महाराणा प्रताप
मेवाड़ केसरी | 1572 – 1597 ई. | हल्दीघाटी का शेर
महाराणा प्रताप
सिसोदिया वंश
शासक परिचय (Profile)
| शासन काल | 28 फरवरी, 1572 – 19 जनवरी, 1597 (25 वर्ष) |
| जन्म | 9 मई, 1540 (ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया), कुम्भलगढ़ (बादल महल) |
| बचपन का नाम | कीका (बागड़ी भाषा में ‘छोटे बच्चे’ के लिए) |
| पिता / माता | राणा उदयसिंह / जैवन्ता बाई (पाली के अखैराज सोनगरा की पुत्री) |
| पत्नी / पुत्र | अजबदे (17 वर्ष की आयु में विवाह) / कुंवर अमरसिंह |
| राजधानी | गोगुन्दा (प्रारंभिक), कुम्भलगढ़, चावण्ड (1585 से) |
| राज्याभिषेक | 28 फरवरी, 1572 (गोगुन्दा), 32 वर्ष की आयु, होली का दिन |
| मृत्यु | 19 जनवरी, 1597 (57 वर्ष की आयु) |
👑 उत्तराधिकार संघर्ष और राज्याभिषेक
महाराणा प्रताप राणा उदयसिंह के ज्येष्ठ पुत्र थे। उनका जन्म 9 मई, 1540 को कुम्भलगढ़ के प्रसिद्ध ‘बादल महल’ में हुआ। माता जैवन्ता बाई पाली के अखैराज सोनगरा की पुत्री थीं।
📌 प्रमुख बिंदु
- राणा प्रताप बचपन में ‘कीका’ नाम से सम्बोधित किये जाते थे (बागड़ी भाषा में ‘छोटे बच्चे’ के लिए प्रयुक्त)
- 17 वर्ष की उम्र में प्रताप का विवाह रामरख पवार की पुत्री अजबदे के साथ हुआ, जिससे कुंवर अमरसिंह का जन्म हुआ
- जब उदय सिंह की मृत्यु हुई उस समय राणा प्रताप की उम्र 32 वर्ष की थी
उत्तराधिकार का विवाद
उदय सिंह ने भटियाणी रानी धीर बाई पर विशेष अनुराग होने के कारण उसके पुत्र जगमाल को अपना युवराज बनाया था। रानी के आग्रह से तथा कुछ सरदारों के सहयोग से जगमाल का राजतिलक कर दिया गया।
किंतु मेवाड़ के सरदारों ने जगमाल के राजतिलक का विरोध किया। वे प्रताप को अपना शासक बनाना चाहते थे। ग्वालियर के राजा रामसिंह और पाली के अखैराज सोनगरे ज्यों ही गोगुन्दा लौटे, प्रताप को महाराणा घोषित कर दिया।
- तिथि: 28 फरवरी, 1572 (होली का त्यौहार)
- स्थान: गोगुन्दा में (विधिवत राज्याभिषेक कुंभलगढ़ में हुआ)
- आयु: 32 वर्ष
- विशेष: रावत कृष्णदास ने प्रताप की कमर पर राजकीय तलवार बांधी
- उपस्थिति: मारवाड़ के चन्द्रसेन भी कुंभलगढ़ के राज्याभिषेक में शामिल हुए
जगमाल का अंत
प्रताप के शासक बनने पर जगमाल अप्रसन्न होकर अकबर के पास पहुँचा, जिसने उसे पहले जहाजपुर और बाद में आँधी की जागीर दे दी। जब जगमाल को 1583 ई. में सिरोही का आधा राज्य दे दिया गया तो उसका साला राव सुरताण (सिरोही का शासक) उससे नाराज हो गया। एक दिन अवसर पाकर सुरताण ने जगमाल पर हमला कर दिया और जगमाल की 1583 ई. में दताणी के युद्ध में मृत्यु हो गयी।
⚔️ राणा प्रताप और अकबर के संबंध
इस समय दिल्ली पर मुगल बादशाह अकबर का शासन था। प्रताप के सामने दो मार्ग थे – या तो वह अकबर की अधीनता स्वीकार कर सुविधापूर्ण जीवन बिताये या अपना स्वतंत्र अस्तित्व और अपने देश की प्रतिष्ठा बनाये रखे। दूसरा विकल्प चुनने की स्थिति में उन्हें अनेक कष्ट उठाने थे, फिर भी प्रताप ने दूसरे विकल्प ‘संघर्ष’ को ही चुना।
💪 संघर्ष की तैयारी
- सबसे पहले मेवाड़ को संगठित करने का बीड़ा उठाया
- सामन्तों और भीलों का एक गुट बनाया (भीलों के नेता राणा पूंजा भील के नेतृत्व में)
- प्रथम बार भीलों को सैन्य व्यवस्था में उच्च पद देकर इनके सम्मान को बढ़ाया
- मुगलों से दूर रहकर युद्ध का प्रबन्ध करने के लिए गोगुन्दा से अपनी राजधानी कुम्भलगढ़ ले गये
🕊️ अकबर द्वारा भेजे गए चार शिष्ट मण्डल (1572-1573 ई.)
