासिल की है। हालाँकि, लोकतांत्रिक देशों में विकास की दर थोड़ी धीमी हो सकती है, लेकिन यह अधिक टिकाऊ और समावेशी होती है।

गरीब देशों की स्थिति

जब हम केवल गरीब देशों की तुलना करते हैं, तो तानाशाही और लोकतंत्र के बीच आर्थिक विकास का अंतर लगभग समाप्त हो जाता है। इसका अर्थ है कि शासन का स्वरूप आर्थिक विकास का एकमात्र निर्धारक नहीं है।

रिकॉर्ड (1950-2000): एक तुलनात्मक दृष्टि

आँकड़े बताते हैं कि 1950 से 2000 के बीच तानाशाहियों में आर्थिक विकास की दर थोड़ी अधिक रही है।

  • सभी लोकतांत्रिक शासन: ~3.95% विकास दर
  • सभी तानाशाहियाँ: ~4.42% विकास दर
महत्वपूर्ण तथ्य: जब हम केवल गरीब देशों की तुलना करते हैं, तो यह अंतर लगभग मिट जाता है (तानाशाही वाले गरीब देश: 4.34% vs लोकतंत्र वाले गरीब देश: 4.28%)। इससे सिद्ध होता है कि लोकतंत्र आर्थिक पिछड़ेपन का कारण नहीं है।
निष्कर्ष: विकास को प्रभावित करने वाले कारक

आर्थिक विकास केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि देश में लोकतंत्र है या तानाशाही। यह कई अन्य कारकों का परिणाम होता है:

1. देश की जनसंख्या का आकार

उदाहरण: कम जनसंख्या वाले देशों (जैसे नॉर्वे) के लिए संसाधन प्रबंधन आसान होता है, जबकि भारत जैसी विशाल जनसंख्या के लिए चुनौतियाँ अलग हैं।

2. वैश्विक स्थिति

उदाहरण: वैश्विक मंदी, युद्ध या तेल की कीमतें किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं, चाहे वहां कोई भी शासन हो।

3. अन्य देशों से सहयोग

उदाहरण: विदेशी निवेश, तकनीकी मदद और मित्र देशों के साथ व्यापार समझौते विकास की गति तय करते हैं।

4. आर्थिक प्राथमिकताएँ

उदाहरण: क्या सरकार शिक्षा-स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है या केवल सेना पर? उद्योगों को प्राथमिकता मिल रही है या कृषि को?

अंतिम मत: चूंकि विकास दर में अंतर नगण्य है, लेकिन लोकतंत्र के अन्य फायदे (आजादी, समानता) बहुत ज्यादा हैं, इसलिए लोकतंत्र ही बेहतर विकल्प है।

असमानता और गरीबी में कमी

Reduction of Inequality and Poverty

नवीनतम आँकड़े: असमानता और गरीबी (Latest Trends)

धन का संकेंद्रण (Wealth Gap)

हालिया रिपोर्टों (जैसे Oxfam) के अनुसार, भारत में शीर्ष 1% अमीरों के पास देश की कुल संपत्ति का 40% से अधिक हिस्सा है। वहीं, निचली 50% आबादी के पास कुल संपत्ति का मात्र 3% हिस्सा ही है।

गरीबी की स्थिति (Poverty Status)

विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, हालांकि अत्यधिक गरीबी में कमी आई है, लेकिन भारत में अभी भी करोड़ों लोग बहुआयामी गरीबी (Multidimensional Poverty) का सामना कर रहे हैं, जहाँ उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर में अभाव झेलना पड़ता है।

लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं से यह उम्मीद रखना ज्यादा तर्कसंगत है कि वे आर्थिक असमानता को कम करेंगी।

विरोधाभास

लोकतंत्र राजनीतिक समानता पर आधारित है (प्रतिनिधियों के चुनाव में हर व्यक्ति का वजन बराबर है)। लेकिन इसके साथ-साथ आर्थिक असमानता भी बढ़ रही है।

धन का असमान वितरण

मुट्ठी भर धनकुबेर आय और संपत्ति में अपने अनुपात से बहुत ज्यादा हिस्सा पाते हैं। इतना ही नहीं, देश की कुल आय में उनका हिस्सा भी बढ़ता गया है।

गरीबी पर विफलता

वास्तविक जीवन में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ आर्थिक असमानताओं को कम करने में ज्यादा सफल नहीं हो पाई हैं। समाज के सबसे निचले हिस्से के लोगों को जीवन बसर करने के लिए काफी कम साधन मिलते हैं। उनकी आमदनी गिरती गई है। कई बार उन्हें भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा और इलाज जैसी बुनियादी जरूरतें पूरी करने में मुश्किल आती है।

  • मतदाताओं में गरीबों की संख्या काफी बड़ी है, फिर भी सरकारें गरीबी के सवाल पर उतना ध्यान नहीं देतीं।
  • बांग्लादेश का उदाहरण: वहां आधी से ज्यादा आबादी गरीबी में जीवन गुजारती है। अनेक गरीब देश अपनी खाद्य आपूर्ति के लिए भी अमीर देशों पर निर्भर हैं।

सामाजिक विविधताओं में सामंजस्य

Accommodation of Social Diversity

टकराव टालने का तरीका:

दुनिया का कोई भी समाज अपने विभिन्न समूहों (धर्म, जाति, भाषा) के बीच के टकरावों को पूरी तरह और स्थायी रूप से खत्म नहीं कर सकता। मतभेद होना स्वाभाविक है।

लेकिन लोकतंत्र का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह हमें इन अंतरों का आदर करना सिखाता है और इनके बीच बातचीत (Negotiation) से समाधान निकालने का तरीका विकसित करता है। इससे हिंसक संघर्ष की संभावना कम हो जाती है।