📜 कूटनीति का प्रथम प्रयास
अकबर की राजनीतिक दूरदर्शिता: अकबर ने राणा प्रताप को अपने अधीन करने हेतु प्रारम्भ में सुलह-समझौते (Sulh-i-Kul) का मार्ग अपनाया। उसने 1572 से 1573 के दौरान चार प्रतिष्ठित दूतों को मेवाड़ भेजा, जो अकबर की कूटनीतिक प्राथमिकता को दर्शाता है।
🎯 अकबर की रणनीति: युद्ध की तुलना में समझौता अधिक लाभप्रद था – इससे मुगल सेना की क्षति से बचा जा सकता था और मेवाड़ जैसे शक्तिशाली राज्य को बिना रक्तपात के साम्राज्य में मिलाया जा सकता था।
| अकबर का दूत | मिलने का समय | पद / पृष्ठभूमि | परिणाम |
|---|---|---|---|
| 1. जलाल खाँ कुर्ची | सितम्बर-नवम्बर, 1572 | अकबर का विश्वसनीय सरदार | ❌ विफल |
| 2. मान सिंह कच्छवाहा | जून, 1573 | आमेर का राजा, अकबर का समधी | ❌ अपमानित |
| 3. भगवंत दास कच्छवाहा | सितम्बर-अक्टूबर, 1573 | मान सिंह के पिता, वरिष्ठ राजपूत सरदार | ❌ विफल |
| 4. राजा टोडरमल | दिसम्बर, 1573 | अकबर का वित्त मंत्री (दीवान) | ❌ विफल |
📋 विस्तृत विवरण – चारों शिष्ट मण्डल
जलाल खाँ कुर्ची – प्रथम शिष्ट मण्डल
अकबर ने गुजरात विजय (1572) के तुरंत बाद जलाल खाँ को मेवाड़ भेजा। उद्देश्य था राणा प्रताप को सम्मानजनक शर्तों पर अकबर की अधीनता स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना। अकबर ने मानसब, जागीर और राजसी सम्मान का प्रलोभन दिया।
राणा प्रताप ने स्पष्ट रूप से मुगल अधीनता को अस्वीकार कर दिया। उन्होंने कहा कि “मेवाड़ की स्वतंत्रता किसी भी मूल्य पर बेची नहीं जा सकती।” यह पहला संकेत था कि राणा समझौते के लिए तैयार नहीं हैं।
मान सिंह कच्छवाहा – द्वितीय शिष्ट मण्डल
मान सिंह कच्छवाहा आमेर (जयपुर) के राजा थे और अकबर के समधी (भारमल की पुत्री जोधाबाई से अकबर का विवाह हुआ था)। वे अकबर के सबसे विश्वसनीय राजपूत सरदारों में से एक थे। अकबर ने सोचा कि एक राजपूत राजा होने के नाते मान सिंह राणा को समझा सकेंगे।
मान सिंह ने उदयसागर पर एक भव्य भोज का आयोजन किया और राणा प्रताप को आमंत्रित किया। उद्देश्य था व्यक्तिगत मिलन के माध्यम से राणा को मनाना।
🔍 विवादास्पद घटना: राणा प्रताप स्वयं उपस्थित न होकर अपने पुत्र कुंवर अमरसिंह को भेजा। कुछ इतिहासकारों के अनुसार राणा ने यह राजनीतिक संदेश देना चाहा कि वे मान सिंह को अपने समान नहीं मानते।
मान सिंह ने इसे अपना घोर अपमान समझा। उन्होंने बिना भोजन किए वहाँ से प्रस्थान किया। इस घटना ने व्यक्तिगत शत्रुता का बीज बो दिया। बाद में हल्दीघाटी युद्ध में मान सिंह ने मुगल सेना का नेतृत्व किया और यह युद्ध आंशिक रूप से इस अपमान का प्रतिशोध बन गया।
भगवंत दास कच्छवाहा – तृतीय शिष्ट मण्डल
भगवंत दास मान सिंह के पिता और आमेर राज्य के पूर्व शासक थे। वे उम्र और अनुभव में वरिष्ठ थे। अकबर ने सोचा कि एक बुजुर्ग और अनुभवी राजपूत सरदार राणा को बुजुर्गों के सम्मान के आधार पर समझा सकेंगे।
मान सिंह के असफल प्रयास के बाद अकबर ने उनके पिता को भेजा। यह पारिवारिक सम्मान की बहाली का प्रयास भी था – पिता पुत्र के अपमान का बदला लेने और साथ ही राणा को समझाने आए थे। उन्होंने राणा को पुत्र की तरह समझाने का प्रयास किया।
राणा प्रताप ने भगवंत दास का भी सम्मानपूर्वक स्वागत किया लेकिन अधीनता के प्रस्ताव को दृढ़ता से अस्वीकार कर दिया। उन्होंने स्पष्ट कर दिया कि मेवाड़ की स्वतंत्रता पर कोई समझौता संभव नहीं है।
राजा टोडरमल – चतुर्थ एवं अंतिम शिष्ट मण्डल
राजा टोडरमल अकबर के नवरत्नों में से एक और साम्राज्य के वित्त मंत्री (दीवान-ए-आशरफ) थे। वे अपनी प्रशासनिक कुशलता और भूमि राजस्व सुधारों (जब्ती/टोडरमल बंदोबस्त) के लिए प्रसिद्ध थे। अकबर ने अंतिम प्रयास में एक प्रशासनिक विशेषज्ञ को भेजा।
टोडरमल ने राणा को आर्थिक लाभ का प्रलोभन दिया। उन्होंने समझाया कि मुगल साम्राज्य की अधीनता स्वीकार करने से मेवाड़ को आर्थिक समृद्धि, व्यापारिक लाभ और प्रशासनिक सुरक्षा मिलेगी। लेकिन राणा के लिए स्वाभिमान धन से बढ़कर था।
यह भी विफल रहा। राणा ने स्पष्ट कर दिया – “मेवाड़ की स्वतंत्रता किसी भी धन-संपत्ति से मूल्यवान है।” इस विफलता के बाद अकबर ने समझ लिया कि समझौता असंभव है और उसने सैन्य अभियान की तैयारी शुरू कर दी।
🔍 चारों शिष्ट मण्डलों का विश्लेषण
पहले सैन्य अधिकारी (जलाल खाँ), फिर राजपूत राजा (मान सिंह), फिर वरिष्ठ सरदार (भगवंत दास), अंत में प्रशासनिक विशेषज्ञ (टोडरमल) – यह क्रम अकबर की सुनियोजित कूटनीति दर्शाता है।
सितम्बर 1572 से दिसम्बर 1573 तक लगभग 15 महीने की कूटनीतिक प्रक्रिया – यह दर्शाता है कि अकबर युद्ध से बचना चाहता था और धैर्यपूर्वक प्रयास कर रहा था।
चारों प्रस्तावों को अस्वीकार करना राणा प्रताप की अटूट स्वाभिमान और मेवाड़ की स्वतंत्रता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
कूटनीति की विफलता ने हल्दीघाटी युद्ध (1576) को अपरिहार्य बना दिया। मान सिंह का अपमान व्यक्तिगत शत्रुता में बदल गया।
📖 महत्वपूर्ण घटना – उदयसागर का अपमान
रावल राणाजी की बात के अनुसार मान सिंह और राणा प्रताप की मुलाकात उदयसागर पर हुई। इस घटना का समर्थन निम्नलिखित स्रोतों ने किया है:
- कर्नल जेम्स टॉड (Annals and Antiquities of Rajasthan)
- अमरकाव्य वंशावली (रणछोड़ भट्ट)
- राज रत्नाकर (भट्ट सदाशिव)
- मान सिंह ने उदयसागर पर भव्य भोज का आयोजन किया
- राणा प्रताप को व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किया गया
- राणा ने स्वयं न जाकर अपने पुत्र कुंवर अमरसिंह को भेजा
- मान सिंह ने इसे घोर अपमान माना
- बिना भोजन किए क्रोधित होकर वापस लौट गए
संभावित कारण: राणा प्रताप ने मान सिंह को अपने समान नहीं माना क्योंकि मान सिंह ने मुगलों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। राणा की दृष्टि में वे स्वतंत्र राजपूत शासक नहीं रह गए थे, बल्कि अकबर के सामंत मात्र थे। कुंवर अमरसिंह को भेजना यह संदेश था कि मान सिंह का पद राणा से कम है।
यह व्यक्तिगत अपमान हल्दीघाटी युद्ध का एक प्रमुख कारण बना। मान सिंह ने प्रतिशोध लेने की ठानी और जब अकबर ने 1576 में मेवाड़ अभियान का नेतृत्व सौंपा, तो मान सिंह ने पूरी शक्ति से युद्ध किया। यह युद्ध केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि व्यक्तिगत प्रतिष्ठा का युद्ध भी बन गया।
⚠️ स्थान विवाद: अबुल फजल (अकबरनामा) ने मिलने का स्थान गोगुन्दा बताया है, जबकि राजस्थानी स्रोत उदयसागर का उल्लेख करते हैं। यह मतभेद मुगल और राजपूत इतिहासकारों के विभिन्न दृष्टिकोणों को दर्शाता है।
📚 RPSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- कुल शिष्ट मण्डल: चार (1572-1573)
- प्रथम दूत: जलाल खाँ कुर्ची (सितम्बर-नवम्बर 1572)
- द्वितीय दूत: मान सिंह (जून 1573) – उदयसागर अपमान
- तृतीय दूत: भगवंत दास (सितम्बर-अक्टूबर 1573) – मान सिंह के पिता
- चतुर्थ दूत: राजा टोडरमल (दिसम्बर 1573) – अंतिम प्रयास
- परिणाम: सभी प्रयास विफल → हल्दीघाटी युद्ध (1576)
- अकबर ने राणा प्रताप के पास कितने दूत भेजे? (उत्तर: 4)
- उदयसागर की घटना किस दूत से संबंधित है? (उत्तर: मान सिंह)
- मान सिंह की जगह राणा ने किसे भेजा? (उत्तर: कुंवर अमरसिंह)