विस्तृत उदाहरण: बेल्जियम की समझदारी

बेल्जियम यूरोप का एक छोटा सा देश है जहाँ डच, फ्रेंच और जर्मन भाषी लोग रहते हैं। यहाँ सामाजिक विभाजन बहुत जटिल था, लेकिन उन्होंने लोकतांत्रिक तरीके से इसे संभाला:

  • संविधान संशोधन: उन्होंने अपने संविधान में 4 बार संशोधन किया ताकि किसी को भी बेगानापन न लगे।
  • समान प्रतिनिधित्व: केंद्र सरकार में डच और फ्रेंच भाषी मंत्रियों की संख्या समान रखी गई।
  • सामुदायिक सरकार: संस्कृति, शिक्षा और भाषा के मसलों के लिए एक तीसरी ‘सामुदायिक सरकार’ बनाई गई, जिसे संबंधित भाषा के लोग चुनते हैं।

परिणाम: इस व्यवस्था ने बेल्जियम को गृहयुद्ध की आग में जलने से बचा लिया और देश के विभाजन को रोका। यह लोकतंत्र की सफलता का बेहतरीन उदाहरण है।

लोकतंत्र का दृष्टिकोण:

लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ अपने अंदर की प्रतिद्वंद्विताओं को ‘दुश्मन’ नहीं मानतीं, बल्कि उन्हें सँभालने की प्रक्रिया विकसित कर लेती हैं। यहाँ समस्याओं पर पर्दा नहीं डाला जाता, बल्कि उन पर चर्चा होती है।

गैर-लोकतंत्र का दोष:

गैर-लोकतांत्रिक शासक अक्सर अंदरूनी सामाजिक मतभेदों से आँखें फेर लेते हैं या उन्हें ताकत के दम पर दबाने (Suppress) की कोशिश करते हैं। यह दमन आगे चलकर विस्फोटक हो जाता है।

सामंजस्य के लिए 2 शर्तें (श्रीलंका के अनुभव से सीख):

श्रीलंका में सिंहली समुदाय ने बहुसंख्यकवाद थोपने की कोशिश की, जिससे गृहयुद्ध हुआ। इससे बचने के लिए:

  1. बहुमत का मतलब सबकी राय: लोकतंत्र का मतलब केवल “बहुमत की राय” से शासन करना नहीं है। बहुमत को सदा ही अल्पमत (Minority) का ध्यान रखना होता है और उनके साथ काम करना होता है, तभी सरकार पूरे देश का प्रतिनिधित्व कर पाती है।
  2. बहुमत कोई भी हो सकता है: ‘बहुमत के शासन’ का अर्थ धर्म, नस्ल या भाषायी आधार के बहुसंख्यक समूह का शासन नहीं है। लोकतंत्र तभी तक लोकतंत्र है जब तक प्रत्येक नागरिक को किसी न किसी अवसर पर बहुमत का हिस्सा बनने का मौका मिलता है। अगर किसी को जन्म के आधार पर बहुमत से बाहर रखा जाता है, तो लोकतंत्र उसके लिए बेमानी हो जाता है।

नागरिकों की गरिमा और आजादी

Dignity and Freedom of Citizens

व्यक्ति की गरिमा और आज़ादी के मामले में लोकतांत्रिक व्यवस्था किसी भी अन्य शासन प्रणाली से काफी आगे है। गरिमा और आज़ादी की चाह ही लोकतंत्र का आधार है। दुनिया भर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ इसे मानती हैं, कम से कम सिद्धांत के तौर पर।

महिलाओं की गरिमा

दुनिया के अधिकांश समाज पुरुष-प्रधान रहे हैं। महिलाओं के लंबे संघर्ष के बाद अब यह माना जाता है कि उनके साथ गरिमा और समानता का व्यवहार लोकतंत्र की ज़रूरी शर्त है। आज अगर कहीं महिलाओं के साथ गलत होता है, तो उनके पास उसके खिलाफ संघर्ष करने का वैधानिक और नैतिक बल है। यह बात अलोकतांत्रिक व्यवस्था में संभव नहीं थी क्योंकि वहाँ व्यक्तिगत आज़ादी और गरिमा न तो वैधानिक रूप से मान्य है, न नैतिक रूप से।

जातिगत असमानता

भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था ने कमजोर और भेदभाव का शिकार हुई जातियों के लोगों के समान दर्जे और समान अवसर के दावे को बल दिया है। आज भी जातिगत भेदभाव और दमन के उदाहरण मिलते हैं, पर अब उनके पक्ष में कानूनी या नैतिक बल नहीं होता। इसी एहसास के चलते आम लोग अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रति ज़्यादा सचेत हुए हैं।

लोकतंत्र की निरंतर परीक्षा

“लोकतंत्र की एक ख़ासियत है कि इसकी जाँच-परख कभी ख़त्म नहीं होती। वह एक जाँच पर खरा उतरता है तो अगली जाँच आ जाती है। लोगों को जब थोड़ा लाभ मिलता है तो वे और लाभों की मांग करते हैं। लोगों की शिकायतें ही लोकतंत्र की सफलता का प्रमाण हैं। यह दिखाता है कि लोग ‘प्रजा’ से ‘नागरिक’ बन गए हैं और सत्ता में बैठे लोगों के कामकाज का आलोचनात्मक मूल्यांकन करने लगे हैं।”

कक्षा 10 राजनीति विज्ञान – अध्याय 5: लोकतंत्र के परिणाम

स्रोतः NCERT पाठ्यपुस्तक पर आधारित विस्तृत अध्ययन नोट्स।

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