- अंतिम शिष्ट मण्डल का नेतृत्व किसने किया? (उत्तर: टोडरमल)
- मान सिंह कहाँ के राजा थे? (उत्तर: आमेर/जयपुर)
- उदयसागर घटना का समय? (उत्तर: जून 1573)
🔥 हल्दीघाटी (राजसमंद) का युद्ध – 18 जून, 1576
राणा प्रताप को मनाने के सभी प्रयास विफल होने पर अंततः अकबर मेवाड़ पर आक्रमण करने की योजना को कार्यरूप में परिणत करने के लिए मार्च 1576 में स्वयं अजमेर पहुँचा एवं मानसिंह को मेवाड़ आक्रमण की जिम्मेदारी सौंपी।
📅 युद्ध की पृष्ठभूमि
- 3 अप्रैल, 1576: अबुल फजल एवं बदायूँनी के अनुसार मानसिंह अजमेर से रवाना होकर माण्डलगढ़, मोही आदि मुकामों से गुजरता हुआ खमनौर के पास मोलेला गाँव पहुँचा
- महाराणा प्रताप ने भी लोहसिंह में अपने डेरे डाले
- मुगल सेनानायक: कुँवर मानसिंह कच्छवाहा
- राणा प्रताप की ओर से: पठान हाकिम खाँ सूर (प्रधान सेनापति)
🎖️ युद्ध व्यूह का महत्व
हल्दीघाटी युद्ध में महाराणा प्रताप ने परंपरागत राजपूत युद्ध पद्धति का अनुसरण करते हुए अपनी सेना को पाँच प्रमुख भागों में विभाजित किया – हरावल, चंदावल, वामपार्श्व, दक्षिणपार्श्व और केन्द्र। यह व्यूह स्थानीय भूगोल (हल्दीघाटी की संकरी घाटी) को ध्यान में रखकर बनाया गया था।
⚠️ मुगल पक्ष में आंतरिक असंतोष
मानसिंह को प्रधान सेनापति बनाये जाने से मुगलों में नाराजगी थी। बदायूंनी बताता है कि उसने जब अपने संरक्षक नकीब खाँ को युद्ध में चलने को कहा, तो उसने यह कहते हुए मना कर दिया कि “एक हिन्दू के सेनापति होने के कारण वह नहीं जायेगा।”
💡 विश्लेषण: यह घटना दर्शाती है कि मुगल सेना में भी धार्मिक और जातीय विभाजन थे, जो उनकी एकता को कमजोर करते थे।
📋 पारंपरिक राजपूत युद्ध व्यूह के घटक
🔹 हरावल (Vanguard – अग्रिम दस्ता):
युद्ध में सबसे पहले आक्रमण करने वाली टुकड़ी। यह सबसे खतरनाक स्थिति होती थी क्योंकि शत्रु का पहला वार इसी पर होता था।
🔹 चंदावल (Reserve Force – आरक्षित सेना):
पीछे रहकर आवश्यकता पड़ने पर सहायता प्रदान करने वाली सेना। यह रणनीतिक महत्व की टुकड़ी होती थी।
🔹 वाम और दक्षिण पार्श्व (Left & Right Flanks):
दोनों ओर से शत्रु को घेरने और पार्श्व से आक्रमण करने के लिए। ये टुकड़ियाँ युद्ध का निर्णायक मोड़ ला सकती थीं।
🔹 केन्द्र (Center – राजसी मुख्यालय):
राजा स्वयं केंद्र में रहकर पूरी सेना का संचालन करता था। यहीं से सभी आदेश जारी होते थे।
🛡️ महाराणा प्रताप की सेना का विन्यास
(बायाँ पक्ष)
(अग्रिम दस्ता)
(दाहिना पक्ष)
📊 विस्तृत सेना संरचना (Detailed Army Structure):
⚔️ 1. हरावल (Vanguard) – अग्रिम आक्रमण दस्ता
प्रमुख सेनापति: हकीम खाँ सूर (पठान योद्धा)
सहयोगी सामंत:
- चूण्डावत कृष्णदास – सलूम्बर के ठाकुर (मेवाड़ का प्रमुख ठिकाना)
- भीमसिंह – सरदारगढ़ के राजपूत
- रावत साँगा – देवगढ़ से
- रामदास – बदनौर से (वीर जयमल का पुत्र, जो चित्तौड़ के रक्षक थे)
💡 महत्व: हरावल में मेवाड़ के सबसे वीर योद्धा थे जो पहली टक्कर झेलने में सक्षम थे।
➡️ 2. दक्षिण पार्श्व (Right Flank) – दाहिना पक्ष
प्रमुख सेनापति: राम शाह (ग्वालियर का शासक)
साथी: राम शाह के तीन पुत्र और अन्य योद्धा
💡 विशेषता: ग्वालियर के राजा राम शाह ने गुरिल्ला युद्ध की सलाह दी थी, लेकिन राजपूत परंपरा के अनुसार आमने-सामने की लड़ाई लड़ी गई।
⬅️ 3. वाम पार्श्व (Left Flank) – बायाँ पक्ष
प्रमुख सेनापति: मानसिंह झाला
सहयोगी:
- झाला बीदा (झाला माना) – बड़ी सादड़ी के वीर (बाद में राणा की रक्षा में शहीद हुए)
- मानसिंह सोनगरा – जालौर से (अक्षय राज का पुत्र)
💡 ऐतिहासिक महत्व: इसी दल के झाला बीदा ने राणा का छत्र धारण कर उन्हें सुरक्षित निकाला और स्वयं वीरगति को प्राप्त हुए।
🔄 4. चंदावल (Reserve Force) – आरक्षित सेना
प्रमुख सेनापति: पूंजा (पानरवा का भील सरदार)
सहयोगी:
- पुरोहित गोपीनाथ और जगन्नाथ
- महता रत्नचंद महासानी जगन्नाथ
- केशव और जैसा – सोनियाने के चारण (युद्ध में प्रेरणा गीत गाते थे)
👑 5. केन्द्र (Royal Center) – राजसी मुख्यालय
सर्वोच्च सेनानायक: महाराणा प्रताप
प्रमुख सहयोगी:
- भामाशाह – प्रधान मंत्री और महान दानवीर
- ताराचन्द्र – भामाशाह का भाई
💡 महत्व: केन्द्र से ही सभी युद्ध निर्देश और रणनीति संचालित होती थी। राणा स्वयं चेतक पर सवार होकर युद्ध का संचालन कर रहे थे।
🏹 6. भील पदाति (Tribal Warriors) – विशेष गुरिल्ला दस्ता
प्रमुख नेता: राणा पूंजा भील
स्थिति: पहाड़ियों और ऊँचाइयों पर तैनात
शस्त्र:
- तीर और कमान – लंबी दूरी के हमले के लिए
- छोटी तलवार – सामीप्य युद्ध के लिए
- पत्थर – शत्रु सेना पर बरसाने के लिए
🌟 ऐतिहासिक महत्व: महाराणा प्रताप पहले राजपूत शासक थे जिन्होंने भीलों को सैन्य व्यवस्था में उच्च पद दिया। भील योद्धा पहाड़ी इलाकों में गुरिल्ला युद्ध के विशेषज्ञ थे और उन्होंने मुगल सेना को काफी नुकसान पहुंचाया।
📌 नोट: भीलों की भागीदारी प्रताप की सामाजिक समावेशिता और रणनीतिक दूरदर्शिता को दर्शाती है। मेवाड़ के राज्य चिह्न में आज भी एक भील और एक राजपूत योद्धा हैं।
📝 परीक्षा के लिए याद रखें (Important for RPSC)
- सेना विभाजन: पाँच मुख्य भाग – हरावल, चंदावल, वाम पार्श्व, दक्षिण पार्श्व, केन्द्र
- प्रमुख सेनापति: हकीम सूर (हरावल), मानसिंह झाला (वाम पार्श्व), राम शाह (दक्षिण पार्श्व)
- भील योद्धा: राणा पूंजा भील के नेतृत्व में पहाड़ियों पर तैनात
- सामाजिक महत्व: प्रताप ने पहली बार भीलों को सेना में उच्च पद दिया
- झाला बीदा: वाम पार्श्व में थे, बाद में राणा का छत्र धारण कर शहीद हुए
- भामाशाह: केन्द्र में राणा के साथ थे (प्रधान मंत्री)
प्रातः युद्ध भेरी बजी। पहला वार इतना जोशीला था कि मुगल सैनिक चारों ओर जान बचाकर भाग गये। अपने पहले मोर्चे में सफल होने से राजपूत बनास नदी के काँठे वाले मैदान में, जिसे रक्त ताल कहते हैं, आ जमे।
ग्वालियर के राजा रामसहाय की सलाह: मुगल सेना से आमने-सामने लड़ने के बजाय उन्हें गुरिल्ला युद्ध में उलझा कर हराया जाये, पर उनकी बात न सुनी गई।
दोपहर का समय: युद्ध की गरमागरमी को, जैसे बदायूँनी लिखता है, सूर्य ने अपनी तीक्ष्ण किरणों से अधिक उत्तेजित कर दिया। सभी ओर से योद्धाओं की भीड़ ऐसी मिल गयी कि शत्रु सेना के राजपूत और मुगल सेना के राजपूतों को पहचानना कठिन हो गया।
💬 बदायूनी और आसफ खाँ का ऐतिहासिक संवाद
यह संवाद हल्दीघाटी युद्ध की क्रूर वास्तविकता और मुगल रणनीति को उजागर करता है।
अब्दुल कादिर बदायूंनी
पद: अकबर के दरबार का प्रसिद्ध इतिहासकार
विशेषता: स्वयं हल्दीघाटी युद्ध में उपस्थित (प्रत्यक्षदर्शी)
रचना: ‘मुन्तखब उत तवारिख’ (Muntakhab-ut-Tawarikh)
महत्व: प्रत्यक्ष साक्ष्य के कारण अत्यंत विश्वसनीय
आसफ खाँ (मिर्जा अब्दुल्लाह)
पद: मुगल सेना के प्रमुख सेनापति
साथी: मानसिंह कच्छवाहा के साथ
जिम्मेदारी: मेवाड़ अभियान का सह-नेतृत्व
स्थिति: अकबर के विश्वस्त सैन्य अधिकारी
⚡ युद्ध भूमि की विकट स्थिति (18 जून, 1576 – दोपहर)
युद्ध भूमि में अभूतपूर्व अराजकता थी। मुगल सेना के राजपूत सैनिक और महाराणा प्रताप की राजपूत सेना के योद्धा इतने घुल-मिल गए थे कि पहचान करना असंभव हो गया था।
महाराणा प्रताप के राजपूत
आमेर, बीकानेर के राजपूत
परिणाम: दोनों ओर राजपूत होने से “अपना” और “पराया” की पहचान नामुमकिन!
📜 ऐतिहासिक संवाद (Verbatim from Muntakhab-ut-Tawarikh)
प्रश्न (बदायूंनी → आसफ खाँ):
“ऐसी अवस्था में हम अपने (मुगल सेना के) और शत्रु (प्रताप की सेना के) राजपूतों की पहचान कैसे करें?”
English: “In such a situation, how do we distinguish between our (Mughal army’s) Rajputs and the enemy’s (Pratap’s army) Rajputs?”
उत्तर (आसफ खाँ का शीतल-हृदयी वक्तव्य):
“तुम तो अपना वार करते जाओ,
चाहे जिस पक्ष का भी राजपूत मारा जाये,
इस्लाम को हर दशा में लाभ होगा।”
English Translation: “Just keep attacking. Whichever side’s Rajput is killed – whether ours or the enemy’s – Islam will benefit in every case.”
⚠️ अर्थ: राजपूत शक्ति का विनाश ही असली उद्देश्य था – विजय से अधिक महत्वपूर्ण!
🎯 गहन ऐतिहासिक विश्लेषण (Deep Historical Analysis)
1️⃣ धार्मिक-राजनीतिक षड्यंत्र का साक्ष्य:
यह संवाद स्पष्ट करता है कि मुगल सेना का वास्तविक लक्ष्य केवल मेवाड़ विजय नहीं, बल्कि समग्र राजपूत शक्ति का विनाश था। चाहे कोई भी राजपूत मरे – प्रताप का या अकबर का – राजपूत समुदाय कमजोर होता था।
2️⃣ “फूट डालो और राज करो” की मास्टर स्ट्रेटेजी:
अकबर की प्रतिभा थी राजपूतों को आपस में लड़वाना – मेवाड़ बनाम आमेर, बनाम बीकानेर, बनाम मारवाड़। राजपूत एक-दूसरे को मारते रहे, जबकि मुगल साम्राज्य मजबूत होता गया। यह सबसे बड़ी राजपूत त्रासदी थी।
3️⃣ राजपूत शक्ति का दोहरा ह्रास:
हल्दीघाटी में दोनों पक्षों के हजारों राजपूत मारे गए। मेवाड़ के वीर और मुगल सेना के राजपूत दोनों की मृत्यु से राजपूत शक्ति का ह्रास हुआ, लेकिन मुगल साम्राज्य अक्षुण्ण रहा क्योंकि उनकी शक्ति का आधार तुर्की, फारसी और अफगानी सैनिक थे।
4️⃣ प्रत्यक्षदर्शी साक्ष्य का अमूल्य महत्व:
बदायूंनी का यह वर्णन इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह स्वयं युद्ध में उपस्थित था। यह कोई बाद में लिखा गया इतिहास नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव है। इससे मुगल रणनीति की क्रूर वास्तविकता सामने आती है।
5️⃣ ऐतिहासिक पाठ (Historical Lesson):
यह संवाद हमें सिखाता है कि आंतरिक फूट किसी भी समुदाय के लिए सबसे बड़ा खतरा है। यदि राजपूत राज्य एकजुट होते, तो मुगल साम्राज्य इतनी आसानी से स्थापित नहीं हो पाता। यह भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है।
📝 RPSC परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण बिंदु
- प्राथमिक स्रोत: ‘मुन्तखब उत तवारिख’ – बदायूंनी की प्रत्यक्षदर्शी रचना
- संवाद का महत्व: मुगल रणनीति की क्रूर वास्तविकता को उजागर करता है
- राजनीतिक विश्लेषण: फूट डालो और राज करो – अकबर की मास्टर स्ट्रेटेजी
- ऐतिहासिक परिणाम: राजपूत शक्ति का विभाजन और पतन
- याद रखें: यह हल्दीघाटी युद्ध (18 जून, 1576) के दौरान की घटना है
📚 प्राथमिक स्रोत (Primary Source):
‘मुन्तखब उत तवारिख’ (Muntakhab-ut-Tawarikh) – अब्दुल कादिर बदायूंनी, अकबर के दरबारी इतिहासकार और हल्दीघाटी युद्ध के प्रत्यक्षदर्शी
रचनाकाल: 16वीं शताब्दी (अकबर काल) | भाषा: फारसी | विश्वसनीयता: अत्यंत उच्च (प्रत्यक्षदर्शी खाता)
इस युद्ध का एक रोचक पहलू दोनों पक्षों के हाथियों के बीच जोरदार संघर्ष भी रहा है।
मुगल पक्ष के हाथी:
- गज-मुक्ता
- गजराज
- रणमंदर (रनमदार)
राणा प्रताप के हाथी:
- लूणा
- रामप्रसाद – इस संघर्ष में मुगलों के हाथ लगा, जिस पर मुगल सेनापति हुसैन खाँ ने कब्जा कर लिया। इसका नाम बदलकर पीर प्रसाद रख दिया गया।
इस हाथी युद्ध का वर्णन अबुल फजल व बदायूंनी दोनों ने किया है।
राणा प्रताप जो अपने प्रिय घोड़े चेतक पर सवार था, ने मानसिंह पर आक्रमण कर दिया। मानसिंह ‘मरदाना’ नाम के हाथी पर सवार था।
- चेतक ने अपने अगले दोनों पैर ‘मरदाना’ के मस्तिष्क पर टिका दिये
- राणा प्रताप ने भाले से मानसिंह पर आक्रमण किया, पर मानसिंह झुककर बच गया
- मानसिंह के हाथी की सैंड से बंधी तलवार से चेतक के पैर पर चोट लगी तथा वह घायल हो गया
- प्रताप के शरीर पर भी दो घाव लगे
इस आक्रमण का वर्णन अमर काव्य वंशावली में मिलता है।
झाला बीदा (झाला माना) का बलिदान:
राणा प्रताप को मुसिबत में देखकर बड़ी सादड़ी का झाला बीदा (झाला माना) आगे आया, और राणा का छत्र धारण करके राणा को वहाँ से सुरक्षित निकालने में सफल रहा। शत्रु सेना झाला बीदा को राणा प्रताप समझकर टूट पड़ी, और वह वीरगति को प्राप्त हुआ।
चेतक की मृत्यु:
टूटी टाँग के घोड़े से राणा अधिक दूर नहीं पहुंचा था कि मार्ग में ही घाटी के दूसरे नाके के पास बलीचा नामक स्थान पर चेतक की मृत्यु हो गयी। यहाँ राणा ने उसकी समाधी बनवाई।
📍 बलीचा (राजसमंद) में आज भी चेतक की समाधी स्थित है।
शक्तिसिंह की सहायता:
इस घटना के साथ बताया जाता है कि शक्तिसिंह भी जो मुगल दल के साथ उपस्थित था, किसी तरह बचकर जाते हुए राणा के पीछे चल दिया और अपने घोड़े को उसे देकर अपने कर्तव्य का पालन किया।
इस घटना का उल्लेख अमर काव्य वंशावली तथा राजप्रशस्ति में मिलता है।
📜 युद्ध के विभिन्न नाम
| इतिहासकार / ग्रंथ | युद्ध का नाम |
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अबुल फजल
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खमनौर का युद्ध |
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बदायूंनी
(मुन्तखब उत तवारिख)
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गोगुन्दा का युद्ध |
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कर्नल टॉड
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हल्दीघाटी का युद्ध
“मेवाड़ की थर्मोपल्ली”
(यूनान के प्रसिद्ध थर्मोपल्ली के मैदान से तुलना) |
🌟 युद्ध का प्रभाव और महत्व
- इस लड़ाई के उपरान्त ही राणा प्रताप राजस्थान व भारत के अन्य प्रदेशों में प्रातः स्मरणीय बने
- इनकी ख्याति सारे भारत में फैल गई
- क्रान्तिकारी बंगालियों ने भी राणा को अपनी प्रेरणा का स्रोत माना
- कर्नल टॉड का ऐतिहासिक ग्रन्थ बंगालियों का सर्वाधिक प्रिय ग्रन्थ बना
बंगाल में प्रताप की ख्याति
- आर. सी. मजूमदार: ‘राजपूत जीवन संध्या’ नामक उपन्यास
- बंकिमचन्द्र: ‘राजसिंह उपन्यास’ तथा ‘मेवाड़ के दो शक्तिशाली महाराणा’
- मधुसूदन: प्रताप की उपलब्धियों पर लेखनी चलाई
- द्विजेन्द लाल राय: 1905 में ‘प्रताप सिंह’ नाटक प्रकाशित
- इस युद्ध से अकबर को मनोवांछित सफलता न मिली
- नाराज होकर अकबर ने मानसिंह व आसफ खाँ की ड्योढ़ी बंद कर दी (दरबार पर आने पर रोक)
- हल्दीघाटी युद्ध के बाद मानसिंह को गोगुंदा से वापस बुला लिया गया
- राणा प्रताप ने अवसर का फायदा उठाकर गोगुंदा पर अधिकार कर लिया
- सितम्बर 1576: अकबर स्वयं अजमेर आया और गोगुंदा पहुँचकर राणा से गोगुंदा वापस प्राप्त कर लिया
- नवम्बर 1576: अकबर उदयपुर आया और प्रशासन जगन्नाथ कछवाहा व फखरूद्दीन को सौंपा
🏰 कुम्भलगढ़ का युद्ध (1578 ई.)
हल्दीघाटी के युद्ध के बाद राणा प्रताप ने कुम्भलगढ़ को अपना केन्द्र (राजधानी) बनाकर मुगल स्थानों पर आक्रमण करना शुरू कर दिया।
इससे कुद्ध होकर अकबर ने 1577 ई. में शाहबाज खाँ के नेतृत्व में एक सेना मेवाड़ की ओर भेजी। शाहबाज खाँ ने 1578 ई. में कुम्भलगढ़ पर आक्रमण किया।
- भीषण संघर्ष के बाद 3 अप्रैल, 1578 को शाहबाज खाँ ने कुम्भलगढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया
- किले की रक्षा करते हुए राव भाण सोनगरा लड़ते हुए मारा गया
- वर्ष 1578 एवं 1579 में शाहबाज खाँ ने दो बार और मेवाड़ पर आक्रमण किया, लेकिन वह असफल रहा
अब्दुर्रहीम खानखाना का अभियान (1580)
जून, 1580 ई. में अब्दुर्रहीम खानखाना को अजमेर का गवर्नर बनाया गया और उसको मेवाड़ अभियान का काम भी सौंपा गया। खानखाना ने अपने परिवार को शेरपुर में छोड़ा और राणा पर चढ़ आया।
⚔️ शेरपुर की घटना – राजपूती शौर्य का उदाहरण
ज्यों ही खानखाना आगे बढ़ा तो राणा ढोलान की ओर चला गया। इधर कुँवर अमरसिंह ने मुगल सेनापति के ध्यान को बटाने के लिए शेरपुर पर आक्रमण कर दिया। इस अवसर पर उसे खानखाना के परिवार को बन्दी बनाने में सफलता मिली।
परन्तु जब राणा को इस बात का पता चला तो उसने कुँवर को आज्ञा दी कि वह शीघ्र ही खानखाना के परिवार को सम्मान के साथ मिर्जा के निवास स्थान पर पहुँचा दे।
💰 भामाशाह की भेंट (1580 ई.) – मेवाड़ का उद्धारक
मुगलों से संघर्ष के दौरान राणा के पास धन का अभाव होने लगा। इसी समय (1580 ई. में) ‘चूलिया ग्राम’ में राणा को उनका मंत्री भामाशाह मिला।
🏆 भामाशाह का योगदान
भामाशाह ने अपनी निजी सम्पत्ति से राणा की 20 हजार स्वर्ण मुद्राओं से आर्थिक सहायता की।
इसलिए भामाशाह को ‘दानवीर’ और ‘मेवाड़ का उद्धारक’ कहा जाता है।
🎯 दिवेर का युद्ध – मेवाड़ का मैराथन (अक्टूबर, 1582)
‘अमरकाव्य’ के अनुसार 1582 ई. में राणा प्रताप ने मुगलों के विरुद्ध दिवेर (कुंभलगढ़) पर जबरदस्त आक्रमण किया। यहाँ का सूबेदार अकबर का काका सेरिमा सुल्तान खाँ था।
⚔️ अमरसिंह का पराक्रम
सुल्तान खाँ व अमर सिंह के बीच भीषण संघर्ष हुआ। इस संघर्ष के दौरान अमरसिंह ने सुल्तान खाँ पर भाले से इतना जबरदस्त प्रहार किया कि भाला न केवल सुल्तान खाँ वरन उनके घोड़े को भी चीरता हुआ निकल गया।
यह देख बाकी मुगल सेना भाग खड़ी हुई। दिवेर विजय की ख्याति चारों ओर फैल गई।
🌟 कर्नल टॉड का मत
कर्नल टॉड ने इस युद्ध को ‘प्रताप के गौरव का प्रतीक’ माना और दिवेर युद्ध की तुलना यूनान के मैराथन युद्ध से की।
🏛️ शांतिकाल और चावण्ड राजधानी (1585 के बाद)
1585 के बाद अकबर ने मेवाड़ पर कोई आक्रमण नहीं किया। महाराणा प्रताप जरूर आमेर से मालपुरा (टोंक) जीतने में सफल रहे।
🏰 चावण्ड को राजधानी बनाना (1585 ई. के लगभग)
इस शांतिकाल में राणा ने चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया, जहाँ पर अनेक महल व चामुण्डा मंदिर का निर्माण करवाया गया।
दरबार के विद्वान
इस समय राणा प्रताप के दरबार में निम्नलिखित विद्वानों ने ख्याति प्राप्त की:
| विद्वान | रचनाएँ / योगदान |
|---|---|
| चक्रपाणि मिश्र | चार ग्रंथों की रचना: राज्याभिषेक पद्धति, मुहर्त्तमाला, व्यवहारदर्श एवं विश्ववल्लभ |
| जीवधर | ‘अमरसार’ नामक ग्रंथ की रचना |
🕊️ मृत्यु और अमर विरासत
अन्त में पाँव में किसी असावधानी से कमान लग जाने से राणा प्रताप अस्वस्थ हो गया।
- तिथि: 19 जनवरी, 1597 ई.
- आयु: 57 वर्ष (वास्तव में 56 वर्ष 9 महीने)
- अंतिम संस्कार: चावण्ड के पास बाण्डोली गाँव के निकट बहने वाले नाले के तट पर
- स्मारक: एक छोटी-सी छतरी
नोट: कर्नल टॉड द्वारा पीछोला की पाल के महलों में राणा की मृत्यु होना बताया है पर इसे सही नहीं माना जाता है।
अकबर की प्रतिक्रिया
महाराणा प्रताप की मृत्यु का समाचार अकबर के कानों तक पहुँचा तो उसे भी बड़ा दुख हुआ। इस स्थिति का वर्णन अकबर के दरबार में उपस्थित दुरसा आढ़ा ने इस प्रकार किया:
📜 दुरसा आढ़ा की रचना
गोआड़ा गवड़ाय, जिको वहतो धुरवामी ।
नवरोजे नहं गयो, न गो आतसा नवल्ली।
न गो झरोखे हेठ, जेथ दुनियाण दहल्ली।
गहलोत रापा जीती गयो, दसण मूंद रसना डसी।
नीसास मूक भरिया नयण, तो मृत साह प्रतापसी।
🏆 महाराणा प्रताप की विरासत
- भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरणा स्रोत
- राजपूत शौर्य और स्वाभिमान के प्रतीक
- अजेय साहस और दृढ़ संकल्प के प्रतीक
- राष्ट्रीय गौरव और स्वतंत्रता के महानायक
- भारतीय इतिहास में अमर योद्धा